Spirit of a Fighter – Chapter 724
गली संकरी थी। मैं दौड़ा, और मेरी चप्पल कीचड़ में छूट गई। मैंने उसे उठाया नहीं। नंगे पैर। मिट्टी मेरे तलवों से चिपक रही थी, और हर कदम पर मुझे लग रहा था कि मिट्टी मुझे धक्का दे रही है — आगे, आगे।
एक टूटा मकान। दरवाज़ा आधा खुला। छत का आधा हिस्सा गिरा हुआ। और उसके अंदर से — लालटेन की गंध। तेज़। ताज़ी।
मैं रुका। मेरी साँस फूल रही थी।
तभी अंदर से आवाज़ आई। रोने की। धीमी, बूढ़ी, टूटी हुई। और उसके बीच एक आवाज़ और थी — कोई धीरे से बोल रहा था, जैसे बच्चे को बहला रहा हो।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। वो चरचराया, फिर खुल गया।
अंधेरा था। सिर्फ़ एक कोने में लालटेन जल रही थी। उसकी रोशनी में मुझे एक चारपाई दिखी, और उस पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था — रामलाल। उसके हाथ बँधे नहीं थे, पर वो काँप रहा था। उसकी आँखें बंद थीं, और वो रो रहा था।
और उसके सामने, कुर्सी पर, एक आदमी बैठा था। मुँह पर कपड़ा बँधा था। पर उसकी आँखें… वो आँखें जो मैंने बहुत बार देखी थीं।
मेरी साँस रुक गई।
वो आदमी उठा। उसने कपड़ा नहीं खोला। बस मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैं समझ नहीं पाया — प्यार नहीं, डर नहीं, बस एक अजीब सी थकान।
"तू वही है ना?" उसने कहा। आवाज़ दबी हुई, पर साफ़। "जिसकी नाक को भैरव डरता था?"
मैं एक कदम आगे बढ़ा। "तुम कौन हो?"
उसने कपड़ा खींचकर नीचे किया।
मेरे पैरों तले मिट्टी खिसक गई।
वो चेहरा जला हुआ नहीं था। वो चेहरा वही था जो मैंने बीस साल से सपनों में देखा था — सिर्फ़ उम्र ने उसे छुआ था। सफ़ेद दाढ़ी, झुर्रियाँ, पर आँखें वही। वही आँखें जो मुझमें हैं।
"पापा?" मेरी आवाज़ निकली ही नहीं। बस होंठ हिले।
उसने सिर हिलाया। धीरे से। जैसे कोई बहुत दूर से आया हो और अभी पहुँचा हो।
और तभी रामलाल ने आँखें खोलीं। उसने मुझे देखा। और फिर उसने वो किया जो मैंने उम्मीद नहीं की थी — वो हँसा। बूढ़ा, अंधा, काँपता आदमी ज़ोर से हँसा। "देखा?" वो बोला। "मैंने कहा था ना, भाई साहब? मैंने कहा था, आज वो आएगा। आज तेरा बेटा तुझे ढूँढ लेगा।"
और मैं वहीं जम गया — अपने पापा के सामने, जो ज़िंदा थे, जो मेरे सामने बैठे थे, और जिन्होंने अभी तक मुझसे एक बात नहीं कही थी।
सिर्फ़ देख रहे थे। जैसे मैं कोई सपना हूँ जो टूट जाएगा अगर हाथ बढ़ाया।
॥
वो मुझे देख रहे थे। बस देख रहे थे। और मैं? मैं अपनी जगह से हिल नहीं पा रहा था। मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए थे। मैंने सोचा था कि जिस दिन पापा को ढूँढूँगा, उस दिन गले लगूँगा, रोऊँगा, कुछ कहूँगा। पर अभी मेरे होंठ सूख गए थे, और ज़ुबान ऐसे चिपक गई थी जैसे किसी ने मुँह में रूई भर दी हो।
रामलाल हँस रहा था। बूढ़ा, अंधा, हड्डियों का ढाँचा, हाथ में लाठी — पर हँस रहा था जैसे बच्चा हो।
"बैठ," उसने कहा। "तेरे पैर काँप रहे हैं। मुझे दिखता नहीं, पर सुनता हूँ। तेरी साँस ऐसी चल रही है जैसे कोई दौड़कर आया हो।"
मैं बैठ गया। चारपाई के किनारे। मेरे घुटने टकरा रहे थे। मैंने हाथ जोड़ लिए, किसी तरह।
"पापा—" मैंने फिर कहा। इस बार आवाज़ निकली। टूटी, फटी, पर निकली।
वो आदमी — मेरे पापा — उठे। धीरे से। कमर पकड़कर। उनकी उम्र ने उन्हें मोड़ दिया था। वो मेरे पास आए, और मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गए। एक बूढ़ा आदमी, अपने जवान बेटे के सामने घुटनों पर।
मेरा दिल बैठ गया।
"उठो," मैंने कहा, आवाज़ भर्राई हुई। "पापा, आप—"
"चुप।"
उन्होंने मेरा चेहरा हाथों में पकड़ा। उनके हाथ खुरदुरे थे, ठंडे थे, पर उनमें एक जान थी जो मैंने पहली बार महसूस की। उन्होंने मेरा माथा चूमा। फिर आँखें। फिर गाल। जैसे अंधा आदमी चेहरा पढ़ रहा हो, हाथ से।
"तेरी नाक," उन्होंने कहा, आवाज़ दबी, फटी हुई। "तेरी नाक ने तुझे यहाँ तक पहुँचा दिया। मैंने सोचा था, मर जाऊँगा इससे पहले कि तू मुझे ढूँढे।"
मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला भर आया था। मैंने उनका हाथ पकड़ा और अपने सीने से लगा लिया। वो हाथ काँप रहा था। मेरी माँ के हाथ जैसा नहीं — माँ के हाथ चक्की से सख़्त हैं, पर गरम हैं। पापा के हाथ ठंडे थे, जैसे किसी ने उन्हें बीस साल अंधेरे में रखा हो।
और तभी रामलाल बोला।
"अब मेरी बात सुनो। तुम दोनों की बाद में।"
उसकी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी जो अभी थी। अब सिर्फ़ एक बूढ़े आदमी की थकान थी।
मैं पलटा। रामलाल चारपाई पर बैठा था, लाठी उसके बगल में टिकी थी। उसकी बंद आँखों से पानी बह रहा था। पर वो रो नहीं रहा था। शायद अंधी आँखों से आँसू अपने आप आ जाते हैं।
"मुझे पता था तू आएगा," उसने कहा। "तेरे पापा भी ऐसे ही आते थे। बिना बताए, बिना पूछे। सीधे दरवाज़ा खोलकर अंदर।"
"काका, आपको—"
"मुझे कुछ नहीं हुआ।" उसने हाथ हिलाया। "जो लोग कल रात आए थे, वो मुझे मारने नहीं आए थे। डराने आए थे। उन्होंने कहा — 'अगर तूने मुँह खोला, तो तेरे मरे बेटों की कब्रें खोद देंगे।'"
मेरी मुट्ठी भर गई।
"कब्रें?" मैंने कहा। "कब्रों का क्या—"
"तीस साल से मैं यही सुनता आया हूँ," रामलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ पत्थर जैसी हो गई। "तीस साल। हर साल कोई न कोई आकर याद दिला जाता — चुप रह, बूढ़े, वरना तेरे बेटों की हड्डियाँ निकाल देंगे।"
वो रुका। उसने अपनी छाती पर हाथ रखा, जैसे कुछ अंदर से निकल रहा हो।
"मेरे दो बेटे थे। दोनों अखाड़े में मरे।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "बड़ा — जगदीश। यही अखाड़े का पहलवान था। तेरे पापा का शागिर्द। बीस साल पहले जब तेरे पापा गए, तो उसे 'बुख़ार से मरा' का काग़ज़ दे दिया गया। और छोटा — दो साल बाद। उसे भी वही काग़ज़। बुख़ार।"
मेरे हाथ जुड़ गए। मैंने कुछ कहना चाहा, पर रामलाल ने आगे कहा —
"पर वो बुख़ार नहीं था। दोनों की नाक से खून बहा था। दोनों की त्वचा पीली पड़ गई थी, दोनों के हाथ-पैर ठंडे हो गए थे। मैंने तेरे पापा को देखा था — उन्हीं के साथ भी वही हुआ था। मैंने किसी को नहीं बताया। मैं डर गया।"
"मैं समझता हूँ," मैंने कहा।
"नहीं, तू नहीं समझता।" रामलाल ने सिर हिलाया। "तू नहीं समझता कि तीस साल रोज़ सुबह उठकर अपने बेटों की तस्वीर से माफ़ी माँगना क्या होता है। तेरे पापा की तस्वीर से भी माँगता था — क्योंकि मैं उस रात चौकीदार था और मैंने कुछ नहीं किया।"
मेरी आँखों के आगे वो रात घूम गई — जो मैंने नहीं देखी थी, पर जिसे मैं हर रात देखता था।
"आज पहली बार," रामलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ काँपी, "मैं अपने बेटों से कुछ माँग रहा हूँ। माफ़ी नहीं — हिम्मत।"
वो चुप हो गया। कमरे में सिर्फ़ लालटेन की लौ चटक रही थी।
मैं उठा। और मैंने वो किया जो मैंने अपने जीवन में कभी किसी के लिए नहीं किया था। मैं झुका, और रामलाल के पैर छू लिए।
"काका," मैंने कहा, आवाज़ भीगी हुई। "आपके बेटों ने जो किया होता, वो मेरे पापा के लिए किसी देवता जैसा होता। आपने कुछ नहीं किया, तब भी आपने बीस साल उनकी याद रखी। ये कम नहीं है।"
रामलाल का हाथ मेरे सिर पर आया। काँपता हुआ। उसने मेरे बाल सहलाए, जैसे कोई दादा सहलाता है।
"तेरे पापा जैसा बोलता है," उसने कहा। "हूबहू।"
मैंने उससे गवाही के लिए पूछा। मैंने कहा कि मैदान में, पंचायत के सामने, उसे सब बताना होगा — जो उसने उस रात देखा था, जो उसने तीन साल में अपनी आँखों से देखा था। उसने हामी भरी। एक बार में। बिना एक शब्द कहे। बस सिर हिला दिया। और उसके बाद वो बोला —
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