Spirit of a Fighter723 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 723

7 min read November 5, 2026

कालू काका ने चंदन की तरफ़ देखा। बाप-बेटे की नज़रें मिलीं। बहुत कुछ था उनमें, पर शब्द नहीं। चंदन ने धीरे से कहा, "बाबा, तू मत आ।"

"मैं आऊँगा," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कंपन नहीं थी जो अब तक था। "तीस साल मैंने तुझे मरा मानकर रोया। अब तू ज़िंदा है, तो मैं तेरे पीछे-पीछे चलूँगा। चाहे तू मुझसे बात न करे।"

चंदन ने कुछ नहीं कहा। बस गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया।

पुरानी बस्ती शहर के उस किनारे पर थी जहाँ सड़क ख़त्म हो जाती है। मिट्टी की गलियाँ, टीन के छप्पर, और बीच में एक सूखा तालाब। गाड़ी वहीं रुकी क्योंकि आगे रास्ता नहीं था।

मैं उतरा, और मेरे पैरों के नीचे मिट्टी ने मुझे रोका। एक पल के लिए मैं जम गया। ये वही मिट्टी थी। वही लाल, वही भीगी, वही पुरानी। जैसे तहखाना मेरे पैरों के नीचे से उठकर यहाँ आ गया हो।

"वीर?" मीरा ने पीछे से कहा। "क्या हुआ?"

"ये मिट्टी," मैंने धीरे से कहा। "ये वही है। तहखाने वाली।"

मीरा ने चारों तरफ़ देखा। टूटे मकान, बंद दुकानें, कुत्ता जो हमें देखकर भाग गया। "यहाँ तहखाना कहाँ से आया?"

"यहीं आया," चंदन ने कहा। वो हमारे पीछे खड़ा था, लाठी के सहारे। "ये अखाड़ा उसी पुराने अखाड़े की शाखा थी। बाबा हरिदास के गुरु ने यहाँ भी साधना की थी। दो जगह, एक मिट्टी। जो मिट्टी रामपुर में है, वही यहाँ है। जुड़वाँ।"

मैंने आगे बढ़कर उस चबूतरे को देखा। पत्थर का नहीं, मिट्टी का। ऊँचा, चौकोर, और उस पर उगी घास जिसे किसी ने नहीं काटा। चारों तरफ़ पुराने पहलवानों के नाम खुदे थे, पर इतने घिसे कि पढ़े नहीं जाते।

मैं चबूतरे पर चढ़ा। घुटनों के बल बैठा। और मिट्टी पर हथेली रखी।

मेरे हाथ में झुनझुनी दौड़ी। वो वाली जो तहखाने में हुई थी। जैसे मिट्टी साँस ले रही हो। जैसे वो मुझे पहचान रही हो। मैंने गहरी साँस ली, और मेरी नाक में वो सब आया — पसीना, हल्दी, पुरानी चमड़े की चप्पल, जला काग़ज़, और… माँ के हाथ की दाल।

मैं झटके से उठा। मेरी आँखें भर आईं। यहाँ माँ की गंध क्यों?

"वीर?" मीरा फिर बोली।

"माँ यहाँ रही है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "इस मिट्टी पर। बैठी है। बहुत दिन पहले। बहुत साल पहले।"

चंदन ने पास आकर कहा, "तेरी माँ यहाँ आती थी, बेटा। जब तेरे पापा रामपुर के अखाड़े में नहीं, यहाँ रहते थे। यहाँ तेरे पापा का पहला अखाड़ा था। यहाँ तेरी माँ पहली बार आई थी। यहाँ…" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "यहाँ तेरा पहला जन्म हुआ था।"

मैं जम गया। "मेरा… पहला जन्म?"

"तेरा जन्म तो एक ही है, बेटा," चंदन ने कहा। "पर यहाँ तेरे पापा ने पहली बार तुझे मिट्टी में लिटाया था। जब तू नन्हा था। कहते थे — 'जो बच्चा इस मिट्टी को छू ले, उसकी नाक सच पकड़ लेती है।'"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरी नाक। मेरी वो शक्ति। यहीं से आई थी।

तभी पीछे से खाँसी की आवाज़ आई। मैं पलटा। एक बूढ़ा आदमी आ रहा था — झुकी कमर, हाथ में कुदाल, सिर पर गमछा। चेहरा ऐसा जैसे सूखी ज़मीन। लाला।

उसने हमें देखा, और कुदाल ज़मीन पर रख दी। "आ गए," वो बोला, जैसे हम रोज़ आते हों। "मैं सोच रहा था, कब आएगा कोई।"

"लाला," चंदन ने कहा। "रामलाल?"

लाला ने सिर हिलाया। धीमे से। "कल रात आया था। रो रहा था। बोला — 'लाला, मैंने तीस साल चुप रहकर बहुत बड़ा गुनाह किया। अब मैं बोलूँगा।' मैंने कहा, 'बोल दे, भाई।' तो वो मुस्कुराया। बहुत दिनों बाद मुस्कुराया। फिर वो आए — तीन आदमी। एक लंगड़ा, एक जिसके हाथ में लालटेन थी, और एक बड़ा सा, सफ़ेद मूँछों वाला।"

"बड़ा सा?" मैंने पूछा।

"हाँ। उसने रामलाल के सिर पर हाथ रखा। और रामलाल रोने लगा — पर खुशी से। जैसे कोई बच्चा मिल गया हो। बोला — 'तू आ गया।' और वो बड़ा आदमी बोला — 'हाँ, आ गया। अब तेरा वक़्त आ गया।'"

मेरा दिल धक् से रह गया। "वो बड़ा आदमी कौन था?"

लाला ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें एक चमक थी। "बेटा, वो रणवीर सिंह था। उसे मैं भूल नहीं सकता। हम उसके अखाड़े में ईंट ढोते थे। पर उस वक़्त वो… वो चल रहा था। अपने पैरों से।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर हो गया था।

"मेरे पिता यहाँ नहीं आए," उसने कहा। आवाज़ सख़्त। "वो व्हीलचेयर पर हैं। वो चल नहीं सकते।"

लाला ने कंधे उठाए। "जो देखा, सो कहा, बेटी। और उसके साथ एक और था — जिसकी आँखों में पानी था। वो बोला था — 'भाई, अब देर मत कर।'"

चंदन ने धीरे से कहा, "वो चंदन नहीं था। वो कोई और था।"

मेरे दिमाग़ में सब घूमने लगा। दो आदमी — एक जो व्हीलचेयर पर है, एक जिसकी आँखों में पानी। और रामलाल खुशी से रो रहा था। जैसे मिल गया हो कोई।

टिंकू ने अपनी डिब्बी खोली। मिठाई की गंध चारों तरफ़ फैल गई। लाला की नाक हिली। उसने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुराना गीत सुन रहा हो।

"क्या है ये?" उसने पूछा।

"ये मेरी मिठाई है," टिंकू ने गर्व से कहा। "टिंकू मिष्ठान भंडार। रामपुर।" उसने एक पेड़ा लाला की तरफ़ बढ़ाया। "चखिए।"

लाला ने हाथ बढ़ाया, पर रुक गया। "बेटा, मेरे दाँत…"

"दाँत नहीं, ज़ुबान से चखिए," टिंकू ने कहा। "मिठाई ज़ुबान से पहचानी जाती है।"

लाला ने पेड़ा मुँह में रखा। देर तक चबाया। फिर उसकी आँखें भर आईं। उसने मुँह पर हाथ रख लिया। टिंकू घबरा गया। "अरे, गलत बनाई क्या? मैंने कहा था, गुड़ ज़्यादा है, पर…"

लाला ने हाथ हिलाया। "नहीं, बेटा। नहीं।" उसकी आवाज़ बैठी हुई थी। "मैंने ऐसी मिठाई पचास साल पहले खाई थी। जब यहाँ अखाड़ा ज़िंदा था। तब कोई पहलवान जीतता था, तो मिठाई बँटती थी। उसी मिठाई में ये बात थी।" उसने टिंकू के हाथ पर हाथ रखा। "बेटा, तेरी मिठाई में वो बात है जो अखाड़े की मिट्टी में है। इसे पकाने वाले के हाथ में ज़हर नहीं, जान है।"

टिंकू का सीना फूल गया। वो सीधा खड़ा हो गया, टोपी ठीक की, और बोला, "ये तो मैंने कहा था। वीर, मैंने कहा था ना? मेरी मिठाई एक दिन जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी।" फिर वो झुककर फुसफुसाया, "पर ये बात मेरी माँ को मत बताना। वो कहती है रोज़ खीर बिक जाती है।"

लाला पहली बार हँसा। सूखी हँसी। "बैठ, बेटा। तू बैठ। मुझे बताना, तेरी मिठाई में केसर है?"

"केसर?" टिंकू ने कहा। "केसर तो पहलवानों के लिए है। मैं तो अभी घी और गुड़ में हूँ। केसर तब डालूँगा जब वीर जीतेगा।"

लाला ने उसकी तरफ़ देखा। देर तक। फिर कहा, "तेरे हाथ में वो चीज़ है जो बड़े-बड़े हाकिमों के हाथ में नहीं। सच बोलने की आदत। इसे मत छोड़ना, बेटा।"

और मैं वहीं खड़ा सोच रहा था — ये मिठाई मैंने कितनी बार चुपके से खाई है। और आज समझ आ रहा था कि हर बार जो मीठा लगा, वो सिर्फ़ अच्छा स्वाद नहीं था। वो टिंकू का दिल था।

तभी मेरी नाक में कुछ आया। अचानक। तेज़। जैसे किसी ने मेरे सामने लालटेन जला दी हो। मिट्टी का तेल। और उसके साथ जली रूई की गंध। मैं उठ खड़ा हुआ।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"लालटेन," मैंने कहा। "भैरव की पीतल की लालटेन।"

"यहाँ?"

मैंने इधर-उधर सूंघा। हवा मुझे पूरब की तरफ़ ले जा रही थी। "वहाँ," मैंने कहा, और टूटे मकानों की तरफ़ इशारा किया। "उस तरफ़।"

मैं भागा। मेरे पीछे मीरा, टिंकू। चंदन ने लाठी टेकी, कालू काका ने उसे सँभाला। लाला भी पीछे आ रहा था, अपनी कुदाल छोड़कर।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho