Spirit of a Fighter722 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 722

7 min read November 5, 2026

"एक कॉपी," मैंने कहा। "जिसमें सब नाम हैं। सब हिसाब।"

"हिसाब?" उसने एक खोखली हँसी हँसी। "बेटा, अखाड़े में हिसाब नहीं होता। यहाँ सिर्फ़ मिट्टी होती है। और मिट्टी सब याद रखती है।"

मैंने आगे बढ़कर उसके सामने घुटने टेके। "मुझे बताइए। उस रात क्या हुआ था? रणवीर सिंह ने क्या किया?"

चंदन ने मेरी आँखों में देखा। लंबा। बहुत लंबा। जैसे वो तौल रहा हो कि मैं सुनने लायक हूँ या नहीं। फिर बोला, "रणवीर ने कुछ नहीं किया। रणवीर ने रोका। पर उस रात जो हुआ, वो रुकने वालों से नहीं रुका।"

"मतलब?"

"मतलब, जिसने दिया, वो भी अंदर था। जिसने लिया, वो भी। और जो बीच में खड़ा था — तेरा बाप — वो सबसे ज़्यादा फँसा।" उसने बंसी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये तेरे बाप की थी। उसने इसे उस रात मुझे दिया था। कहा था, अगर मैं न रहूँ, तो ये तेरे पास पहुँचेगी।"

मैंने बंसी ली। वो ठंडी थी, और उस पर उँगलियों के निशान थे — पुराने, घिसे हुए। मेरे पिता के निशान।

"मेरे बाप कहाँ हैं?" मेरी आवाज़ फट गई। "वो ज़िंदा हैं या नहीं?"

चंदन ने हाथ बढ़ाकर मेरा सिर छुआ। सूखा, काँपता हाथ। "बेटा, तेरा बाप मरा नहीं। उसे मारा नहीं गया। उसे रखा गया है। उस रात के बाद से किसी ने उसे देखा नहीं, क्योंकि जिसने उसे रखा है, वो चाहता है कि कोई देखे ही नहीं।"

"कौन?" मैंने पूछा। "कौन रखे है उसे?"

चंदन ने माथा झुकाया। बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। फिर बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "जिसका नाम तेरे बाप ने उस रात कॉपी में लिखा था। सबसे आख़िरी पन्ने पर। लाल स्याही से।"

मैंने कॉपी खोली। पन्ने पलटे। आख़िरी पन्ना। वहाँ लाल स्याही से एक नाम लिखा था, और नाम के नीचे बस दो शब्द — "भाई साहब।"

मेरे हाथ काँपे। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था। "भाई साहब?" उसने धीरे से कहा। "मेरे पिता को सब भाई साहब बुलाते हैं।"

चंदन ने सिर उठाया। "हाँ, बेटी। तेरे पिता को।"

मीरा एक कदम पीछे हटी। कॉपी उसके हाथ से छूटने लगी, मैंने पकड़ ली। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना नहीं चाहती थी। और मैं उस सवाल का जवाब नहीं दे सकता था, क्योंकि जवाब मेरे पास भी नहीं था।

तभी सीढ़ियों से आवाज़ आई। धीमे कदम। कोई उतर रहा था। और मैंने पलटकर देखा — रणवीर सिंह। कम्बल में लिपटे, कालू काका के सहारे, एक-एक सीढ़ी संभालकर। उनकी आँखें चंदन पर टिकी थीं।

"तू अब भी यहाँ है," रणवीर सिंह ने कहा। आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ थकान।

चंदन खड़ा हो गया। उसके हाथ काँप रहे थे। "तू ज़िंदा है।"

"हाँ।"

"मैंने सोचा तू मर गया।"

"मैं नहीं मरा।" रणवीर सिंह ने एक कदम आगे बढ़ा। "पर तूने मुझे मरा हुआ मान लिया। तीस साल। तीस साल तूने मुझसे बात नहीं की, चंदन।"

चंदन की आँखों से पानी बहा। "मैं तेरे सामने आने से डरता था। क्योंकि जब मैं तुझे देखता, तो मुझे अपने बेटों की मौत याद आती। और मुझे लगता कि तूने उन्हें बचाया नहीं।"

रणवीर सिंह रुक गए। उनका हाथ कम्बल पर जम गया। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने बचाया नहीं।" उनकी आवाज़ टूट रही थी। "उस आदमी ने तीस साल मेरे साथ अखाड़े में काम किया, और मैं उसके बेटों की मौत का हिसाब नहीं ले सका।" उन्होंने चाय का कप उठाना चाहा, जो किसी ने उन्हें पकड़ा रखा था। कप हाथ से फिसला, चाय रेत पर गिरी। उनका हाथ काँप रहा था। बूढ़ा हाथ, जो एक ज़माने में ताकतवर था।

मैं आगे बढ़ा और उनका हाथ पकड़ लिया। काँपता, ठंडा हाथ।

॥

मैंने रणवीर सिंह का हाथ पकड़ा। ठंडा, काँपता हाथ। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। आँखें चंदन पर टिकी थीं, और उन आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — हार नहीं, शर्म।

"तीस साल," चंदन ने दोहराया। उसकी आवाज़ सूखी लकड़ी जैसी थी। "तीस साल मैंने इसी मिट्टी के नीचे साँस ली है, भाई साहब। और हर साँस में मुझे लगा कि काश मैं उस रात नहर में डूब जाता।"

"तो तू डूब क्यों नहीं गया?" रणवीर सिंह की आवाज़ में अचानक तेज़ी आई। "तैरना तो तुझे मैंने सिखाया था।"

चंदन ने सिर उठाया। "इसीलिए नहीं डूबा। तूने सिखाया था, भाई साहब। तेरी वजह से बच गया। और तेरी ही वजह से अंदर रहा।"

कमरा चुप हो गया। ऊपर से कहीं पानी की बूँद टपकी। टप। टप। जैसे कोई इंतज़ार गिन रहा हो।

मैंने कॉपी मीरा के हाथ से ली और रणवीर सिंह के सामने रख दी। "ये नाम आपका है," मैंने कहा। "आख़िरी पन्ने पर। लाल स्याही से। मेरे बाप की लिखाई में।"

रणवीर सिंह ने कॉपी देखी। देखी भी नहीं, बस उस पन्ने को छुआ, जैसे जलती हुई तवे को छूते हैं। "मैं जानता हूँ," वो बोले। "शेर सिंह ने ये मुझे मरने से पहले दिखाया था। उसने कहा था — 'भाई साहब, ये नाम मैंने तेरे लिए लिखा है। ताकि तू कभी भूल न सके कि तेरे भाई का खून किसके हाथों बहा।'"

"तो आपने क्या किया?" ये मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में वही सख़्ती थी जो अदालत में होती है, पर हाथ काँप रहे थे। "आपने अपने बेटे की तरह… आपने कुछ किया?"

रणवीर सिंह ने मीरा की तरफ़ देखा। बेटी की तरफ़। और उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर। अपनी ही बेटी से डर।

"मैंने वो किया जो एक कायर करता है," वो बोले। "मैंने चुप रहना चुना। क्योंकि उस रात मैंने देखा था कि शेर सिंह के गिलास में किसने ज़हर डाला। मैंने चंदन को देखा था। और मैंने ये भी देखा था कि उसके पीछे कौन खड़ा था।"

चंदन ने मुँह फेर लिया।

"माधव सिंह," मैंने कहा। ये सवाल नहीं था।

"हाँ।" रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं। "मेरा सरपंच। मेरा साथी। जिसके साथ मैंने अखाड़े की मिट्टी में पहली बार हाथ डाला था। उसने मुझे कहा था — 'भाई साहब, तुम चुप रहो। तुम्हारी बेटी छोटी है। तुम्हारे पैर…' और मैंने उसकी बात मान ली। मैंने अपने भाई के खून को न्याय नहीं दिया, क्योंकि मुझे अपनी बेटी की परवाह थी।" उनकी आवाज़ टूटी। "और यही मेरा सबसे बड़ा पाप है।"

मीरा ने एक कदम आगे बढ़ाया। मुझे लगा वो कुछ कहेगी — गुस्से में, तेज़ आवाज़ में। पर उसने बस अपने पिता का हाथ पकड़ लिया। दोनों हाथों से। "पापा," वो बोली। और बस इतना ही।

रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। "तू मुझसे नाराज़ नहीं है?"

"नाराज़ हूँ," मीरा ने कहा। "बहुत नाराज़ हूँ।" उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़। "पर अभी नहीं। अभी हमें रामलाल को ढूँढना है। नाराज़गी बाद में।"

चंदन अचानक उठा। उसकी लंगड़ी टाँग ने उसे लड़खड़ाया, पर वो टिक गया। "रामलाल," उसने कहा। "उसे यहाँ नहीं मिलेगा। उसे वहाँ ले गए हैं जहाँ से मैं आया हूँ।"

"कहाँ?" मैंने पूछा।

"शहर के बाहर। पुरानी बस्ती। जहाँ अब कोई अखाड़ा नहीं, बस मिट्टी का चबूतरा बचा है। वहाँ एक बूढ़ा माली रहता है — लाला। वो उस अखाड़े का आख़िरी आदमी है। और रामलाल…" उसने रुककर साँस ली। "रामलाल वहीं छुपता था। जब भी डरता, वहीं भागता। उस मिट्टी में उसे अपने बेटों की गंध आती थी।"

मेरी नाक में तभी कुछ आया। हल्का सा। मिट्टी — पर वो मिट्टी जो तहखाने में थी। लाल, भीगी, पुरानी। और उसके साथ लोहे की गंध — जैसे कोई चीज़ बहुत दिनों से बंद पड़ी हो।

"मैं वहाँ जाऊँगा," मैंने कहा।

"मैं भी," मीरा ने कहा।

"और मैं?" टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की। "मैं तो पहले से ही तैयार था। बस एक बात — मेरी मिठाई की डिब्बी गाड़ी में रखी है, वो साथ आएगी।"

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