Spirit of a Fighter720 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 720

7 min read November 5, 2026

"वो अब पुल के नीचे नहीं है," मैंने कहा। "वो अखाड़े की तरफ़ जा रहा है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो हम भी अखाड़े चलते हैं।"

"पर रामलाल?"

"रामलाल अखाड़े में ही होगा," मीरा ने कहा। "अगर चंदन उसे ले गया, तो वो उसे वहीं ले जाएगा जहाँ उस रात सब कुछ हुआ था। अखाड़े में। जहाँ उसका बाप रोज़ मिट्टी सींचता है।"

कालू काका ने एक तेज़ साँस ली। "वो मुझे बुला रहा है," उन्होंने धीरे से कहा। "बीस साल बाद। वो मुझे बुला रहा है।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। "तो चलिए, काका। बेटा बुला रहा है।"

हम मुड़े। अखाड़े की तरफ़। और मेरे अंदर एक नई आग जल रही थी — वो आग जो सिर्फ़ सच से जलती है।

॥

अखाड़े का फाटक खुला था, पर अंदर कोई नहीं था।

ये सबसे डरावनी बात थी। इतने बड़े अखाड़े में, जहाँ हर सुबह पचास पहलवान मिट्टी गूंधते थे, जहाँ कालू काका की लाठी की आवाज़ और पानी के छपाके की आवाज़ हमेशा रहती थी — आज सिर्फ़ चुप्पी थी। मिट्टी सूखी पड़ी थी, दरारें पड़ गई थीं। जैसे किसी ने अखाड़े का मुँह बंद कर दिया हो।

"रामलाल यहाँ नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा। उसने चारों तरफ़ देखा। "हम ग़लत जगह आ गए।"

"नहीं," मैंने कहा। मैंने आँखें बंद करके हवा सूंघी। बहुत हल्का, बहुत धीरे, क्योंकि मेरी नाक अभी भी ज़ख़्मी थी और सिर चकरा रहा था। पर गंध साफ़ थी। "वो यहाँ था। कल रात। लालटेन लेकर। और उसके साथ एक और आदमी था — सफ़ेद मूँछों वाला। पर वो अब यहाँ नहीं है। वो आगे गए हैं।"

"किधर?"

मैंने उँगली उठाई। अखाड़े के पीछे, जहाँ पुराना कुआँ था। पर कुएँ तक जाने का रास्ता अब टूटा हुआ था — भैरव ने सीढ़ियाँ तुड़वा दी थीं, जैसा सुक्खी बुआ ने बताया था।

"वहाँ से नहीं जा सकते," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ अब भी काँप रही थी, पर पैर नहीं रुक रहे थे। "पर एक और रास्ता है। अखाड़े की पीछे वाली दीवार के नीचे। एक छेद है, जो बरसात में बनता है। बीस साल पहले मैंने उसी छेद से चंदन को… उस रात के बाद… निकलते देखा था।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, अगर चंदन रामलाल को वहाँ ले गया है, तो वो हमें बुला रहा है। ये जाल है।"

"पता है," मैंने कहा। "पर जाल में भी अगर सच मिलता है, तो मैं जाऊँगा।"

हम पीछे की दीवार की तरफ़ बढ़े। और तभी — मेरी नाक ने कुछ और पकड़ा। कुछ ऐसा जो इस जगह का नहीं था। काग़ज़ की गंध। पुराना काग़ज़। सीलन वाला, पीला पड़ चुका। मैं रुका।

"रुको," मैंने कहा। "कुछ और है।"

मैंने दीवार के पास पड़े पत्थरों को हटाया। नीचे एक लोहे का डिब्बा था, छोटा, जंग लगा। मीरा ने उसे खोला। उसमें काग़ज़ों का एक बंडल था, और सबसे ऊपर एक पुरानी कॉपी, जिसका कवर फटा हुआ था।

"ये रणवीर सिंह की लिखाई है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हलचल थी। "ये पापा की पुरानी कॉपी है। मैंने उनके बक्से में इसे देखा था, बचपन में।"

वो कॉपी खोलकर बैठ गई। पन्ने पलटे। और फिर उसका हाथ रुक गया।

"वीर," उसने कहा। "यहाँ रामलाल का पूरा नाम लिखा है। रामलाल यादव। और पता—"

"क्या?"

"ये पता वो नहीं है जहाँ हम अभी गए थे।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये पता शहर के बाहर है। पुरानी बस्ती। वहाँ, जहाँ माँ-बाप के पास अपने बच्चे नहीं रहते।"

टिंकू ने डिब्बा नीचे रखा और सिर खुजाया। "मतलब जो घर हमने देखा, वो सिर्फ़ दिखावा था? कोई नक़ली घर?"

"नहीं," मैंने कहा। मैंने भी कॉपी में झाँका। पन्नों पर रणवीर सिंह की मोटी, साफ़ लिखाई थी। "वो घर असली था। रामलाल वहाँ रहता था। पर वहाँ अकेला नहीं रहता था।" मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "अगर उसके दो बेटे थे, और दोनों मर गए, तो उस घर में उनकी यादें रहती थीं। तस्वीरें। कपड़े। इसीलिए वो वहाँ अकेला रोता था।"

"और असली पता?"

"असली पता वो है जहाँ उसे ढूँढने कोई नहीं जाता," मीरा ने कहा। उसने कॉपी बंद की। "शहर के बाहर, पुरानी बस्ती। वहाँ भैरव के आदमी भी नहीं जाते। वहाँ सिर्फ़ वो लोग जाते हैं जिन्हें कोई नहीं ढूँढता।"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। वो दीवार के सहारे बैठ गए थे, हाथ में कुछ पकड़े हुए। मैं पास गया। उनके हाथ में एक टूटी हुई बंसी थी — बाँस की, पुरानी, जिसका एक सिरा जला हुआ था।

"ये चंदन की थी," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने इसे उस दिन से संभालकर रखा था। सोचा था, कभी उसकी क़ब्र पर रखूँगा।" उन्होंने बंसी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "अब ये तेरी है। अगर तू उसे ढूँढे, तो ये दिखा देना। शायद वो इसे पहचान ले।"

मैंने बंसी ली। वो हल्की थी, पर मेरे हाथ में भारी लग रही थी।

"काका," मैंने कहा, "तुम घर जाओ। तुम्हारी हालत—"

"नहीं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ मज़बूत था। "मैं उस बस्ती तक चलूँगा। भले घुटनों के बल। पर चलूँगा।"

हम अखाड़े से निकले। सूरज सिर पर था और गर्मी से मिट्टी तवे जैसी तप रही थी। रास्ते में मीरा ने कॉपी के कुछ और पन्ने पलटे। फिर उसने एक पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"देखो," उसने कहा। "ये पापा ने लिखा है। यहाँ, नीचे, कोने में।"

मैंने पढ़ा। रणवीर सिंह की लिखाई थी — "रामलाल के दोनों लड़के। एक को बुख़ार कहकर दफ़नाया। दूसरे को कुएँ में। मैं चुप रहा। मैं मालिक था, पर मैं चुप रहा।"

मेरे हाथ रुक गए। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — गुस्सा नहीं, कुछ और। जैसे किसी की पुरानी चोट उसके अंदर खुद उठ रही हो।

"चलो," उसने कहा। "पापा से ये सीधा पूछना होगा।"

रणवीर सिंह आँगन में बैठे थे। व्हीलचेयर पर, सफ़ेद कम्बल ओढ़े, सामने चाय का कप रखा था। चाय ठंडी हो रही थी, भाप नहीं उठ रही थी। उन्होंने हमें आते देखा, और उनकी आँखों में कुछ बदला — जैसे उन्हें पता था कि हम क्या लेकर आ रहे हैं।

"बैठो," उन्होंने कहा।

मीरा ने कॉपी उनके सामने रखी। खुली हुई, उसी पन्ने पर।

"पापा," उसने कहा। "ये आपकी लिखाई है?"

रणवीर सिंह ने कॉपी देखी। एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने चाय का कप उठाया, और उनका हाथ काँपा। चाय कप से बाहर छलक गई, उनकी उँगलियों पर गिरी, और उन्होंने कप वापस रख दिया। काँपता हुआ।

मैंने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली ठंडी थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो गुस्सा नहीं था जो बीस साल से सुलग रहा था। वहाँ शर्म थी। और शर्म से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती, वीर सिंह।

"रामलाल के दो बेटे थे," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी, जैसे गले से नहीं, सीने से आ रही हो। "दोनों अखाड़े में मरे। बड़ा, बलराम, सबसे मज़बूत पहलवान था। भैरव ने उसे अखाड़े का सबसे बड़ा नाम बनाया, फिर उसी बोतल का पानी पिलाया। छह महीने में वो बिस्तर से नहीं उठा। दूसरा, छोटा, रामू — वो तो लड़का ही था, उन्नीस साल का। उसने अखाड़े के कुएँ में छलाँग लगा दी। ऊपर से पानी भरने की मशीन गिरी थी। उसका शरीर नहीं मिला।"

वो रुके। उन्होंने कम्बल अपने घुटनों पर खींचा, जो सून्न थे, जिन्हें वो महसूस नहीं कर सकते थे।

"उस आदमी ने तीस साल मेरे साथ अखाड़े में काम किया," उन्होंने कहा। "तीस साल। वो मेरे पीछे खड़ा रहता था जब मैं कुश्ती लड़ता था। वो मेरा पानी का गिलास भरता था। और मैं… मैं उसके दोनों बेटों की मौत का हिसाब नहीं ले सका।" उनकी आवाज़ टूटी। "मैं मालिक था, वीर। और मैंने उस आदमी को उसके बेटों की लाशों पर चुप खड़ा देखा, और मैं चुप रहा।"

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