Spirit of a Fighter719 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 719

6 min read November 5, 2026

"वो," मैंने धीरे से कहा। "वो आदमी। जो कल रात आँगन में था। जिसकी गंध मुझे जले काग़ज़ जैसी लगी थी।"

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"उसकी गंध में तहखाने की मिट्टी थी," मैंने कहा। "वो तहखाने से आया था। और तहखाने में सिर्फ़ एक आदमी रहता है जो बीस साल से वहाँ है — रामदीन। पर रामदीन लंगड़ा नहीं है।"

टिंकू ने मिठाई का डिब्बा नीचे रख दिया। "तो मतलब…"

"मतलब ये कि तहखाने में कोई और भी है," मैंने कहा। "या था। और वो लंगड़ा है। और वो चंदन सिंह है।"

कालू काका ने एक तेज़ आवाज़ निकाली। जैसे कोई जानवर घायल हो। "नहीं," उन्होंने कहा। "नहीं, वो मेरा बेटा नहीं हो सकता। मेरा बेटा मर गया। मैंने उसे जलाया।"

"काका," मैंने उनका हाथ पकड़ा। "तुमने एक लाश जलाई थी। तुमने चंदन को नहीं जलाया। तुमने सिर्फ़ एक जेब में रखी बंसी पहचानी थी।"

काका मेरी तरफ़ देखते रहे। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बीस साल से बंद था — एक उम्मीद। और उस उम्मीद के साथ एक डर भी।

मीरा ने मेरा कंधा पकड़ा। "वीर, रुको। तुम अभी कमज़ोर हो। तुमने कल रात बहुत सूंघा था।"

"मैं ठीक हूँ।"

"तुम ठीक नहीं हो," उसने कहा। "तुम्हारी आँखें लाल हैं। और तुम्हारी साँस तेज़ चल रही है।"

मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी। मैंने फिर हवा सूंघी। इस बार और दूर। नहर के पार। पुल के नीचे। वहाँ से आती एक गंध। जला हुआ काग़ज़। पुरानी चमड़े की चप्पल। और उसके साथ — मिट्टी का तेल।

"वो पुल के नीचे है," मैंने कहा। "चंदन सिंह पुल के नीचे है।"

"कैसे जानते हो?" टिंकू ने पूछा।

"गंध बता रही है।"

मैंने कदम बढ़ाया। एक कदम। दो कदम। और फिर मेरे सिर में एक झटका लगा। तेज़। जैसे किसी ने मेरे माथे पर हथौड़ा मारा हो। मैं लड़खड़ाया।

"वीर!" मीरा ने मुझे पकड़ा।

मैंने अपनी नाक छुई। मेरी उँगली पर खून लगा था।

"मैंने कहा था," मीरा की आवाज़ काँप रही थी। "मैंने कहा था न, बार-बार मत करो।"

"मैं ठीक—"

"तुम ठीक नहीं हो!" उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे नहर के किनारे कीचड़ में बिठा दिया। "तुम्हें पता है तुम्हारी नाक क्या कर रही है? वो तुम्हें खोखला कर रही है। हर बार जब तुम ज़्यादा सूंघते हो, तुम्हारे अंदर से कुछ निकल जाता है। और एक दिन…" उसकी आवाज़ रुक गई।

"एक दिन क्या?"

वो मेरे सामने बैठ गई। उसका बैग खुला था और उसमें से उसने एक छोटी शीशी निकाली। कपूर और तुलसी। उसने उसे मेरी नाक के पास रखा।

"सूंघो," उसने कहा। "धीरे से।"

मैंने सूंघा। कपूर की तेज़ गंध मेरे सिर में उतरी और दर्द थोड़ा कम हुआ।

"मीरा—"

"चुप रहो," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो मैं जानता था। पर फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर गईं। "तुम्हें पता है, वीर, तुम्हारी नाक तुम्हें मार डालेगी? तुम हर बार ज़्यादा सूंघते हो, और हर बार तुम्हारा शरीर थोड़ा और टूटता है। और मुझे…" उसका गला रुंध गया। "मुझे एक और जना नहीं खोना है।"

वो कहते-कहते रुक गई।

मैं उसे देखता रहा। नहर के किनारे, कीचड़ में बैठी, उसके छोटे बाल हवा में उड़ रहे थे। उसकी आँखों में पानी था। और उस पानी में मुझे कुछ ऐसा दिखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर। सिर्फ़ डर नहीं — एक औरत का डर जो किसी को खोने से पहले ही खो चुकी है।

मैंने अपना हाथ उठाया। और मैंने उसके आँसू पोंछे। मेरी उँगली पर अभी भी खून लगा था, और उसके गाल पर खून की एक पतली लकीर बन गई। वो हटी नहीं।

"तुमने अपने पिता को खोया है?" मैंने धीरे से पूछा।

उसने सिर हिलाया। "मेरे पापा ज़िंदा हैं। पर वो जो हैं, वो मेरे पापा नहीं हैं। वो एक टूटा हुआ आदमी हैं जो व्हीलचेयर पर बैठकर बीस साल से अपनी ही मौत का इंतज़ार कर रहे हैं।" उसने अपनी आँखें पोंछीं। "और मेरी माँ… मेरी माँ तो चली गई। जब मैं छोटी थी। उन्होंने मुझे छोड़ दिया। उन्होंने कहा था — 'इस अखाड़े में मेरी जगह नहीं है।' और वो चली गईं।"

सन्नाटा। टिंकू ने मुड़कर नहर की तरफ़ देखा। कालू काका ने अपना सिर नीचे कर लिया।

"मीरा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें नहीं खोऊँगा।"

वो हँसी। एक छोटी सी हँसी, जिसमें ज़्यादा रोना था। "तुम वादा मत करो, वीर। वादे वही करते हैं जो अपने आप पर भरोसा रखते हैं। और तुम…" उसने मेरी नाक की तरफ़ देखा। "तुम अपने आप को खा रहे हो।"

"तो मुझे रोको।"

"मैं रोक रही हूँ। यहीं। अभी।" उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे उठाया। "चलो, उठो। अब आगे नहीं सूंघना। मैं तुम्हें एक रास्ता बताती हूँ — बिना नाक के।"

"कैसे?"

उसने अपना बैग खोला। उसमें काग़ज़ों का एक बंडल था। पुराने पीले पन्ने। "मेरे पापा के पुराने काग़ज़," उसने कहा। "जब मैंने अखाड़े का हिसाब देखना शुरू किया था, तब मुझे ये मिले थे। इनमें उस चौकीदार का पूरा पता है। रामलाल का। और सिर्फ़ पता नहीं — इनमें उस रात का पूरा हिसाब है।"

मैंने उसके हाथ से काग़ज़ लिए। पीले पन्ने पर उभरी हुई स्याही। मैंने पढ़ा। "रामलाल। नहर पार, पुराना कुआँ के पास। बीस साल पहले रात को ड्यूटी पर था।"

"मैंने इसे पहले नहीं पढ़ा था," मीरा ने कहा। "मैंने सोचा था ये सिर्फ़ हिसाब-किताब है। पर अभी, जब तुमने रामलाल का नाम लिया… मुझे याद आया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम मेरी नाक से ज़्यादा काम की हो।"

वो मुस्कुराई। पहली बार उस शाम। एक छोटी सी मुस्कान, जैसे बादलों के बीच से सूरज की एक किरण।

"अब चलो," उसने कहा। "पहले तुम्हारी नाक ठीक करते हैं, फिर रामलाल को ढूँढते हैं। और इस बार…" उसने मेरी तरफ़ देखा। "इस बार तुम अकेले नहीं जाओगे।"

"मैं कभी अकेला नहीं था," मैंने कहा।

वो रुकी। और उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा, "पता है, वीर, तुम जब ऐसी बातें कहते हो, तो बहुत मुश्किल हो जाता है।"

"क्या मुश्किल?"

"तुम्हारे साथ नाराज़ रहना।"

टिंकू ने पीछे से खाँसा। "भाई, मैं यहाँ हूँ। और कालू काका भी। हमें भी कुछ बोलने का मौका मिले?"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन में। मेरी नाक से खून अभी भी रिस रहा था, मेरा सिर दर्द कर रहा था, और मेरे पापा की हड्डियाँ अखाड़े की मिट्टी में दबी थीं। पर मैं हँसा।

"टिंकू," मैंने कहा, "तू अपनी मिठाई संभाल। और काका—" मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं बैठे थे, अपने हाथों को देख रहे थे। "काका, तुम मेरे साथ चलोगे?"

काका ने सिर उठाया। "मैं? पर मैंने—"

"तुमने बीस साल पहले भागकर गुनाह किया। अब भागकर नहीं। अब सामने आकर। अगर चंदन ज़िंदा है, तो उसे अपने बाप की ज़रूरत है। और अगर वो नहीं है, तो उसे अपने बाप की गवाही की ज़रूरत है।"

काका की आँखों में फिर पानी आया। पर इस बार उन्होंने उसे पोंछा। "मैं चलूँगा," उन्होंने कहा। "मैं गवाही दूँगा। चाहे मेरा बेटा ज़िंदा हो या मरा। चाहे मुझे जेल जाना पड़े।"

हम चले। नहर के किनारे-किनारे। मीरा मेरे बगल में, उसका हाथ मेरी बाँह पर। टिंकू पीछे, मिठाई का डिब्बा लिए। और कालू काका सबसे पीछे, धीरे-धीरे, पर इस बार भागते हुए नहीं।

रास्ते में मैंने एक बार फिर हवा सूंघी। बस एक बार। हल्का सा। और मुझे वो गंध मिली — जला काग़ज़, पुरानी चप्पल, मिट्टी का तेल। पर इस बार वो पुल के नीचे से नहीं आ रही थी। वो आगे से आ रही थी। अखाड़े की तरफ़ से।

मैं रुका।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

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