Spirit of a Fighter718 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 718

7 min read November 5, 2026

हम चल पड़े। सड़क के मोड़ पर मैंने पलटकर देखा। बुढ़िया अब भी वहीं खड़ी थी, डिब्बा उसके हाथ में, और उसके पीछे आँगन खाली था — उस आँगन में कुछ नहीं था, बस मिट्टी, और मिट्टी पर जले काग़ज़ की राख का एक धब्बा, जिसे हवा ने अब तक नहीं उड़ाया था।

टिंकू ने धीरे से कहा, "भाई, वो सफ़ेद मूँछों वाला… जो रो रहा था…"

"हाँ, टिंकू।"

"वो अगर रो रहा था, तो उसने रामलाल को क्यों उठाया?"

"क्योंकि," मैंने कहा, "रामलाल वो आख़िरी गवाह है जो उस रात को जानता है। और अब उसके पास दो रास्ते हैं — या तो रामलाल की गवाही दबा दे, या फिर…"

मैं रुका।

"या फिर क्या?" मीरा ने पूछा।

"या फिर वो आख़िरी बार रामलाल से माफ़ी माँगने गया है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "माफ़ी?"

"हाँ। क्योंकि बुढ़िया ने कहा — उसकी आँखों में पानी था। और जो आदमी रोता हुआ अपराध करता है… वो अक्सर अपने आप से लड़ रहा होता है।"

हम नहर की तरफ़ बढ़े। पानी चमक रहा था। और मेरे भीतर एक नया सवाल उठ रहा था — वो तीसरा आदमी कौन था? जिसका नाम भुला दिया गया। जिसका चेहरा जला दिया गया। जिसकी आँखों में पानी था।

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये तस्वीर मैं अपने पास रखूँगी। और एक बात — हमारे पास अब तीन नाम हैं। रणवीर सिंह, शेर सिंह, और ये तीसरा। पर मुझे लगता है… ये तीसरा भी अखाड़े का ही था। और अगर वो अखाड़े का था, तो किसी न किसी को उसे याद रखना चाहिए।"

"कालू काका," मैंने कहा।

हम दोनों ने पलटकर देखा।

कालू काका पीछे चल रहे थे। धीरे। बहुत धीरे। जैसे उनके पैर उन्हें आगे नहीं ले जाना चाहते हों।

"काका," मैंने कहा। "रुकिए।"

वो रुके।

"काका," मैंने कहा, "बीस साल पहले अखाड़े में तीन बड़े पहलवान थे। रणवीर सिंह, मेरे पापा… और तीसरा। कौन था वो?"

काका की आँखें फैल गईं।

वो मेरी तरफ़ देखते रहे। एक लंबा पल। दो पल। और फिर उनका चेहरा ऐसे टूटा जैसे कोई पुरानी दीवार अचानक गिर जाए।

"तूने उसका नाम कहाँ सुना?" उनकी आवाज़ फटी हुई थी।

"तस्वीर में देखा। तीन आदमी। एक का चेहरा जला हुआ।"

काका ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मेरी रीढ़ तक ठंडा उतर गया।

"वो तीसरा आदमी," काका ने धीरे से कहा, "मेरा बेटा था।"

सन्नाटा।

नहर का पानी बहता रहा। पक्षी चहचहाते रहे। दुनिया चलती रही।

पर मैं वहीं जम गया।

"तेरा बेटा?" मैंने धीरे से दोहराया।

कालू काका ने आँखें खोलीं। उनमें पानी था।

"हाँ, बेटा। चंदन सिंह। अखाड़े का सबसे सुंदर पहलवान। और सबसे बड़ा गुनहगार।"

मेरी आवाज़ नहीं निकली। पर मेरे दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था — अगर चंदन सिंह कालू काका का बेटा था, तो वो उस रात क्यों था? और उसका चेहरा क्यों जलाया गया?

काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पुराना डर अब भी ज़िंदा था — वही डर जिसने उन्हें बीस साल चुप रखा था।

"वीर," उन्होंने कहा, "तूने मुझसे दीनू के बारे में पूछा था। अब मैं तुझसे एक बात पूछता हूँ। क्या तू सच में जानना चाहता है कि उस रात क्या हुआ? क्योंकि अगर जान लिया, तो फिर तेरे पास लौटने का रास्ता नहीं होगा।"

मैंने उनकी आँखों में देखा।

"काका," मैंने कहा, "मैं बीस साल से उस रात में जी रहा हूँ। अब मुझे उससे बाहर निकलना है।"

काका ने एक गहरी साँस ली। और उन्होंने वो कहा जो उन्होंने बीस साल किसी को नहीं बताया था।

"उस रात मेरा बेटा चंदन भी वहाँ था। और वो भैरव के साथ था।"

॥

"उस रात मेरा बेटा चंदन भी वहाँ था। और वो भैरव के साथ था।"

कालू काका की आवाज़ काँप रही थी। नहर का पानी बहता रहा, पर मेरे अंदर का पानी ठहर गया था।

"काका," मैंने धीरे से कहा, "चंदन सिंह। अखाड़े का सबसे सुंदर पहलवान।" मैंने उनके चेहरे को देखा। "तुम्हारा बेटा।"

काका ने सिर हिलाया। उनकी आँखों से एक आँसू बहा, और उन्होंने उसे पोंछा भी नहीं। "बीस साल से मैं उसे अपने बेटे की तरह याद करता रहा," उन्होंने कहा, "पर सच ये है — वो उस रात जो करने गया था, उससे वो मेरा बेटा नहीं रहा।"

मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।

"क्या करने गया था?" मैंने पूछा।

काका ने नीचे ज़मीन देखी। "भैरव उसे अपना दाहिना हाथ बनाता था। चंदन अखाड़े का सबसे अच्छा पहलवान था, पर जीत के बाद उसके पास कुछ नहीं बचता था। भैरव उसे पैसे देता। छोटे-छोटे काम। पहले बोतलें ढोना। फिर बोतलें पिलाना।" काका की आवाज़ रुकी। "और उस रात भैरव ने उसे और बड़ा काम दिया।"

"क्या काम?"

काका ने आँखें बंद कर लीं। "शेर सिंह का पानी बदलना। जिस गिलास में शेर सिंह का पानी रखा था, उसमें ज़हर डालना।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने कालू काका को देखा। वो कुबड़े, छोटे, सफ़ेद दाढ़ी वाले बूढ़े, जो रोज़ सुबह अखाड़े की मिट्टी सींचते थे, जो अपने हाथों से मेरे पापा की हड्डियों वाली मिट्टी गूंधते थे — वो अभी मेरे सामने बैठे रो रहे थे।

"तो चंदन ने… उसने मेरे पापा को ज़हर दिया?"

काका ने सिर हिलाया। "उसने ज़हर दिया। पर मरते वक़्त शेर सिंह ने उसका हाथ पकड़ा था। और कहा था — 'बेटा, तूने जान-बूझकर नहीं किया। तेरे हाथ काँप रहे थे। मैं जानता हूँ।'"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था।

"उसके बाद क्या हुआ?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर मैं जानता था — वो सख़्त सिर्फ़ बाहर से थी।

"उसके बाद," काका ने कहा, "चंदन भागा। नहर की तरफ़। वो नहर में कूद गया और बह गया। हमने उसे ढूँढा, पर…" काका की आवाज़ टूट गई। "कुछ दिन बाद हमें नहर के किनारे एक जली हुई लाश मिली। चेहरा पहचानने लायक नहीं था। पर जेब में चंदन की बंसी थी।"

"तो वो मर गया," टिंकू ने धीरे से कहा। वो अब तक चुप खड़ा था, और उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था जो वो रामलाल के लिए लाया था।

काका ने सिर हिलाया। "मैंने उसे जला दिया। अपने ही हाथों से। मैंने सोचा — जो आग उसने अपने घर में लगाई, वो उसी आग में जाए।" काका ने अपनी सूखी आँखों को मला। "पर अब तुझे एक बात बताता हूँ, वीर। जो आदमी लंगड़ा है, जो रामलाल को ले गया… मुझे शक है।"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। "क्या शक?"

"चंदन के दाहिने पैर में बचपन से चोट थी। वो लंगड़ाकर चलता था। और कल रात जो लंगड़ा आदमी रामलाल को ले गया — उसके चलने की आवाज़ मुझे सुक्खी बुआ ने बताई थी। वो…" काका का गला रुंध गया। "वो चंदन के चलने जैसी थी।"

सन्नाटा। इस बार सच में सन्नाटा। नहर का पानी भी जैसे रुक गया।

"तुम कह रहे हो," मैंने धीरे से कहा, "कि चंदन ज़िंदा है? कि वो जली हुई लाश उसकी नहीं थी?"

काका ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। "मैं कुछ नहीं कह रहा, बेटा। मैं सिर्फ़ डरा हुआ हूँ। बीस साल से मैंने अपने आप को यही यकीन दिलाया कि मेरा बेटा मर गया। पर अगर वो ज़िंदा है, और वो रामलाल को ले गया… तो वो उस रात की गवाही नहीं देने देगा।"

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। और फिर मैंने वो किया जो मैंने अब तक कभी नहीं किया था। मैंने हवा को सूंघा।

नहर की बदबू। गीली मिट्टी की गंध। टिंकू के हाथों से आती हल्दी की महक। मीरा के बैग से आती तुलसी की ख़ुशबू। और फिर… और फिर मुझे कुछ मिला।

तहखाने वाली मिट्टी की गंध।

वो गंध जो सीलन और पुरानी लकड़ी और किसी बहुत पुराने दर्द से बनी थी। वही गंध जो मुझे उस जले हुए चेहरे वाले आदमी से आई थी, जो कल रात आँगन में खड़ा था।

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