Spirit of a Fighter – Chapter 717
मैं अंदर गया। मीरा मेरे पीछे आई। कालू काका बाहर दरवाज़े पर खड़े रहे — पहरा।
घर छोटा था। एक कमरा, एक कोना जिसमें रसोई थी, और एक आला जिसमें कुछ पुरानी चीज़ें रखी थीं। मैंने उस आले की तरफ़ बढ़कर देखा।
एक टूटा हुआ चश्मा। एक पुरानी कंघी। एक छोटा-सा पीतल का घंटी जैसा कुछ। और… एक तस्वीर।
मैंने तस्वीर उठाई। काँच फूटा हुआ था, और उसकी एक कोर काली पड़ गई थी। पर जो अंदर था, वो साफ़ दिख रहा था।
तीन आदमी।
बीच में — मैंने उसे तुरंत पहचाना। गोरा, चौड़े कंधे, हँसता हुआ चेहरा। रणवीर सिंह। जवान। बहुत जवान। उसकी मूँछें अभी काली थीं, और उनके कंधे पर एक हाथ था।
दाएँ तरफ़ का आदमी — शेर सिंह।
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने अपने पापा को पहली बार देखा था — इस उम्र में, एक फटी तस्वीर में। उनका चेहरा मेरे चेहरे जैसा था। वही घुंघराले बाल। वही आँखें। और वो हँस रहे थे — ऐसे हँस रहे थे जैसे दुनिया की कोई फ़िक्र न हो।
"वीर?" मीरा ने धीरे से कहा।
मैंने तस्वीर उसकी तरफ़ बढ़ाई। मेरी आवाज़ नहीं निकल रही थी।
वो मेरे पास आई और झुककर देखा।
"तीन आदमी," उसने कहा। "रणवीर सिंह, शेर सिंह… और ये तीसरा?"
वो तीसरा बाईं तरफ़ खड़ा था। लंबा, पतला। उसका चेहरा… मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। उसका चेहरा जला हुआ था। नहीं, जलाया हुआ नहीं — तस्वीर पर किसी ने कुछ जलाया था। एक गोल सा जला हुआ निशान, ठीक चेहरे के बीच।
"किसी ने इसे जानबूझकर जलाया है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में सख़्ती आ गई। "देखो — जले का निशान सिर्फ़ चेहरे पर है। बाकी कुछ नहीं। कोई चाहता था कि इस आदमी का चेहरा पहचाना न जाए।"
"रामलाल ने जलाया," मैंने कहा। "बीस साल पहले। जब उसने 'पुराने हिसाब के काग़ज़' जलाए थे। उसने ये चेहरा भी जला दिया।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि ये तीसरा आदमी…" मैंने तस्वीर को करीब लाया। "ये वही है जो उस रात वहाँ था। जिसने पापा को मरते देखा। और रामलाल ने उसे छुपाने के लिए चेहरा जला दिया — नहीं, चेहरा नहीं। उसने अपनी गवाही जला दी।"
तभी मेरी नाक में कुछ आया।
मैंने आँखें बंद कीं। और मुझे वो गंध मिली — हल्की, बहुत हल्की। तस्वीर के काँच से आ रही थी। जैसे किसी ने इसे बहुत पुराने हाथों से पकड़ा हो और तस्वीर पर उन हाथों की गंध रह गई हो।
धुआँ। तेल। और… चंदन।
"मीरा," मैंने कहा, "ये तस्वीर किसी ने हाल में छुई है। कल रात। इसे उठाया गया है, देखा गया है, और फिर वापस रख दिया गया है।"
मीरा ने तस्वीर मेरे हाथ से ली और उसे उजाले की तरफ़ की। "इसका काँच टूटा हुआ है। अगर किसी ने इसे उठाया होता, तो…" वो रुकी। "वीर, तस्वीर के पीछे कुछ लिखा है।"
मैंने पलटी। पीछे की तरफ़, गत्ते पर, पेंसिल से कुछ लिखा था — छोटी, झुर्रियों वाली लिखाई। बूढ़े हाथों की लिखाई।
"तीन भाई। एक ने दिया, एक ने लिया, और तीसरा चुप रहा।"
मैंने ये लाइन दो बार पढ़ी।
"तीन भाई," मीरा ने धीरे से दोहराया। "लेकिन ये तीन भाई नहीं थे। रणवीर सिंह, शेर सिंह और…"
"ये तीसरा," मैंने कहा। "ये कौन है, मीरा? मुझे इसका नाम जानना है।"
तभी बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
"भाई! भाई, बाहर आओ!"
हम भागे। बाहर आँगन में बुढ़िया अब भी बैठी थी, पर उसकी गोद में डिब्बा खुला पड़ा था और उसके हाथ काँप रहे थे। टिंकू उसके सामने घुटनों के बल बैठा था और उसके हाथ पकड़े हुए था।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"बुआ को कुछ याद आया," टिंकू ने कहा। "मैंने उनसे पूछा — रामलाल जाते वक़्त क्या ले गया? तो बुआ बोलीं…"
वो रुका। बुढ़िया ने खुद कहा, आवाज़ में काँपन।
"अपने बेटे की तस्वीर। सीने से लगाकर ले गया।"
मेरे भीतर कुछ टूटा।
"उसका बेटा?" मैंने धीरे से पूछा।
"बीस साल पहले मर गया," बुढ़िया ने कहा। "अखाड़े में। पहलवान था। शेर सिंह का शागिर्द। और जब वो मरा, तो रामलाल अखाड़े गया था — शेर सिंह से मिलने। पर शेर सिंह तब तक… तब तक वो भी जा चुके थे। रामलाल को किसी ने कुछ नहीं बताया। बस एक काग़ज़ दिया — 'बुख़ार से मरा'। और वो उसे लेकर लौट आया। तीस साल उसने वो काग़ज़ संभालकर रखा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आई थीं।
मैं उस आँगन में खड़ा था, जहाँ कुछ देर पहले तक एक बूढ़ा आदमी रो रहा था। मेरे पापा का शागिर्द का बाप। बीस साल से चुप। क्योंकि उसे भी वही काग़ज़ दिया गया था जो मेरे घर आया था। वही झूठ।
"वो तस्वीर…" मैंने धीरे से कहा। "जो हमने अंदर देखी। तीन आदमी वाली। वो किसकी थी?"
बुढ़िया ने मेरी तरफ़ देखा। "रामलाल के बेटे की। वो अखाड़े के तीनों बड़े पहलवानों के साथ खींची थी। उसकी सबसे प्यारी चीज़ थी।"
"तीनों?"
"हाँ। रणवीर सिंह, शेर सिंह और… और वो तीसरा। जिसका नाम भूल गया। पर वो बहुत सुंदर आदमी था, बेटा। बहुत सुंदर।"
मैंने आँखें बंद कीं।
तीसरा आदमी। जिसका चेहरा जलाया गया था। जो सुंदर था। जिसे इस गाँव ने भुला दिया।
"बेटा," बुढ़िया ने अचानक कहा। "एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मैं झुककर उसके पास बैठ गया।
"उस रात," उसने धीरे से कहा, "सिर्फ़ दो आदमी नहीं थे। तीन थे। तीसरा — वो बड़ा आदमी, सफ़ेद मूँछें वाला — वो रामलाल के कान में कुछ बोला था। और रामलाल ने सिर हिलाया। फिर वो लोग चले गए। पर जब वो लालटेन वाला आगे निकल गया, तो सफ़ेद मूँछों वाले ने एक बार पलटकर देखा। और मैंने उसके चेहरे पर एक चीज़ देखी।"
"क्या?"
"पानी। उसकी आँखों में पानी था।"
मैं खड़ा हो गया।
घर के बाहर, नीम के पेड़ के नीचे, टिंकू का खुला डिब्बा पड़ा था। आधी बर्फ़ी अब भी उसमें बची थी। और उसके ऊपर, आसमान में, सुबह का सूरज अब पूरा निकल आया था — तेज़, सफ़ेद, बेरहम।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे पास खड़ी थी, और उसके हाथ में वो टूटी तस्वीर थी।
"तीन भाई," मैंने धीरे से कहा। "एक ने दिया। एक ने लिया। और तीसरा चुप रहा।"
"वीर," मीरा ने कहा, "अगर ये सफ़ेद मूँछों वाला रो रहा था, तो वो बुरा आदमी नहीं है।"
"या फिर," मैंने कहा, "वो बहुत बुरा आदमी है। इतना बुरा कि खुद के किए पर रोता है।"
बुढ़िया ने अचानक मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ पहले से कमज़ोर थी — जैसे बर्फ़ी खाकर, मिठास पाकर, उसका डर कुछ घुल गया हो।
"बेटा," उसने कहा, "तू जा। रामलाल को ढूँढ। पर एक बात याद रख — जो आदमी रोते हुए अपराध करता है, वो सबसे ख़तरनाक होता है। क्योंकि वो खुद को माफ़ कर चुका होता है।"
मैंने उसके हाथ अपने हाथ में लिए।
"बुआ," मैंने कहा, "आपने रामलाल को खोजने में हमारी मदद की। अब मैं आपसे एक वादा करता हूँ। अगर रामलाल ज़िंदा मिला, तो मैं उसे आपके पास लेकर आऊँगा। और अगर नहीं मिला… तो जो उसे ले गया, उसे मैं आपके पास लेकर आऊँगा।"
बुढ़िया की आँखों में पानी आ गया। पर वो मुस्कुराई।
"तू अपने बाप का बेटा है," उसने कहा। "शेर सिंह भी ऐसे ही बोलता था — वादे करता था, और पूरे करता था। बस एक वादा उसने नहीं पूरा किया।"
"कौन सा?"
"उसने कहा था — 'बुआ, मैं एक दिन अपने बेटे को लेकर आऊँगा। तुझे दिखाऊँगा।' और वो आया नहीं। तू आया — बीस साल बाद। पर आया तो सही।"
मैंने उसके पैर छुए। वो रोने लगी, और टिंकू ने उसे अपने कंधे का सहारा दिया।
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