Spirit of a Fighter – Chapter 716
एक चारपाई। उस पर एक पुरानी रजाई, जो अब गोला बनकर पड़ी थी। कोने में चूल्हा — ठंडा। पर चूल्हे के पास मिट्टी का एक बर्तन रखा था, और उसमें चाय की पत्ती अभी गीली थी। जैसे किसी ने अभी-अभी चाय बनाने की सोची हो और फिर बीच में छोड़ दी हो।
दीवार पर एक टूटी घड़ी। वही पुरानी — जैसी माँ की दीवार पर है। पर इसकी सुइयाँ तीन बजे पर अटकी थीं।
मैंने आँखें बंद कर लीं और एक गहरी साँस ली।
मेरी नाक ने मुझे तीन चीज़ें बताईं।
पहली — चारपाई पर बैठे आदमी की गंध। बूढ़ी, हड्डियों वाली, कई साल की अकेली रातों की गंध।
दूसरी — लालटेन की गंध। पीतल, तेल, और जली बत्ती।
तीसरी — मिट्टी का तेल। ज़्यादा। बहुत ज़्यादा। जैसे किसी ने कनस्तर खोलकर यहाँ रख दिया हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"दो आदमी आए थे," मैंने धीरे से कहा। "एक के हाथ में लालटेन थी — उसकी गंध में तेल और धुआँ है। दूसरा… दूसरे के हाथों में मिट्टी का तेल था। बहुत सारा। जैसे वो कुछ जलाने आया हो।"
टिंकू ने चूल्हे की तरफ़ देखा। "पर यहाँ तो कुछ जला नहीं।"
"नहीं जला," मैंने कहा। "क्योंकि रामलाल उनके साथ चला गया। उसने लड़ाई नहीं की। उसने मना नहीं किया। वो खुद उठकर उनके साथ चल पड़ा — जैसे उसे मालूम था कि ये दिन आएगा।"
बाहर से पैरों की आहट आई।
हम सब सख़्त हो गए। टिंकू ने डिब्बा उठा लिया और उसे ढाल की तरह सीने के सामने रख लिया। मीरा ने अपनी जेब से कुछ निकाला — काली मिर्च और तुलसी का पाउडर। कालू काका दरवाज़े के पीछे सरक गए।
आहट रुकी। और फिर एक आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत बूढ़ी।
"रामलाल? रामलाल, तू लौटा?"
एक बुढ़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। बहुत छोटी, बहुत झुकी हुई। एक हाथ में लाठी, दूसरे में पीतल का छोटा-सा लोटा। आँखें धुँधली थीं, पर उनमें एक डर था जो कई दिनों का लग रहा था।
"वो नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "हम रामलाल को ढूँढ रहे हैं।"
बुढ़िया ने मेरी आवाज़ सुनी और उसका चेहरा बदल गया। वो बाहर की तरफ़ पलटी, फिर अंदर आई, और मुझे ऐसे देखने लगी जैसे किसी बहुत पुराने काग़ज़ पर लिखा नाम पढ़ रही हो।
"तू… तू कौन है, बेटा?"
"वीर सिंह।"
उसके हाथ से लोटा छूट गया। पीतल का लोटा ज़मीन पर गिरा और उसमें से पानी बह गया। वो काँपने लगी।
"शेर सिंह का…"
मैंने सिर हिलाया।
बुढ़िया ने अपनी लाठी मज़बूती से पकड़ी और अपनी आँखें मलीं, जैसे सपने से जाग रही हो।
"तू उसी का बेटा है," उसने धीरे से कहा। "तू उसी की आँखें लाया है। मैंने तुझे कभी देखा नहीं, पर… पर ये आँखें मैंने बहुत देखी हैं। बहुत।"
वो अंदर आई और चारपाई के किनारे बैठ गई। उसके हाथ रजाई पर रखे थे और उँगलियाँ उस पर रेंग रही थीं, जैसे रामलाल का सिर सहला रही हों।
"मैं रामलाल की पड़ोसन हूँ," उसने कहा। "तीस साल से। इस घर में रहती हूँ, सामने वाले में। बीस साल से ये आदमी अकेला रह रहा था। एक कुत्ता था, बस। आज सुबह कुत्ता भी भाग गया।"
"बुआ," मीरा ने धीरे से कहा, "कल रात क्या हुआ?"
बुढ़िया ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में पानी आ गया, पर वो रोई नहीं। वो बैठी रही, और उसका पानी उसकी सूखी त्वचा पर गड्ढों में उतर गया।
"कल रात मैंने इसे रोते सुना," उसने कहा। "रामलाल को। ये रोता नहीं था, बेटा। तीस साल में मैंने इसे एक बार भी नहीं रोते देखा। पर कल रात ये अपने आँगन में बैठा था और ऐसे रो रहा था जैसे… जैसे किसी ने इसके बेटे की लाश दिखा दी हो।"
मेरा गला सूख गया।
"मैंने दीवार के पार से पूछा — रामलाल, क्या हुआ? और ये बोला… इसने कहा, 'मैंने तीस साल चुप रहकर गुनाह किया, बुआ। मैंने एक आदमी को मरने दिया और चुप बैठा रहा।' मैंने पूछा — कौन? और ये बस यही बोलता रहा — 'मैंने तीस साल चुप रहकर गुनाह किया।' बार-बार।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।
काका की आँखें सूखी थीं। बिलकुल सूखी। और मुझे पता था कि ऐसी आँखें सबसे ज़्यादा रोती हैं — अंदर, बहुत अंदर।
"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"फिर मैं सो गई। बूढ़ी हूँ, बेटा। रात को ज़्यादा देर जागती हूँ, तो सुबह का दिन भारी लगता है। सुबह उठी तो देखा — इसका दरवाज़ा खुला है। चूल्हा ठंडा है। बर्तन में चाय की पत्ती गीली है। मैंने सोचा — कहीं गया होगा। पर फिर मैंने देखा — दीवार से सटी मिट्टी पर पैरों के निशान थे। बड़े पैरों के। दो आदमी। एक के पैर लंगड़े थे — वो घसीटकर चल रहा था।"
मैंने मुट्ठी कस ली।
"और एक तीसरा था क्या?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी। "बुआ, याद कीजिए। मिट्टी पर कोई और निशान?"
बुढ़िया ने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।
"मुझे नहीं लगा," उसने कहा। "पर जब वो लोग निकले, तो मैंने दरवाज़े की दरार से झाँका। रामलाल उनके साथ था। और उसके पीछे… एक आदमी और था। मैंने उसे देखा — बहुत बड़ा आदमी, बेटा। सफ़ेद मूँछें।"
मेरी साँस रुक गई।
टिंकू ने डिब्बा पकड़कर मेरी तरफ़ देखा। "सफ़ेद मूँछें?" उसकी आवाज़ फटी। "भाई, सफ़ेद मूँछें तो…"
मैंने उसे चुप कराया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था। रणवीर सिंह? व्हीलचेयर पर? कैसे?
"बुआ," मैंने धीरे से कहा, "वो बड़ा आदमी — उसकी आवाज़ सुनी आपने? कुछ बोला?"
बुढ़िया ने सिर हिलाया। "एक बार। जब रामलाल ने जाने से मना किया। उसने कहा — बस दो शब्द। 'तेरा वक़्त आ गया।'"
"कैसी आवाज़?" मैंने पूछा।
"भारी। बहुत भारी। जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घुमाई जा रही हो।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
ये आवाज़ रणवीर सिंह की नहीं थी। मैंने उन्हें सुना था — घर पर, अखाड़े में। उनकी आवाज़ में गरज थी, पर वो गरज किसी दरवाज़े की होती है जो खुला पड़ा हो। ये आवाज़ किसी बंद ताले की थी।
"ये कोई और है," मैंने कहा।
बुढ़िया ने अचानक मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी — किसी किसान की पकड़, जिसने ज़िंदगी भर मिट्टी पकड़ी हो।
"तू शेर सिंह का बेटा है," उसने कहा। "तो एक बात सुन। मैंने रामलाल को तीस साल देखा है। वो डरपोक नहीं था। वो चुप था। फ़र्क़ होता है, बेटा — डरपोक आदमी भाग जाता है, चुप आदमी बैठा रह जाता है। रामलाल बैठा रह गया। तीस साल।"
"किस चीज़ के डर से?" मीरा ने पूछा।
"ये तो उसने कभी नहीं बताया। पर एक बात मुझे याद है। बीस साल पहले, जिस रात शेर सिंह मरा — उसके कुछ दिन बाद रामलाल ने अपने आँगन में एक चीज़ जलाई थी। मैंने पूछा — क्या जला रहा है? तो बोला — 'कुछ काग़ज़ हैं। पुराने हिसाब के।'"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने मेरी तरफ़। हम दोनों को एक ही बात याद आई — जली चिट्ठी।
"बुआ," मैंने कहा, "ये घर मैं अंदर से देखना चाहता हूँ। आप बाहर बैठिएगा, धूप में। टिंकू आपके साथ रहेगा।"
टिंकू ने तुरंत डिब्बा खोला। "बुआ, ये मिठाई खाइए। मैंने खुद बनाई है।"
बुढ़िया ने डिब्बे में देखा और उसकी आँखें चमक गईं — पहली बार उस सुबह में कुछ चमका था।
"अरे, ये तो बर्फ़ी है!"
"हाँ। और इसमें एक राज़ है — बादाम की जगह मैंने काजू डाले हैं, क्योंकि बादाम महँगा है और काजू भी महँगा है, पर काजू में मिठास ज़्यादा आती है।"
बुढ़िया हँसी। उसकी हँसी में कई दाँत नहीं थे, पर आवाज़ में गरमी थी।
"तू कौन है, बेटा?"
"टिंकू। मैं मिठाई बनाता हूँ। टिंकू मिष्ठान भंडार — रामपुर।"
"और तू इनके साथ?"
"मैं इनका दोस्त हूँ।" टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। "भाई, तुम अंदर जाओ। मैं बुआ को मिठाई खिलाता हूँ।"
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