Spirit of a Fighter – Chapter 703
"उस रात — जिस रात ये सब हुआ — माधव सिंह के साथ एक और आदमी था।"
मीरा की साँस रुक गई। मैंने देखा कि उसने अपना हाथ मेरी बाँह पर कस लिया।
"वो छाया में खड़ा था, मैं उसे ठीक से नहीं देख पाया। पर जब वो बाहर निकला, नीम के पेड़ के नीचे, तो चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ी।"
कालू काका ने रुककर मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखें अब सूख गई थीं। डर भी नहीं था उनमें। बस एक पुराना, दबा हुआ सच बोलने की ज़िद।
"वो आदमी तेरे पापा का सबसे करीबी था, बेटा। वो उनका दाहिना हाथ था। जिसके साथ तेरे पापा हर रात चूल्हे पर बैठकर रोटी खाते थे। जो हँसते-हँसते कहता था — शेर सिंह, तू अखाड़े का शेर है, और मैं तेरा पहरेदार।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे पूरे शरीर में खून जम गया। मैंने अपनी जीभ को तालू से चिपका हुआ महसूस किया।
"कौन?" मैंने पूछा। आवाज़ निकली, पर फटी हुई। जैसे किसी पुराने घड़े से आख़िरी बूँद गिर रही हो।
कालू काका ने अपनी आँखें बंद कर लीं। और उन्होंने नाम बोला — बहुत धीरे, जैसे वो नाम बोलने से ही कोई ज़हर फैल जाएगा।
"दीनू।"
मीरा की साँस रुक गई। टिंकू के हाथ से लड्डू का डिब्बा छूट गया और मिट्टी में गिर गया। वो बच्चा कुछ समझा नहीं, पर कालू काका के चेहरे को देखकर उसने भी अपना मुँह छोटा कर लिया, जैसे किसी बड़े आदमी के रोने को देखकर बच्चा चुप हो जाता है।
मैं वहीं बैठा रह गया, चुप्पी में, ये सोचते हुए कि जिस आदमी ने मुझे मेरे पापा की ज़ुबान से सारी कहानी सुनाई थी — "तेरे पापा मेरे भाई थे, बेटा, सगे से भी सगे" — वही आदमी उस रात मेरे पापा को मरते देखने आया था।
मैंने अपनी मुट्ठी मिट्टी में गड़ा दी। उँगलियों के बीच वो ठंडी मिट्टी भर गई, वही मिट्टी जिसमें मैं रोज़ पसीना बहाता आया था।
"काका," मैंने बहुत धीरे कहा, "ये तुमने अब तक क्यों नहीं बताया?"
कालू काका ने अपनी आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ़ उनके होंठ हिले।
"डर था, बेटा। पर अब तेरी आवाज़ में वो बात है जो तेरे पापा में थी। इसलिए आज बोल दिया।"
"और कटोरा?" मीरा ने पूछा। "वो कटोरा अब भी वहीं है?"
कालू काका उठे। उनकी कमर टूटी हुई थी, पर उन्होंने सीधा खड़े होने की कोशिश की। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"चल, बेटा। आज तो हम दोनों दीनू के सामने खड़े होंगे। पहले वो काग़ज़ निकालेंगे, फिर उससे पूछेंगे — दीनू, बता, उस रात तूने शेर सिंह को पानी किसने दिया था?"
॥
उस रात मैं सोया नहीं। करवटें बदलता रहा, और हर बार आँख बंद करते ही कालू काका का वो नाम कानों में गूँजता — दीनू। वही दीनू जिसने मुझे आँगन में बैठाकर चाय पिलाई थी, जिसकी आँखों में पापा की याद भरी थी, जिसने कहा था — "तेरे पापा मेरे भाई थे, बेटा।"
सुबह होते ही मैंने मीरा को जगाया। टिंकू दरवाज़े पर पहले से खड़ा था, हाथ में लड्डू का डिब्बा, चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान नहीं।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "आज तेरे चेहरे पर वो बात नहीं है।"
"कौन सी बात?"
"जो कल थी। जो कहती थी — मैं लड़ूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मैंने अपनी धोती कसी और बाहर निकल पड़ा।
दीनू का घर गाँव के उस पार था, नहर के किनारे, जहाँ पुरानी ईंटों की झोपड़ी थी। मैंने सोचा था सुबह-सुबह वो अपने आँगन में बैठा होगा, चाय की केतली चढ़ा रहा होगा, और मुझे देखकर उठ खड़ा होगा — "अरे वीर, इतनी सुबह!"
पर झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। खुला, और खाली।
मैं अंदर गया। चूल्हा ठंडा था। राख में उँगली डाली तो बिलकुल ठंडी — तीन-चार दिन पुरानी। चारपाई पर चादर बिखरी थी, जैसे कोई जल्दी में उठकर भागा हो।
टिंकू ने पीछे से कहा, "भाई, ये तो…"
"चुप।"
मैंने आँखें बंद कीं। झोपड़ी में हवा थी, पर उसमें वो गंध नहीं थी — दीनू के तेल वाले बालों की, उसकी पुरानी चादर की, उसके हाथों की मिट्टी की। जो गंध थी, वो डर की थी। पसीने की, जल्दबाज़ी की।
बाहर से एक बूढ़ी आवाज़ आई।
"कौन है? दीनू का कोई रिश्तेदार?"
मैं बाहर निकला। पड़ोस की झोपड़ी से एक बूढ़ा आदमी आ रहा था, कमर झुकी, हाथ में लाठी। उसने मुझे देखा और उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
"अरे, तू तो शेर सिंह का बेटा है। वही जो अखाड़े में…"
"हाँ। दीनू कहाँ है?"
बूढ़े ने लाठी से ज़मीन खुरची। "तीन दिन पहले चला गया। कोई डरा हुआ था। आधी रात को उठा, अपना बोरिया-बिस्तर बाँधा, और जाते वक़्त मेरे दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। आँखों में पानी था। बोला — 'काका, मैंने अपनी जान बचा ली। अब कोई मुझे नहीं ढूँढेगा।' मैंने पूछा कहाँ जा रहा है, तो बोला — 'जहाँ शेर सिंह की याद भी न पहुँचे।'"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने झोपड़ी की दीवार का सहारा लिया।
तो जिस आदमी ने मुझे सच बताया, वो सच बताकर भाग गया। अपनी जान बचाने के लिए। मेरी जान नहीं, अपनी।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर मज़बूत।
"वीर, अंदर चल। कुछ तो छोड़ गया होगा। भागने वाला आदमी खाली हाथ नहीं भागता।"
हम अंदर गए। टिंकू ने चारपाई के नीचे हाथ डाला, झाड़ू की तरह सब बाहर खींचा — पुरानी रस्सी, टूटा कटोरा, एक जोड़ी चप्पल।
मैं कोने में गया जहाँ मिट्टी का फ़र्श थोड़ा उभरा हुआ था। कुछ मुझे खींच रहा था वहाँ। मैंने हाथ से मिट्टी हटाई। नाखूनों में मिट्टी भर गई। थोड़ा और, थोड़ा और।
और फिर मेरी उँगली किसी सूखी चीज़ से टकराई।
काग़ज़।
एक पुराना, मुड़ा हुआ, पीली पड़ चुका काग़ज़। मैंने उसे निकाला और झाड़ा। उस पर दीनू की लिखाई थी — मैंने उसकी लिखाई पहचानी, क्योंकि एक बार उसने मेरे लिए कुछ लिखा था, माँ का नाम, जब वो बीमार थी।
मैंने वो काग़ज़ दोनों हाथों से पकड़ा। मीरा मेरे पास आकर बैठ गई। टिंकू चुपचाप खड़ा रहा, हाथ में डिब्बा दबाए।
मैंने पढ़ना शुरू किया।
वीर बेटा,
अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मतलब मैं जा चुका हूँ। या जाने वाला हूँ। मुझे माफ़ कर दे, बेटा।
मैं उस रात वहाँ था। तेरे पापा की मौत वाली रात। मैं तहखाने की सीढ़ियों पर खड़ा था, और मैंने देखा — माधव सिंह ने तेरे पापा के हाथ में वो कटोरा थमाया, और तेरे पापा ने उसे पिया। मैंने कुछ नहीं किया। मैं डर गया था। मेरे पैर जम गए थे, बेटा। मैं भाग गया।
मैंने तुझे सब सच बताया, पर एक सच मैंने नहीं बताया — कि मैं वहाँ था। मैं शेर सिंह का भाई था, और मैं उसे मरते देखकर भाग गया।
मुझे माफ़ करना, शेर सिंह।
और फिर नीचे एक लाइन थी, जो थोड़ी अलग लिखाई में थी, जैसे बाद में जोड़ी गई हो।
और वीर, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो जान ले — तेरे पापा ने मरने से पहले भैरव को बचाया था।
मेरे हाथ रुक गए। मैंने उस लाइन को दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार।
"क्या?" मीरा ने पूछा। "वीर, क्या लिखा है?"
मेरी आवाज़ नहीं निकली। मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
वो पढ़ने लगी। और जैसे-जैसे पढ़ती गई, उसका चेहरा बदलता गया। उसने मुँह पर हाथ रख लिया।
"वीर…"
"उस रात भैरव कुएँ में गिर गया था," मैंने कहा, आवाज़ ऐसी जैसे किसी और की हो। "और मेरे पापा ने उसे निकाला। मेरे पापा ने उसे बचाया — उसी भैरव को, जो उन्हें मरवा रहा था।"
टिंकू ने डिब्बा ज़मीन पर रख दिया। उसकी आँखें भर आई थीं, और वो उन्हें पोंछ भी नहीं रहा था।
"भाई," वो बोला, "तेरे पापा…"
"मेरे पापा बड़े आदमी थे, टिंकू।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। "इतने बड़े कि उन्होंने अपने कातिल को भी नहीं मरने दिया।"
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