Spirit of a Fighter – Chapter 702
"काका," वो बोली, "वो कटोरा माधव सिंह का अपना हाथ से दिया हुआ है। उस पर उनकी सील हो सकती है। अगर हम वो निकाल लें, तो ये साबित हो जाएगा कि उन्होंने गवाह को खरीदने की कोशिश की है।"
कालू काका ने उठकर अखाड़े की पूरब वाली दीवार की तरफ़ इशारा किया।
"वहाँ। नीम के पेड़ के नीचे, तीसरा पत्थर। मैं उसी दिन अँधेरे में गाड़कर आया था।"
मैं उठने लगा, पर कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ मज़बूत थी — जैसे वो मुझे किसी और चीज़ से रोक रहे हों।
"रुक, बेटा। एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
लालटेन की लौ फिर हिली। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे धीमी हो रही हो।
"उस रात — जिस रात मैंने माधव को भैरव से ये बात कहते सुना — माधव के साथ एक और आदमी था। वो छाया में खड़ा था, मैं उसे ठीक से नहीं देख पाया। पर जब वो बाहर निकला, मैंने देखा।"
उन्होंने रुककर मेरी आँखों में देखा।
"वो आदमी तेरे पापा का सबसे करीबी था, बेटा। वो उनका दाहिना हाथ था। जिसके साथ तेरे पापा हर रात चूल्हे पर बैठकर रोटी खाते थे।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे पूरे शरीर में खून जम गया।
"कौन?" मैंने पूछा। आवाज़ निकली, पर फटी हुई।
कालू काका ने अपनी आँखें बंद कर लीं। और उन्होंने नाम बोला — बहुत धीरे, जैसे वो नाम बोलने से ही कोई ज़हर फैल जाएगा।
"दीनू।"
मीरा की साँस रुक गई। टिंकू के हाथ से लड्डू का डिब्बा छूट गया और मिट्टी में गिर गया।
और मैं वहीं बैठा रह गया, चुप्पी में, ये सोचते हुए कि जिस आदमी ने मुझे मेरे पापा की ज़ुबान से सारी कहानी सुनाई थी — वही आदमी उस रात मेरे पापा को मरते देखने आया था।
"काका," मैंने बहुत धीरे कहा, "ये तुमने अब तक क्यों नहीं बताया?"
कालू काका ने अपनी आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ़ उनके होंठ हिले।
"डर था, बेटा। पर अब तेरी आवाज़ में वो बात है जो तेरे पापा में थी। इसलिए आज बोल दिया।"
मैंने अपनी आँखें मलीं। सोचा, कहीं कालू काका बूढ़े हो गए हैं, नाम भूल रहे हैं। पर उनकी आवाज़ में वो काँप नहीं थी जो भूलने से आती है। उसमें वो काँप थी जो बीस साल से दबी हुई सच्चाई बोलते वक़्त आती है।
"दीनू," मैंने दोहराया। "दीनू काका? जो पापा के साथ अखाड़े का हिसाब रखते थे? जो हमारे घर हर रविवार आते थे और मुझे कंधे पर बिठाकर ले जाते थे?"
कालू काका ने आँखें खोलीं। उनमें वो पुराना डर अब भी बैठा था, जैसे कोई जानवर माँद में दुबका हो और बाहर निकलने से डर रहा हो।
"वही। जिसे तू दीनू चाचा कहता था। जिसने तेरे पापा की मौत के बाद तेरी माँ के हाथ में पहला गिलास पानी दिया था। और जिसने उसी हफ़्ते अखाड़े का सारा हिसाब अपने नाम कर लिया।"
मेरे पेट में जो झटका लगा, वो पहले के सारे झटकों से भारी था। दीनू चाचा। जिनकी गोद में बैठकर मैंने सुना था कि शेर सिंह कैसे एक हाथ से भैंस को गिरा देते थे। जो हर बार कहते थे — तेरे पापा मेरे भाई थे, बेटा। सगे से भी सगे।
"तुम पक्के हो?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ कंधे पर बँधी हुई थीं। "चाँदनी रात थी या अँधेरा? बीस साल पहले की बात है, काका। किसी को ग़लतफ़हमी हो सकती है।"
कालू काका ने मीरा की तरफ़ देखा। फिर वो धीरे से उठे और अखाड़े के उस कोने की तरफ़ चलने लगे जहाँ पुरानी लालटेन टँगी थी। उन्होंने उसे उतारा, अपनी जेब से माचिस निकाली, और जलाया। पीली रोशनी में उनका चेहरा और भी झुर्रियों वाला लगा, जैसे मिट्टी सूखकर फट गई हो।
"मैं उस रात छुपकर गया था," वो बोले। "क्योंकि उस दिन दोपहर को माधव सिंह ने मुझे धमकाया था — कालू, अगर तूने एक बात बाहर फैलाई, तो तेरा भी वही हाल होगा जो शेर सिंह का हुआ।"
उनकी आवाज़ रुक गई। उन्होंने गला साफ़ किया।
"तो मैं रात को चुपचाप गया। नीम के पेड़ के पीछे से देखा। माधव सिंह वहाँ खड़े थे, और उनके साथ दीनू। दीनू के हाथ में एक काग़ज़ था। माधव सिंह भैरव से बोल रहे थे — देख, ये काग़ज़ तेरे नाम कर दिया है। अब अखाड़ा तेरा है। बस एक काम करना है। और भैरव ने पूछा — क्या? तो माधव सिंह ने कहा — शेर सिंह को अखाड़े से हमेशा के लिए हटाना है।"
"और दीनू?" मीरा ने पूछा। "दीनू उस वक़्त क्या कर रहे थे?"
कालू काका ने लालटेन ऊपर उठाई। उसकी रोशनी उनके चेहरे पर पड़ी, और मैंने देखा कि उनकी आँखों में पानी भरा हुआ था।
"दीनू चुप खड़े थे। बस एक बार बोले — भैरव, तेरे पापा जो कह रहे हैं, वो करना। मैं तेरे साथ हूँ।" उन्होंने लालटेन नीचे की। "और बेटा, जब वो बाहर निकले, तो माधव सिंह ने दीनू के कंधे पर हाथ रखा और कहा — अच्छा किया दीनू। अब तू मेरा आदमी है। शेर सिंह तो पानी पीकर ख़त्म हो जाएगा, तेरे हाथ का पानी।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने उन्हें अपनी जाँघों पर रखकर दबाया।
"मेरे हाथ का पानी," मैंने धीरे से कहा। "मतलब… पापा को कोई ज़हर दिया गया था? कोई पानी?"
कालू काका ने सिर नीचा कर लिया।
"मुझे नहीं पता, बेटा। मैंने सिर्फ़ ये सुना कि पानी। उसके बाद जो हुआ, वो तेरे सामने है। तेरे पापा अखाड़े में पानी पीकर बीमार पड़े और दो हफ़्ते में चल बसे। डॉक्टर ने कहा — कमज़ोरी। पेट की बीमारी। पर मैं जानता था, और माधव सिंह भी जानते थे।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी जैसे खिसक गई हो। मैंने अखाड़े के उस पानी के मटके की तरफ़ देखा जो अब भी कोने में रखा था, ढका हुआ, ठंडा। बीस साल से वही मटका, वही पानी, और मैं रोज़ उसी अखाड़े में कुश्ती सीखने आता रहा।
"तो मैं बीस साल से उसी मिट्टी पर दाँव लड़ता रहा," मैंने कहा। "जिस मिट्टी में मेरे पापा का खून मिला है।"
"नहीं, बेटा।" कालू काका ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "उस मिट्टी में तेरे पापा का पसीना मिला है। खून नहीं। और पसीना कभी नहीं मरता। इसीलिए तू आज यहाँ खड़ा है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली ठंडी थी, पर पकड़ मज़बूत।
"काका," वो बोली, "दीनू अभी ज़िंदा हैं? गाँव में?"
कालू काका ने सिर हिलाया।
"ज़िंदा है। और सिर्फ़ ज़िंदा नहीं — वो अब माधव सिंह का दाहिना हाथ है। पंचायत का मुंशी है। हर काग़ज़ पर उसका दस्तख़त होता है। किसका नाम बही में चढ़ेगा, किसका कटेगा — सब दीनू तय करता है।"
मेरे मुँह से एक आवाज़ निकली, जो मैंने खुद नहीं सोची थी।
"तो मेरे पापा की मौत का सबूत उसी के पास होगा।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अब सिर्फ़ डर नहीं था। कुछ और भी था — जैसे कोई बूढ़ा जानवर जानता हो कि अब भागने की जगह नहीं बची।
"बेटा," वो बोले, "दीनू के पास वो काग़ज़ है जो माधव ने भैरव को दिया था। अखाड़े की ज़मीन का। मैंने उस रात देखा था — दीनू ने वो काग़ज़ अपनी जेब में रख लिया, भैरव को दिया नहीं। भैरव ने माँगा भी, तो दीनू बोले — बाद में देता हूँ, पहले काम हो जाने दो।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो अब मुझे पहचानने लगी थी — किसी तारे के टूटने जैसी।
"तो वो काग़ज़ आज भी दीनू के पास है," वो बोली। "और अगर वो काग़ज़ हमारे हाथ लग जाए, तो भैरव का दावा ख़त्म। अखाड़ा उसका नहीं रहेगा।"
कालू काका ने लालटेन नीचे रखी। फिर वो अचानक बैठ गए, अपने घुटनों पर हाथ रखकर।
"पर बेटा, एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा सा फैल गया। जैसे किसी ने गर्म पानी में बर्फ़ डाल दी हो।
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