Spirit of a Fighter – Chapter 697
"अलमारी के पीछे एक और दरवाज़ा है, बेटा।"
टिंकू ने लड्डू की डिब्बी पकड़ने वाला हाथ ढीला कर दिया।
"उस दरवाज़े के पीछे वो चीज़ है," कमला देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि नहर की आवाज़ भी उसे दबा दे, "जिसने मेरे बेटे को इंसान से जानवर बनाया। और वो चीज़ अब भी ज़िंदा है।"
"क्या चीज़?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ फट गई थी। "क्या है वो?"
वो खड़ी हो गईं, लाठी के सहारे, धीरे-धीरे, जैसे हर हड्डी अलग-अलग जवाब दे रही हो। उन्होंने अपना बक्सा उठाया।
"मैं वो नहीं बताऊँगी," वो बोलीं। "क्योंकि मैंने उसे सिर्फ़ एक बार देखा है, और उस एक बार ने मेरी नींद हमेशा के लिए छीन ली। अगर मैं तुझे बता दूँगी, तो तू वही सोचेगा जो मैंने सोचा था — और फिर तू कभी उस दरवाज़े तक नहीं पहुँचेगा।"
"तो मैं कैसे जानूँ?" मैंने कहा। "मैं अंधेरे में कैसे लड़ूँ?"
"तू अंधेरे में नहीं लड़ेगा," उन्होंने कहा। "तू अपनी नाक से लड़ेगा। जो गंध तुझे उस दरवाज़े तक ले जाए, वो गंध ही तुझे बताएगी कि अंदर क्या है। बस एक बात याद रखना —" उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "— जो चीज़ अंदर है, वो ताकत नहीं देती। वो ताकत छीनती है। मेरे बेटे ने उससे ताकत माँगी, और उसने उसका आदमीपन छीन लिया।"
वो पलटीं। और फिर जैसे कुछ याद आया, वो रुकीं।
"वीर," उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो सख्ती नहीं थी, बस एक थकी हुई माँ थी, "मैं एक बात कहने आई थी, और वो ये है — मैंने अपने बेटे को ज़हर पीते देखा, और मैं चुप रही। बीस साल चुप रही। अब नहीं रहूँगी। तू जब भी उस अलमारी को खोले, मुझे बुला लेना। मैं गवाही दूँगी। मैं अपने बेटे के खिलाफ़ खड़ी हो जाऊँगी। अब मुझे कोई डर नहीं।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
मीरा उठी और उनके पास गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस उनका हाथ पकड़ लिया। कमला देवी ने पहले तो हैरानी से देखा, फिर उनकी आँखें भर आईं, और उन्होंने मीरा का हाथ थाम लिया, दोनों हाथों से।
"तू अच्छी लड़की है," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "इसका खयाल रखना। इसके पापा बीस साल पहले इसी पुल पर खड़े थे, और मैंने उन्हें जाते देखा था। मैं फिर चुप रही। अब नहीं रहूँगी।"
वो पुल से उतरने लगीं। नहर के किनारे वाली पगडंडी पर, सफ़ेद साड़ी में, लाठी टेकती हुई, बक्सा हाथ में — कितनी छोटी लग रही थीं। कितनी अकेली।
"कहाँ जाओगी?" मैंने पीछे से पूछा।
वो पलटीं, और उनके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आई, पहली बार।
"अपनी बहन के गाँव," उन्होंने कहा। "वहाँ कोई नहीं जानता कि मैं किसकी माँ हूँ। वहाँ मैं सिर्फ़ कमला रहूँगी।" उन्होंने एक कदम और उठाया, फिर रुककर कहा, "और वीर, एक बात और। वो दरवाज़ा अंदर से बंद है, पर उसकी चाबी भैरव के पास नहीं है। भैरव खुद उस दरवाज़े से डरता है। वो बीस साल में एक बार भी उसे खुद नहीं खोल पाया।"
"तो चाबी किसके पास है?" मैंने पूछा।
वो हँसीं। छोटी, सूखी हँसी, जैसे पुराने पेड़ की छाल चटके।
"चाबी किसी के पास नहीं है," उन्होंने कहा। "दरवाज़े को खुद खुलना पड़ेगा। वो सिर्फ़ उसी के लिए खुलता है जिसके दिल में लालच न हो। मेरे बेटे ने उसे तोड़ने की कोशिश की, कुल्हाड़ी चलाई, आग लगाई — कुछ नहीं हुआ।" उन्होंने मेरी तरफ़ आख़िरी बार देखा। "तेरे पापा शेर सिंह को वो दरवाज़ा खुला मिला था। पर उन्होंने उसे खोला नहीं। उन्होंने उसे बंद ही रहने दिया। यही फर्क है, बेटा — ताकत वो माँगता है जो कमज़ोर है। जो ताकतवर है, वो उसे छोड़ देता है।"
वो चली गईं। पगडंडी पर धूल उड़ती रही, फिर बैठ गई।
टिंकू ने धीरे से कहा, "मेरी माँ कहती है — बूढ़े लोग सच बोलते हैं, पर हम सुनते देर से हैं।"
मैंने पीतल की गोली को अपनी मुट्ठी में कस लिया। जंग लगी, ठंडी, छोटी-सी। पर मुझे लगा जैसे मैंने पूरी अलमारी अपने हाथ में उठा ली हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अलमारी के पीछे वाला दरवाज़ा," वो बोली। "ये कहानी में कहीं नहीं आया। मेरे पापा ने भी कभी नहीं बताया।"
"क्योंकि वो खुद डरते हैं," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में एक बात थी जो पहले नहीं थी — ज़िद। "पर अब डरने की बारी उनकी है।"
मैं पुल से नीचे उतरा। नहर का पानी बह रहा था, और मेरी नाक में अब भी वो जंग लगी गंध थी। पर उसके नीचे, बहुत नीचे, एक नई गंध जुड़ गई थी — मीरा के हाथों की औषधि की गंध, टिंकू के लड्डू की मिठास, और पुल की मिट्टी की गीली बू।
तीन गंध। तीन लोग। एक रास्ता।
और उस रास्ते के आख़िर में एक दरवाज़ा था जो सिर्फ़ उसी के लिए खुलता था जिसके दिल में लालच न हो।
मैंने गोली जेब में रखी और पीछे मुड़कर देखा। कमला देवी पगडंडी पर छोटी होती जा रही थीं, सफ़ेद साड़ी में, धूल भरे रास्ते पर एक सफ़ेद धब्बे की तरह।
और तभी टिंकू ने मेरा कंधा थाम लिया।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अजीब थी, "उधर देख।"
मैंने उसकी उँगली की तरफ़ देखा। नहर के उस पार, दूर, जहाँ शहर जाने वाला रास्ता मुड़ता है, धूल उड़ रही थी। कोई आ रहा था। तीन-चार आदमी, साइकिलों पर, तेज़।
और उनके आगे, एक लंबा आदमी, जिसके हाथ में कुछ चमक रहा था। सूरज की रोशनी में पीतल जैसा।
मीरा ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"वो कौन है?" उसने फुसफुसाया।
मैंने आँखें सिकोड़ीं। आदमी करीब आ रहा था, और उसकी चाल में एक जानी-पहचानी-सी अकड़ थी।
"हरनाम का भाई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मुझे सुनाई दी, शांत, जैसे किसी और की हो। "हरनाम जो कल मरा। अब ये हिसाब माँगने आया है।"
टिंकू ने अपनी डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"लड्डू खा ले," उसने कहा। "क्योंकि ये बात लड़ाई से पहले की है।"
मैंने लड्डू लिया। मुँह में रखा। मीठा था, और उस मिठास में अचानक मुझे माँ की याद आई — चूल्हे पर आधी जली रोटी, और वो कहती थीं कि भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।
साइकिलों की घंटियाँ बजीं। धूल और करीब आई।
मैंने गोली जेब में दबाई, और अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
अलमारी का ताला खुलेगा। वो दरवाज़ा खुलेगा। और मैं उसके पीछे जो भी है, उससे मिलूँगा — चाहे वो बीस साल पुराना ज़हर हो या कोई जानवर।
पर पहले इस धूल भरे रास्ते से हरनाम के भाई को लौटना पड़ेगा।
॥
साइकिलों की घंटियाँ करीब आ रही थीं। मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और सामने देखा। लंबा आदमी साइकिल से उतरा। उसके हाथ में पीतल की कोई चीज़ चमक रही थी। पीछे तीन और आदमी थे, सबके हाथों में लाठियाँ।
उसकी आँखें लाल थीं। मुँह पर दाढ़ी दो दिन की बढ़ी हुई। चलने में वो लड़खड़ा रहा था, पर आँखों में जो था, वो नशा नहीं था। दुख था।
"तू वही है न?" उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। "जो मेरे भाई को मारकर आया?"
मैंने एक कदम आगे रखा। टिंकू मेरे पीछे आ गया और मीरा ने मेरी बाँह पकड़ ली। मैंने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया। उसने हाथ छोड़ दिया।
"तेरा भाई अपने हाथों से नहीं मरा," मैंने कहा। "उसके मुँह में ज़हर भैरव ने डाला था। और उसकी मुट्ठी में ये चाबी थी।" मैंने जेब से पीतल की गोली निकाली। "ये भैरव की अलमारी खोलती है। तेरा भाई उसका हिसाब रखता था, और उसी हिसाब ने उसे मार डाला।"
वो आदमी रुका। उसके पीछे के तीनों आदमियों ने लाठियाँ थोड़ी नीची कर लीं।
"झूठ," उसने कहा। पर आवाज़ में वो ज़ोर नहीं था जो अभी था।
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