Spirit of a Fighter698 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 698

7 min read November 5, 2026

"झूठ नहीं," मीरा बोली। वो आगे आकर मेरे बराबर खड़ी हो गई। "मैंने खुद उसकी लाश देखी। मुँह से झाग। और मैं आयुर्वेद पढ़ती हूँ — वो ज़हर था, बीमारी नहीं। जो ज़हर भैरव बीस साल से बोतलों में घोल रहा है।"

उस आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़। फिर अपने भाई की चाबी की तरफ़, जो मेरी हथेली में थी। उसका जबड़ा कसा। आँखों में पानी आ गया, पर उसने पोंछा नहीं।

"हरनाम मेरा बड़ा भाई था," उसने धीरे से कहा। "हम दो भाई थे। माँ-बाप नहीं थे। वो मुझे पढ़ाता था, मेरी शादी करवाई। उसने कहा था — 'छोटू, एक दिन हम अखाड़े के मालिक बनेंगे।' वो सपना देखता था। सपने देखने वाले…" उसकी आवाज़ टूट गई। "सपने देखने वाले ऐसे नहीं मरते।"

मैंने उसकी तरफ़ चाबी बढ़ाई।

"ले," मैंने कहा। "ये तेरे भाई की चीज़ है। मैं इसे अपने पास नहीं रखूँगा। पर सुन — जब तू भैरव के सामने जाएगा, तो तेरे पास सिर्फ़ ये चाबी होगी। भैरव के पास सौ आदमी हैं। मेरे पास अभी चार हैं — मैं, ये, टिंकू, और एक बूढ़ा जो मिट्टी सींचता है।"

वो चुप रहा।

"पर मेरे पास एक चीज़ और है," मैंने कहा। "मेरे पास वो सच है जो तेरे भाई ने अपनी जान देकर छोड़ा। अगर तू मेरे साथ चलेगा, तो तेरा भाई का बदला मिलेगा। अगर तू अकेले जाएगा, तो तेरा भाई का बदला भैरव को और मज़बूत बनाएगा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबा, काला, थका। और फिर उसने चाबी ली। मुट्ठी में कसी। और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"मेरा नाम चुन्नी है," उसने कहा। "हरनाम का छोटा भाई। और अगर तू मेरे भाई की इज़्ज़त लौटा देगा, तो मेरी जान तेरी है।"

मैंने उसका हाथ थामा। उसकी हथेली कठोर थी, चमड़े जैसी। उसने मेरा हाथ ज़ोर से दबाया। और उसके पीछे के तीन आदमियों ने लाठियाँ ज़मीन पर रख दीं।

टिंकू ने आगे आकर उसकी तरफ़ लड्डू बढ़ाया। "पहले मुँह मीठा कर ले, भाई। हिसाब-किताब बाद में।"

चुन्नी ने लड्डू देखा। पहले तो वो कुछ नहीं बोला, फिर उसने लड्डू मुँह में रखा। और उसकी आँखों से एक आँसू गिरा। बस एक। उसने तुरंत पीछे मुँह मोड़ लिया।

कमला देवी अभी भी पगडंडी पर थीं। मैं दौड़कर उनके पास पहुँचा। उनकी सफ़ेद साड़ी धूल से भर गई थी, और उनके हाथ में एक छोटी पोटली थी।

"बेटा," उन्होंने कहा, और आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आवाज़ में होती है, "मुझे कस्बे की गाड़ी पकड़नी है। मेरी बहन रहती है वहाँ। उसके पास जाऊँगी।"

टिंकू ने अपनी साइकिल उनकी तरफ़ बढ़ा दी। "मैं छोड़ आता हूँ, दादी।"

वो मुस्कुराईं। फिर मेरी तरफ़ देखा। और उनका हाथ मेरे सिर पर रख दिया।

"तू लड़ेगा न?" उन्होंने पूछा।

"लड़ूँगा," मैंने कहा।

"मेरा बेटा भी लड़ा था," उन्होंने कहा। "पर वो गलत चीज़ से लड़ा। अपने बाप से, अपनी मिट्टी से, अपने आप से। और हार गया। तू याद रख — लड़ाई तलवार से नहीं जीती जाती। लड़ाई उस सवाल से जीती जाती है जो तू दुश्मन के सामने रखता है। मेरा बेटा सवाल पूछना भूल गया था।"

उन्होंने पोटली खोली। उसमें एक छोटी सी लोहे की कड़ी थी, और उसके साथ एक टूटा-सा पीतल का छल्ला।

"ये दरवाज़े की कड़ी है," उन्होंने कहा। "जो अलमारी के पीछे है। पर याद रख — ये कड़ी तेरे काम नहीं आएगी। ये सिर्फ़ उस दरवाज़े को दिखाती है। दरवाज़ा खुद खुलेगा, उस आदमी के लिए जिसके दिल में लालच न हो। और तू…" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "तू अभी से सोच ले — तेरे दिल में क्या है? अगर जवाब 'बदला' है, तो लौट जा। दरवाज़ा नहीं खुलेगा।"

मैंने कड़ी ली। ठंडी थी। और भारी।

"मेरे दिल में बदला नहीं है," मैंने कहा। "मेरे दिल में बीस साल का सच है जो किसी ने नहीं सुना। और मैं उसे सुनाऊँगा।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से हँसीं। "तू बोलने में अपने बाप जैसा है। शेर सिंह भी ऐसे ही बोलता था — बड़ी-बड़ी बातें, और फिर मिट्टी में सो जाता था।" उन्होंने मेरा गाल थपथपाया। "देख, तेरे हाथ में जो कड़ी है — उसे मत खोना। और मुझे मत ढूँढना। जब सच बाहर आएगा, तब मैं खुद आ जाऊँगी।"

वो साइकिल पर बैठीं। टिंकू ने पीछे बैठकर साइकिल चलाई। धूल उड़ी और फिर बैठ गई।

मीरा मेरे पास आई। उसका हाथ अभी भी थोड़ा काँप रहा था।

"ये औरत…" उसने कहा, "ये औरत अपने बेटे के खिलाफ़ सब कुछ दे गई। अपना घर छोड़ दिया। अपना नाम छोड़ दिया।"

"माँ होना आसान नहीं है," मैंने कहा। और तभी मुझे अपनी माँ याद आई — चूल्हे पर आधी जली रोटी, और वो कहती थीं कि भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।

मैंने चुन्नी की तरफ़ देखा। वो अपने तीन आदमियों के साथ नहर के किनारे बैठ गया था। उसके हाथ में चाबी थी और वो उसे बार-बार पलट रहा था, जैसे उससे कुछ पूछ रहा हो।

"चुन्नी," मैंने कहा। "तेरे पास कितने आदमी हैं जो तेरे भाई की इज़्ज़त के लिए खड़े होंगे?"

उसने सिर उठाया। "गाँव में दस। शहर में पाँच। और…" वो रुका। "अखाड़े में चार, जो भैरव की तनख्वाह लेते हैं, पर हरनाम के नीचे काम करते थे।"

"उन चारों को कल सुबह मेरे पास भेज दे," मैंने कहा। "कह देना — वीर सिंह बुला रहा है। जो आएगा, उसका हिसाब साफ़ होगा। जो नहीं आएगा, उसका हिसाब भैरव करेगा।"

चुन्नी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसके होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई। "तू पहलवान कम है, सरदार ज़्यादा।"

"मैं जो हूँ, वो हूँ," मैंने कहा। "बस सच के साथ खड़ा हूँ।"

रात को मैं, मीरा और टिंकू रणवीर सिंह के घर पहुँचे। उनका घर अखाड़े के पीछे था — पक्का, पर सादा। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं — पहलवानों की, मिट्टी की, और एक बड़ी-सी तस्वीर रणवीर सिंह की, जिसमें वो जवान थे, मिट्टी में लिपटे, मूँछें काली, आँखों में आग।

वो व्हीलचेयर पर बैठे थे। उनके सामने मेज़ पर एक लोटा पानी था और एक तश्तरी में दो रोटियाँ, जो ठंडी हो रही थीं। लगता था उन्होंने खाना नहीं खाया।

"आ गए," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो गरज थी, पर साँस फूल रही थी। "बैठो।"

मैं बैठ गया। मीरा उनके पास गई और उनके पैरों पर हाथ रखकर बैठ गई। उन्होंने उसका सिर सहलाया।

"पापा," मीरा ने कहा, "अब वक़्त आ गया है। हम सबको बाहर भेज देंगे।"

रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या प्लान है?"

मैंने कड़ी मेज़ पर रखी। "कल सुबह मैं अखाड़े जाऊँगा। अलमारी खोलूँगा। अगर वो दरवाज़ा खुला, तो जो भी उसके पीछे है — सबके सामने आएगा। और अगर नहीं खुला…" मैंने रुककर उनकी आँखों में देखा। "तो मैं भैरव के सामने खुद को हारूँगा नहीं। मैं उसके सामने वो सवाल रखूँगा जो उसे तोड़ देगा।"

"कौन सा सवाल?"

"ये कि उसका बाप कौन है।"

रणवीर सिंह के हाथ मेज़ पर कस गए। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।

"माधव सिंह," उन्होंने धीरे से कहा। "वो सरपंच है। गाँव का मालिक। और भैरव का असली बाप।"

मीरा ने सिर उठाया। "पापा, ये आपने मुझे कभी नहीं बताया।"

"क्योंकि मैं तुझे बचाना चाहता था," रणवीर सिंह ने कहा। "माधव सिंह वो आदमी है जिसने बीस साल पहले मेरे पैर काटे। वो मेरा दोस्त था। हम साथ पहलवानी करते थे। पर जब शेर सिंह की मौत हुई, तब माधव ने भैरव का हाथ पकड़ा और कहा — 'अब तू मेरा है।' मैंने उसे रोकना चाहा, पर उस रात…" उनकी आवाज़ भर्रा गई। "उस रात माधव ने मुझे एक गिलास पानी दिया। प्यार से। कहा — 'यार, तू थक गया है, पी ले।' मैंने पी लिया। सुबह मेरे पैर सून्न थे। और उसके बाद मैंने कभी उसका नाम नहीं लिया। क्योंकि उसके पास गाँव था, पंचायत थी, पुलिस थी। मेरे पास थी सिर्फ़ एक बेटी, जो गोद में थी।"

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