Spirit of a Fighter – Chapter 695
"तो सुन," टिंकू ने कहा, और उसने मेरा कंधा पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी — उस दुबले शरीर में जो ताकत थी, वो शायद किसी ने नहीं देखी थी। "अगर अदालत में कोई कहे कि ये बीमारी है, तो मैं खड़ा होकर कहूँगा — तो मुझे भी हो जाए। मैं भी इसके जैसा बन जाऊँ। मैं भी सूंघ सकूँ कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। क्योंकि भाई, जो चीज़ तुझे इंसानों से जोड़ती है, वो बीमारी कैसे हो सकती है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने उन्हें रगड़ा, पर पानी रुका नहीं।
"तेरी नाक तेरी कमज़ोरी नहीं है, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तेरी पहचान है। जब मैं तेरे साथ बैठता हूँ, तो मुझे पता है कि तू मेरी खीर में कितनी शक्कर डाली है, बिना चखे। जब तू मेरे पास आता है, तू मुझे बता सकता है कि मैं आज कितना थका हूँ, बिना मुझसे पूछे। तू मेरे मुँह से पहले जान जाता है कि मैं खुश हूँ या दुखी। दुनिया में कितने लोग ऐसे हैं, बोल?"
मैंने सिर नीचा कर लिया। बारिश मेरे बालों में भर रही थी और पानी मेरे गालों पर उतर रहा था, और मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि कौन-सा पानी बारिश का है और कौन-सा मेरी आँखों का।
"और एक बात," टिंकू फिर बोला, और इस बार उसकी आवाज़ में वो पुरानी शरारत लौट आई थी। "अगर तू लड़ेगा नहीं, तो मेरा 'वीर लड्डू' बिगड़ जाएगा। और फिर मैं तेरा नाम बदलकर 'डरपोक लड्डू' रख दूँगा। सोच — पूरा गाँव कहेगा, 'अरे वो डरपोक लड्डू खाने चलो'। तेरी इज़्ज़त का सवाल है भाई।"
मैं हँसा। इस बार हँसी में आँसू भी थे, पर शर्म नहीं थी। और मैंने उस लड्डू को उठाया, मुँह में डाला, और चबाया। मीठा था। गरम था। और उसमें वो स्वाद था जो मैंने कभी नहीं चखा था — जैसे किसी ने अपना पूरा दिल घोलकर डाल दिया हो।
"तीसरा लड्डू तेरा," मैंने कहा, मुँह भरा हुआ। "और जब मैं जीतूँगा, तो पूरे अखाड़े को खिलाऊँगा। तेरे हाथ से।"
टिंकू की आँखें चमक उठीं। और फिर उसने वो किया जो वो हमेशा करता है — बड़ी बात।
"पूरा अखाड़ा क्यों?" उसने कहा, छाती फुलाकर। "पूरा गाँव! और ज़िला! और भाई, एक दिन तो मैं सोच रहा हूँ कि मिठाई की गाड़ी निकालूँ — पीछे-पीछे बैंड बाजा, और आगे तेरा फोटो, और नीचे लिखा हो — 'वीर सिंह, भारत केसरी'।"
"अबे, भारत केसरी तो अभी जीता नहीं," मैंने कहा।
"तो क्या हुआ?" उसने कंधे उचकाए। "मैंने तो अपनी दुकान का नाम भी अभी से बदल दिया है — 'टिंकू मिष्ठान भंडार' से 'टिंकू एंड वीर मिष्ठान भंडार'। बोर्ड बन रहा है। पेंटर को पैसा भी दे दिया।"
मैं हँसते-हँसते बेडौल हो गया। और उस हँसी में रात भर का डर, बचपन की हँसी, रणवीर सिंह की चुप्पी, माँ की आधी जली रोटी — सब घुल गया। कुछ पल के लिए मैं वही वीर था — बिना किसी बोझ के।
तभी मेरी नाक ने कुछ पकड़ा। तेज़। अचानक। जैसे किसी ने मेरे होश में झटका दे दिया हो।
चंदन। और गीली मिट्टी। और… पुरानी किताबों की गंध।
मैं सीधा खड़ा हो गया। मेरी हँसी बंद हो गई।
"क्या हुआ?" टिंकू ने पूछा, घबराकर।
"कोई आ रहा है," मैंने कहा। "गली के मोड़ से। अभी।"
टिंकू ने गली की तरफ़ देखा। खाली थी। फिर मेरी तरफ़। उसके चेहरे पर सवाल था, पर उसने कुछ नहीं पूछा। वो मेरी नाक पर भरोसा करता था। हमेशा करता था।
और फिर मोड़ से एक औरत निकली। साठ के ऊपर। सफ़ेद साड़ी। हाथ में छोटा-सा पोटला। बाल पूरी तरह सफ़ेद, चेहरे पर झुर्रियाँ, पर आँखें — आँखें तेज़। बहुत तेज़।
वो सुक्खी बुआ थीं। पर आज उनके चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान नहीं थी। न चुगली की चमक। कुछ और था। कुछ गंभीर। और वो सीधे मेरी तरफ़ आ रही थीं, इतनी तेज़ कि उनकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था।
"अरे वीर!" वो दूर से ही चिल्लाईं, और उनकी आवाज़ में साँस फूल रही थी। "वीर, सुन!"
वो मेरे पास पहुँचीं और झुककर अपने घुटनों पर हाथ रख लिया। साँस लेने के लिए रुकीं। उनका चेहरा लाल था, पसीने से भीगा हुआ।
"बुआ, आराम से," मैंने कहा। "पानी लाऊँ?"
"पानी नहीं!" उन्होंने हाथ उठाकर मना किया। "अरे मैंने तो सुना है —" उन्होंने साँस भरी, "— कि भैरव की माँ आज गाँव छोड़कर जाने वाली है!"
मैं सन्न रह गया। भैरव की माँ। वो बूढ़ी औरत जो अखाड़े में आई थी, जिसने भैरव का सारा झूठ खोला था, जिसने कहा था कि भैरव माधव का बेटा है। वो जा रही थी?
"कहाँ जा रही हैं?" मैंने पूछा। "क्यों?"
सुक्खी बुआ ने अपना पोटला कसकर पकड़ा। और फिर उन्होंने वो कहा जिससे मेरे पैरों तले की ज़मीन हिल गई।
"जाते-जाते वो कुछ ऐसा बोलेगी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ बता रही हों, "जिससे भैरव की नींव हिल जाएगी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़। और फिर मैंने सुक्खी बुआ से पूछा, और मेरी आवाज़ में वो सख्ती थी जो अब आती जा रही थी —
"कब? कहाँ?"
"अभी," बुआ ने कहा। "नहर के पुल पर। वो वहाँ से जाने वाली है। और वीर —" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, और उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, काँप रही थीं, "— वो तुझे बुला रही है। उसने कहा है कि वो तेरे बिना एक शब्द नहीं बोलेगी।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"चल," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में ज़रा भी हिचक नहीं थी। "मैं साथ चलता हूँ। और लड्डू की डिब्बी भी ले चलता हूँ — कुछ बात करनी हो तो मुँह मीठा हो जाएगा।"
मैं दौड़ पड़ा।
गली, फिर बाज़ार, फिर खेत। कीचड़ में पैर फिसलते रहे, पर मैं रुका नहीं। मेरे सीने में काग़ज़ था, जेब में शीशी थी, और दिल में एक ही सवाल — वो औरत क्या बोलेगी जिससे भैरव की नींव हिल जाएगी?
नहर का पुल दूर से दिखने लगा। और पुल पर, सफ़ेद साड़ी में, एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में लाठी थी और पैरों के पास एक छोटा-सा बक्सा। वो नहर की तरफ़ देख रही थी, जैसे कोई आख़िरी बार रास्ता नाप रही हो।
मैं पुल के पास पहुँचा। साँस फूल रही थी।
वो पलटीं। और उन्होंने मुझे देखा। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने किसी औरत में नहीं देखी थी — पछतावा, प्यार, और एक अजीब-सा डर। जैसे वो कुछ कहने आई हों जो बीस साल से उनके सीने में गड़ा है।
"आ गया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कंपन था। "मुझे पता था तू आएगा। जब से तेरी माँ ने तुझे जना है, तू हर उस जगह पहुँचता है जहाँ सच खड़ा होता है।"
उन्होंने अपनी लाठी को ज़मीन पर टिकाया। और फिर वो बोलीं, और उनकी आवाज़ में अब कंपन नहीं था — सिर्फ़ सच था।
"वीर, मैं जाने से पहले तुझे वो बात बताना चाहती हूँ जो मैंने बीस साल से अपने अंदर दबा रखी है। ये बात सुनकर तेरी दुनिया बदल जाएगी। और तू तय करेगा — तू मुझे माफ़ करेगा या नहीं।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। नहर का पानी पास ही बह रहा था, और हवा में गीली मिट्टी की गंध थी। मेरी नाक ने उनके हाथों की गंध पकड़ी — चंदन, गीली मिट्टी, और… लोहे की गंध। जंग लगे लोहे की।
वही गंध जो मुझे तहखाने में आई थी। वही गंध जो पापा के जंग लगे डिब्बे से आई थी।
मेरी साँस रुक गई।
"बोलिए," मैंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"
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"बोलिए," मैंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"
वो मेरी आँखों में देखती रहीं। एक लंबी साँस ली, जैसे बहुत गहरे कुएँ से बाल्टी खींच रही हों। फिर उन्होंने अपनी लाठी के सहारे पुल की रेलिंग पर हाथ रखा और धीरे से बैठ गईं, उसी छोटे बक्से के पास जो उनके पैरों के पास रखा था।
"बैठ," उन्होंने कहा। "खड़े-खड़े नहीं बोल पाऊँगी। घुटने जवाब दे रहे हैं।"
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