Spirit of a Fighter – Chapter 694
रणवीर सिंह की आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो बीस साल से सूखकर चर्मपत्र बन गई थी। उन्होंने अपने सून्न पैरों की तरफ़ देखा, फिर आग की तरफ़।
"मैं तुझे वो नहीं बताऊँगा जो तू सुनना चाहता है," वो बोले। "मैं तुझे वो बताऊँगा जो मैंने बीस साल से किसी को नहीं बताया। उस रात मैं भी अखाड़े में खड़ा था। शेर सिंह के पास। और मेरे हाथ में भी ताकत थी। पर जब भैरव ने मेरी तरफ़ देखा, तो मैंने आँखें नीची कर लीं। बस एक पल के लिए। और वो एक पल मेरी पूरी ज़िंदगी बन गया।"
उन्होंने व्हीलचेयर के हत्थे को कसकर पकड़ा।
"तू अब सोच रहा है कि तेरी नाक तेरे लिए मुसीबत है। कि अगर ये नाक न होती, तो तू आज इस मुकाम पर न होता। तू डरा हुआ है, वीर। मैं तेरी आँखों में देख रहा हूँ। तू डरा हुआ है कि कल अदालत में कोई कहेगा — ये लड़का पागल है, इसकी नाक कोई बीमारी है। और तेरा पूरा गाँव हँसेगा। जैसे बचपन में हँसा था।"
मेरा गला सूख गया। उन्होंने ठीक वो बात कह दी जो मैंने किसी को नहीं बताई थी। किसी को नहीं।
"तुम्हें कैसे पता?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ फटी हुई थी।
"क्योंकि मैंने वो हँसी सुनी है," वो बोले। "जब मैं पहली बार अखाड़े में उतरा था, तब मेरे पैरों में जूते नहीं थे। बाहर वाले सब हँसे थे। उस दिन मैंने तय किया कि मैं अब कभी बाहर वाला नहीं रहूँगा। और मैं कभी नहीं रहा — पर उसके लिए मुझे अपना आधा जीवन बेचना पड़ा।"
उन्होंने आग में एक लकड़ी डाली। चिंगारी उड़ी और हवा में घुल गई।
"वीर, तेरी नाक तेरी कमज़ोरी नहीं है। और न ही कोई बीमारी। ये वो चीज़ है जो भगवान ने तुझे दी है क्योंकि उसे पता था कि तू इसे संभाल सकेगा। तेरे पापा ने भी यही सोचा था। इसीलिए उसने तुझे ये लिखकर छोड़ा — किसी को मत बताना। क्योंकि जो इसे समझेगा, वो इसे तेरी ताकत मानेगा। और जो नहीं समझेगा, वो इसे तेरा पागलपन कहेगा। तू तय कर — तू किसकी बात सुनेगा?"
मैंने कुछ नहीं कहा। शब्द नहीं थे।
वो मुस्कुराए। थोड़ा-सा। थकी हुई मुस्कान।
"अब जा," उन्होंने कहा। "और सो जा। कल अदालत है। और अदालत में उसी तरह जाना जैसे तू अखाड़े में जाता है। मिट्टी से।"
मैं उठा। पर दरवाज़े तक पहुँचकर रुक गया। पलटकर देखा।
"पापा," मैंने कहा। शब्द मुँह से निकल गया, बिना सोचे। "आपने उस दिन आँखें नीची क्यों की थीं?"
वो चुप रहे। लंबा। बहुत लंबा।
"क्योंकि मेरी बेटी उस वक़्त मेरी गोद में थी," उन्होंने धीरे से कहा। "और मैं उसके सामने मरना नहीं चाहता था।"
मैं बाहर आ गया। और आँगन में खड़ा होकर, ठंडी हवा में, मैंने पहली बार महसूस किया कि रणवीर सिंह भी एक इंसान हैं। बीस साल से एक चुप्पी में जिंदा।
रात बहुत लंबी थी। और मुझे नींद नहीं आई।
मैं आँगन में बैठ गया। चूल्हा ठंडा हो चुका था, पर मिट्टी की गंध अभी भी उसमें बसी थी — आधी जली रोटी की गंध जो माँ ने जानबूझकर छोड़ी थी। जैसे कोई संदेश। जैसे कोई आवाज़ जो बिना शब्द कहे सब कह दे।
आसमान में तारे नहीं थे। बादल घिरे हुए थे। नीम के पेड़ की पत्तियाँ हवा में सरसराती रहीं, और मैं उन्हें सुनता रहा — जैसे कोई बहुत दूर से बुला रहा हो।
मेरी जेब में काली शीशी थी। भारी नहीं थी, पर लग रही थी जैसे पत्थर हो। और मेरे सीने में वो काग़ज़ था — पापा की लिखाई। मैंने उसे फिर से निकाला और चाँद की रोशनी में देखा। अक्षर टेढ़े-मेढ़े थे, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो। जैसे किसी को पता था कि ये आख़िरी बार है।
और तभी, बिना वजह, मुझे बचपन याद आ गया।
मैं सात साल का था। उस दिन बारिश हो रही थी और मैं आँगन में नंगे पैर भाग रहा था। तभी मुझे गंध आई — कुछ जला हुआ। किसी के घर में कुछ जल रहा था। मैं दौड़कर सुक्खी बुआ के घर गया और चिल्लाया — "बुआ, तुम्हारे चूल्हे पर रोटी जल रही है!"
वो दौड़ी। रोटी बच गई। बुआ हँसी थीं, बोलीं — "अरे वाह, इस नन्हे की नाक तो कमाल की है!"
पर उसके बाद जो हुआ, वो मैं कभी नहीं भूला।
गाँव के बच्चे मेरे पीछे पड़ गए। "कुत्ता! कुत्ता!" — वो चिल्लाते और मेरी तरफ़ लकड़ी फेंकते। एक लड़का, बड़ा, बबलू, उसने मेरी धोती खींच दी और सब हँसने लगे। मैं भागा। गिरा। कीचड़ में। और फिर दौड़कर माँ के पास गया — रोता हुआ, कीचड़ में लिपटा, और मेरी नाक बह रही थी, खून से नहीं, बस बह रही थी — ज़्यादा सूंघने से।
माँ ने मुझे गोद में उठाया। उन्होंने मेरा चेहरा अपनी साड़ी से पोंछा। और फिर उन्होंने वो कहा जो आज भी मेरे कानों में गूँजता है।
"बेटा, जो सबको सुनाई देता है, वो आम है। जो कोई नहीं सुन पाता, वो खास है। तू रो मत। तू तो वो आदमी है जो आँख बंद करके भी देख सकता है।"
मैंने उस दिन से किसी को नहीं बताया। किसी को नहीं। मैंने अपनी नाक को अपने अंदर छुपा लिया — जैसे कोई चोर अपनी चोरी छुपाता है। और बीस साल तक मैंने अपने आपको समझाया कि ये कोई तोहफ़ा नहीं, कोई सज़ा है।
रात के तीसरे पहर बारिश शुरू हुई। हल्की। मिट्टी पर गिरकर वो गंध उठी जो मुझे अखाड़े की याद दिलाती है। मैंने आँखें बंद कर लीं और आँगन की मिट्टी पर लेट गया। ठंडी थी। और उसी वक़्त कुछ हुआ जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था — मुझे लगा कि मिट्टी मुझे पहचान रही है। जैसे कोई बूढ़ी माँ अपने बेटे का चेहरा टटोलती है।
मैं वहीं सो गया। मिट्टी पर। बारिश में। और सुबह जब आँख खुली, तो पहली आवाज़ थी — टिंकू की।
"अरे भाई! तू यहाँ क्यों लेटा है? तू बीमार पड़ जाएगा, फिर मुकाबला कौन लड़ेगा? मैं?"
मैंने आँखें मलीं। टिंकू सामने खड़ा था — दुबला-पतला, सिर पर टोपी, कान के पीछे पेंसिल, और हाथ में एक पीतल की डिब्बी। उसके चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान थी, पर आज उसमें कुछ और था। गंभीरता।
"मैंने खीर नहीं लाई," उसने कहा, और डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "आज कुछ और लाया हूँ।"
मैं उठ बैठा। पीठ में दर्द था, पर उसकी बात सुनने के लिए मैं टिक गया।
"खोल," उसने कहा।
मैंने डिब्बी खोली। अंदर लड्डू थे। गोल, सुनहरे, ऊपर से चाँदी का वर्क लगा हुआ। और उनकी गंध — इतनी प्यारी कि मेरी आँखें भर आईं। घी, हल्दी, और कुछ जो मैं पहचान नहीं पाया — कुछ नया।
"ये नई मिठाई है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में गर्व था। "मैंने रात भर जागकर बनाई है। तीन बार बिगड़ी, चौथी बार बनी। और अब सुन — इसका नाम मैंने तेरे नाम पर रखा है। 'वीर लड्डू'।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार कई दिनों में। ज़ोर से। पेट पकड़कर।
"पगला गया है तू," मैंने कहा। "वीर लड्डू? ये क्या नाम हुआ?"
"नाम अच्छा है," उसने कहा, बिलकुल गंभीर। "और अब सुन। मैंने दुकान के बाहर बोर्ड भी टांग दिया है — 'वीर लड्डू — जीतने वाले पहलवान की मिठाई'। अब तू सोच — अगर तू मुकाबला नहीं लड़ेगा, तो मेरी मिठाई का नाम कौन बचाएगा? वो बोर्ड कौन सच करेगा?"
मेरी हँसी अटक गई। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहा था, पर उसकी आँखों में पानी था। और फिर वो मेरे पास बैठ गया, बारिश में भीगी मिट्टी पर, और उसने धीरे से कहा — ऐसे धीरे जैसे कोई बहुत भारी बात कह रहा हो।
"भाई, मैंने सुना है कल अदालत में कोई कहेगा कि तेरी नाक एक बीमारी है। कोई कहेगा कि तू पागल है, तू झूठा है, तू सबका ध्यान भटकाने के लिए नाटक कर रहा है।"
मेरा दिल धक् से रह गया। उसने वही कहा जिसका डर मुझे रात भर सता रहा था।
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