Spirit of a Fighter – Chapter 693
"तो फिर सुन," उन्होंने कहा। "मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। पर तेरी नाक — तेरी नाक ने आज मुझे एक बात बताई। जब तू आँगन में आया।"
मैं चौंका।
"मेरी नाक ने आपको क्या बताया?"
"मैंने तेरे पास खड़े होकर सूँघा," उन्होंने कहा। "मैं पहलवान हूँ। मुझे भी थोड़ी नाक आती है। और तेरे कपड़ों में एक गंध है।"
"कैसी गंध?"
"जली हुई लकड़ी," उन्होंने कहा। "पर वो लकड़ी नहीं है। वो खाल है। जली हुई खाल।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"धन्नू?" मैंने कहा।
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। "धन्नू तो आज सुबह आया था। पर ये गंध ताज़ी है। बहुत ताज़ी।"
वो मेरी तरफ़ झुके।
"तेरे आँगन में," उन्होंने धीरे से कहा, "कोई और है। जो जली खाल पहने हुए है। और जो अभी यहीं है।"
मैंने पलटकर आँगन में देखा।
चूल्हा जल रहा था। माँ ज़मीन पर गिरी थाली उठा रही थीं। गुड़िया दरवाज़े की तरफ़ जा रही थी।
और आँगन के उस पार, नीम के पेड़ के पीछे, एक परछाई खड़ी थी।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं।
वो परछाई हिली। और फिर वो पेड़ के पीछे से बाहर आई।
एक बूढ़ा आदमी। बहुत बूढ़ा। कुबड़ा। उसके हाथ में लाल धागा था। और उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो मुस्कान नहीं थी — जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना खुल गया हो।
"वीर सिंह," उसने कहा। और उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे सूखे पत्तों की आवाज़। "बीस साल बाद। तुम अपने पापा की तरह दिखते हो।"
मेरा हाथ अपनी जेब पर गया। अंगूठी वहीं थी।
"तुम कौन हो?" मैंने कहा।
वो मुस्कुराया।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जो तुम्हारे पापा को तहखाने तक ले गया था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
और फिर उसने वो लाल धागा हवा में लहराया। और कहा, "अब तुम्हें भी ले जाऊँगा। तुम्हारे पापा ने जो काम अधूरा छोड़ा, वो पूरा करने।"
मैंने एक कदम आगे रखा।
और मेरे पीछे से रणवीर सिंह की आवाज़ आई — "रुको। ये राघव नहीं है।"
मैं रुका।
"ये राघव का भाई है," रणवीर सिंह ने कहा। "बड़ा भाई। जिसे मरा हुआ समझा गया था। बीस साल पहले।"
बूढ़े आदमी की मुस्कान चौड़ी हो गई।
"बिलकुल ठीक, रणवीर," उसने कहा। "मुझे सब मरा समझते हैं। पर मैं मरा नहीं। मैं बस इंतज़ार कर रहा था।"
और उसने अपनी जेब से एक चीज़ निकाली।
एक लोहे का डिब्बा। छोटा। जंग लगा।
"ये तुम्हारे पापा का है," उसने कहा। "उन्होंने मुझे दिया था। उस रात। जब वो तहखाने गए थे। और कहा था — 'अगर मैं न लौटूँ, तो ये मेरे बेटे को देना।'"
मेरी साँस रुक गई।
"तो दे रहा हूँ," उसने कहा। और उसने डिब्बा हवा में उठाया।
मैंने डिब्बे की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ काँप रही थीं। बूढ़े ने डिब्बा मेरी हथेली पर रख दिया। जंग की गंध आई — तेज़, कड़वी, और उसके नीचे कुछ और। कुछ जाना-पहचाना। मेरे पापा की उँगलियों की गंध। मिट्टी और पसीने की।
"खोलो," उसने कहा।
मैंने नहीं खोला। मैंने डिब्बा जेब में रखा और उसकी आँखों में देखा।
"बीस साल," मैंने कहा। "बीस साल तुम ये डिब्बा लिए घूम रहे हो। और आज लाए हो। क्यों? आज क्या बदला?"
बूढ़े की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।
"आज भैरव ने तहखाने का ताला खोल दिया," उसने कहा। "जो चीज़ बीस साल से बंद थी, वो खुल गई। और जो चीज़ बंद थी, वो भूखी है, वीर। बहुत भूखी।"
"तो तुम मुझे डराने आए हो?"
"मैं तुम्हें चुनने आया हूँ," उसने कहा। "जैसे मैंने तुम्हारे पापा को चुना था।"
पीछे से रणवीर सिंह की आवाज़ आई। सख़्त। "उसे मत सुनो, वीर। ये आदमी पापा को तहखाने तक ले गया, ये बात सच है। पर वो लौटकर नहीं आया। ये भाग गया। और बीस साल अपनी मौत का नाटक करता रहा।"
बूढ़ा हँसा। सूखी हँसी।
"मैं भागा नहीं," उसने कहा। "मैं बच गया। फ़र्क़ है दोनों में। तुम्हारे पापा बहादुर थे, रणवीर। बहादुर आदमी तहखाने में जाता है और नहीं लौटता। समझदार आदमी तहखाने में जाता है और लौटता है।"
"और अपने भाई को अंदर छोड़कर आता है?" रणवीर सिंह ने कहा।
बूढ़े का चेहरा पत्थर हो गया।
"मैंने राघव को नहीं छोड़ा," वो धीरे से बोला। "राघव ने मुझे छोड़ा। उसने कहा — भैया, तुम बाहर जाओ, मैं देखता हूँ नीचे क्या है। और मैं गया। और फिर दरवाज़ा बंद हो गया। अंदर से।"
चूल्हे की आग कड़कड़ाई। माँ थाली लिए वहीं खड़ी थीं, आँखें फटी हुईं।
"माँ," मैंने कहा। "अंदर जाइए।"
"नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर पैर जमे थे। "जो आदमी मेरे पति को ले गया, उसके सामने मैं दरवाज़ा बंद नहीं करूँगी।"
बूढ़े ने माँ की तरफ़ देखा। और पहली बार उसकी आँखों में कुछ और दिखा — पछतावा। सच्चा पछतावा।
"बहू," वो बोला। "मैं तुम्हारे सामने झूठ नहीं बोलूँगा। मैंने तुम्हारे पति को नहीं मारा। पर मैंने उन्हें रोका नहीं। और यही मेरा पाप है।"
उसने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, "डिब्बा खोलो। तुम्हारे पापा ने अंदर कुछ रखा था। जो तहखाने का असली राज़ है।"
मैंने डिब्बा खोला।
उसमें एक काग़ज़ था। मुड़ा हुआ। पुराना। और उसके नीचे एक चीज़ थी जिसे देखकर मेरी साँस रुक गई — एक छोटी शीशी, जिसमें वही काला पानी था।
"ये मेरे पापा ने तहखाने से निकाला था," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ," बूढ़े ने कहा। "और यही वजह है कि भैरव तुम्हारे पीछे है। वो शीशी अब तुम्हारे पास है। और वो अंदर का पानी नहीं है। वो बाहर का है।"
मैंने काग़ज़ खोला। पापा की लिखाई। टेढ़ी-मेढ़ी।
"वीर," मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ फट गई। "अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मैं नहीं हूँ। तहखाने में पानी नहीं है। जो है, वो पानी नहीं है।"
मैं रुक गया। आँखें जल रही थीं।
"आगे पढ़," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में भी कुछ टूट रहा था।
"वो पानी नहीं है," मैंने पढ़ा। "वो ज़मीन से निकलता है। और जो इसके पास रहता है, उसके अंदर डर भर जाता है। मैंने इसे शीशी में बंद कर दिया है। इसे कभी मत खोलना। और भैरव को मत देना।"
काग़ज़ के आख़िर में एक लाइन थी। बहुत छोटी।
"और वीर — तेरी नाक। इसे किसी को मत बताना। ये तेरी सबसे बड़ी ताक़त है। और सबसे बड़ा ख़तरा।"
मैंने काग़ज़ बंद कर दिया। हाथ काँप रहे थे।
बूढ़े ने एक कदम आगे रखा। "अब समझे? भैरव को वो शीशी चाहिए। और तुम्हारे पास है। सो — डिब्बा मुझे दो। मैं इसे छुपा दूँगा। जैसे बीस साल छुपाया।"
"नहीं," मैंने कहा।
"वीर—"
"नहीं!" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "मेरे पापा ने ये मुझे दिया है। और मैं इसे किसी को नहीं दूँगा। न तुम्हें, न भैरव को।"
बूढ़े की आँखें सिकुड़ीं। और फिर उसने धीरे से कहा, "तो तुम भी अपने पापा की तरह मरोगे।"
वो पलटा और अंधेरे में घुल गया। जैसे कभी था ही नहीं।
आँगन में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ चूल्हे की आग चटक रही थी।
मैंने शीशी जेब में रखी। और पलटकर रणवीर सिंह की तरफ़ देखा।
वो अपनी व्हीलचेयर में बैठे थे। उनके हाथ कुर्सी के हत्थों पर कसे हुए थे। और उनकी आँखें — उनकी आँखें मेरे हाथ में थीं। मेरी जेब पर।
"तुमने सही किया," वो धीरे से बोले। "शीशी मत देना। किसी को नहीं।"
फिर वो अपने पैरों की तरफ़ देखने लगे। जो नहीं थे। और कुछ पल चुप रहे। चूल्हे की आग उनके चेहरे पर नाच रही थी।
"मैं तुम्हें एक बात बताऊँ, वीर?" उन्होंने कहा, और आवाज़ भारी थी। "बीस साल पहले मैं भी तुम्हारी तरह खड़ा था। भैरव के सामने। और मैं चुप रहा। डर के मारे।"
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बीस साल पहले मैं भी तुम्हारी तरह खड़ा था। भैरव के सामने। और मैं चुप रहा। डर के मारे।"
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