Spirit of a Fighter – Chapter 68
"क्या देखा, बुआ?" मीरा ने पूछा।
"भैरव ने… भैरव ने अपने आदमियों से कहा — 'आज रात मिट्टी में सबसे ऊपर की परत उठा दो। जो भी ऊपर है, जो भी मुलायम है — सब। और नीचे जो सख़्त है, जो रघुवीर की परत है, उसे कुछ मत करना।'"
मेरा खून जम गया।
"क्यों, बुआ?" मैंने पूछा। "क्यों उसने ऐसा कहा?"
सुक्खी बुआ ने उनकी आँखों में देखा। उनका शरीर काँप रहा था।
"क्योंकि उसने कहा," वो फुसफुसाईं, "'मुझे वो मिट्टी चाहिए जो पहलवान बनाती है। और मुझे वो पुरानी परत चाहिए जो वीर के पापा की है। पुरानी परत में जो ज़हर है, उसे मैं आज रात निकाल दूँगा। और वीर के हाथ में सिर्फ़ मिट्टी रह जाएगी। बस मिट्टी।'"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।
भैरव ने शुरू कर दिया था।
तीन दिन नहीं।
आज रात।
॥
आज रात।
ये दो शब्द मेरे सीने में गरम लोहे की तरह चिपक गए थे। सुक्खी बुआ को हम मंदिर की सीढ़ियों तक छोड़ आए। उनका हाथ मीरा ने साफ़ किया, पट्टी बाँधी, और अपनी जेब से एक छोटी पुड़िया निकालकर पानी में घोलकर पिलाई। सुक्खी बुआ ने घूँट भरकर कहा — "मैं तो मर ही गई थी, बेटी।" और फिर उसी साँस में जोड़ा — "पर मरने से पहले एक बात बतानी है। भैरव ने अपने आदमियों से ये भी कहा था — 'कुआँ जो बंद है, वो खुला रहने दो। अब छिपाने की ज़रूरत नहीं।'"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
कालू काका ने जो रास्ता दिखाया था, वो अब भैरव को पता था। और जो आदमी अपना रास्ता खुद उजाड़ दे, वो या तो पागल है, या उसने अपनी आख़िरी चाल की तैयारी कर ली है।
उस रात हम तीनों आँगन में बैठे रहे। माँ चूल्हे के पास बैठी रहीं, आँच बुझा दी थी, पर उनकी आँखें जल रही थीं। गुड़िया मेरी गोद में सिर रखकर सो गई थी, और नींद में भी उसकी मुट्ठी मेरी कलाई पर कसी थी।
"तीन दिन का दूसरा दिन कल है," मीरा ने धीरे से कहा। "भैरव ने कहा था तीन दिन बाद लड़ेगा। पर वो आज रात मिट्टी उठा रहा है। मतलब उसका वक़्त कम है। वो हमें डरा तो रहा है, पर असल में खुद डरा हुआ है।"
"डरा हुआ आदमी सबसे खतरनाक होता है," माँ ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "जब कुत्ता कोने में फँसता है तो काटने से पहले आवाज़ नहीं करता।"
टिंकू ने घुटनों में सिर डालकर कहा, "भाई, मैं सो नहीं पाऊँगा। मुझे देखने दे कि वो क्या कर रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "आज रात कोई अंदर नहीं जाएगा। वो चाहता है कि हम रात को आएँ। ताकि वो हमें अंधेरे में पकड़े।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो?"
"तो हम सुबह जाएँगे। रोज़ की तरह। जब सब देख रहे हों।"
उसने एक पल सोचा, फिर उसकी आँखों में वो चमक आई जो मुझे सबसे ज़्यादा डराती भी थी और सबसे ज़्यादा अच्छी भी लगती थी। "और मैं अपने पिता की दवा बदल दूँगी। आज रात ही।"
"इस वक़्त?" टिंकू ने सिर उठाया।
"इस वक़्त," मीरा ने कहा। "अगर भैरव आज रात कुछ बदल रहा है, तो मुझे भी आज रात ही बदलना है।"
वो उठी। और मैंने उसके जाते हुए पीठ को देखा। उसके कंधे सीधे थे। काँपते नहीं थे। और मुझे उस वक़्त एहसास हुआ कि इस लड़ाई में सबसे बहादुर मैं नहीं हूँ।
सुबह हुई तो आसमान पर बादल थे। मटमैले, भारी। हवा में पानी की गंध थी, पर बारिश नहीं आई थी। जैसे आसमान भी कुछ सोच रहा हो कि बरसे या रुके।
माँ ने रोटी दी। मैंने मना करना चाहा — कल की बात याद थी। पर माँ ने मेरी थाली मेरे सामने इस तरह रख दी कि बोलना बेकार था।
"एक निवाला," उन्होंने कहा। "बस इतना। मेरी शर्त।"
मैंने एक निवाला खाया। और मुझे लगा जैसे मेरे शरीर में कहीं से गरमी की एक लकीर उतर गई हो। मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने आँखें चुरा लीं और चक्की के ठीक हुए हिस्से को हाथ से सहलाने लगीं। जो कल टूटी थी, वो अब भी पूरी नहीं थी, पर माँ ने उसे रस्सी से बाँधकर चलाने लायक बना दिया था।
अखाड़े का गेट बंद था। ताला लटका था। वही नोटिस, जो कल दीवार पर चिपका था, अब भीगने लगा था और उसका कोना हवा में फड़फड़ा रहा था।
मैं गेट के पास खड़ा हुआ, फिर मुड़कर दीवार के उस पुराने छेद की तरफ़ बढ़ा — जहाँ से बचपन में मैं कुश्ती देखता था। ईंट थोड़ी खिसकी हुई थी। सुक्खी बुआ की बात सच थी।
मैंने आँख लगाकर अंदर देखा।
मैदान का रंग बदल गया था। जो मिट्टी कल तक लाल थी, हल्की भूरी थी, उस पर अब चारों तरफ़ छोटे-छोटे ढेर लगे थे। मज़दूर फावड़े से ऊपर की परत उठा रहे थे। कोई आधा दर्जन आदमी थे। और उनके बीच, हाथ में फावड़ा लिए, भैरव का आदमी खड़ा था।
मज़दूर मिट्टी को बोरियों में भर रहे थे। और जो नीचे से निकल रही थी — वो अलग रंग की थी। गहरी, लाल, लगभग काली। जैसे ज़मीन का खून।
मेरी नाक में गंध आई। मीठी सी, पर पीछे कहीं एक कड़वाहट। जैसे मिट्टी के नीचे कुछ सड़ रहा हो।
तभी अंदर से आवाज़ आई।
"कौन है दीवार के पीछे?"
मैं पीछे हटा, पर देर हो चुकी थी। गेट का छोटा दरवाज़ा खुला और लुट्टन बाहर आया। उसकी वर्दी पर मिट्टी लगी थी, हाथों पर भी। पर उसका चेहरा… उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था। पीला। आँखों के नीचे काले घेरे। होंठ सूखे, फटे हुए।
"अभी तेरा नंबर नहीं आया," उसने कहा। आवाज़ में वो धार नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। जैसे कोई बीमार आदमी गुस्सा कर रहा हो।
"मैं नंबर का इंतज़ार नहीं कर रहा," मैंने कहा। "मैं गंध का इंतज़ार कर रहा था।"
वो रुका।
मैंने करीब जाकर उसकी तरफ़ साँस ली। और मेरे भीतर कुछ ऐंठ गया।
पहले उसकी साँस में जो कड़वाहट थी, वो अब दस गुनी हो गई थी। और उसके पीछे एक नई बदबू थी — जैसे गीली लकड़ी जल रही हो, धुआँ नहीं, बस जलन।
"लुट्टन," मैंने धीरे से कहा। "तू ज़्यादा पीने लगा है।"
उसका चेहरा बदला। "बकवास मत कर।"
"मैं बकवास नहीं कर रहा।" मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी कलाई पतली थी। इतनी पतली कि मेरी उँगलियाँ उसके चारों तरफ़ घूम गईं। "देख, तेरा हाथ। तू जो पानी पी रहा है, वो तुझे बाहर से मोटा दिखाएगा, पर अंदर से खोखला कर देगा। तेरी हड्डियाँ अंदर से खोखली हो रही हैं। एक दिन तू उठेगा और तेरे पैर तेरा वज़न नहीं उठा पाएँगे।"
लुट्टन ने अपना हाथ छुड़ाना चाहा। पर छुड़ा नहीं पाया। या शायद छुड़ाना ही नहीं चाहता था।
"तू झूठ बोल रहा है," उसने कहा, पर आवाज़ में विश्वास नहीं था।
"मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं तेरा इलाज कर सकता हूँ। मेरे पास एक लड़की है जो आयुर्वेद पढ़ती है। वो बता सकती है कि तेरे शरीर में कितना ज़हर है और उसे कैसे रोका जाए। पर तुझे पीना बंद करना होगा। आज से। अभी से।"
लुट्टन ने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर तक। और उसकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। वो डर था। वो डर जो आदमी को रात में उठाकर बैठा देता है।
"मैं नहीं पी सकता," उसने फुसफुसाकर कहा। "वो मुझे रोज़ सुबह खुद देता है। अगर मैं मना करूँगा—"
"तो क्या करेगा? मार डालेगा?"
वो चुप हो गया।
"लुट्टन, तेरी मौत का काग़ज़ वो पहले ही लिख चुका है," मैंने कहा। "तेरे जैसे बीस आदमियों का लिख चुका है। तू उसके लिए आदमी नहीं, गिनती है। एक लाइन काग़ज़ पर।"
उसके होंठ काँपे। वो पीछे हटा। एक कदम, दो कदम। फिर रुककर बोला, आवाज़ धीमी, जैसे खुद से बोल रहा हो — "मैंने चार साल पहले शुरू किया था। सिर्फ़ एक बार, कुश्ती से पहले। बस एक बार। पर फिर दूसरी बार आया, तीसरी… और अब मैं रुक नहीं सकता। अगर रुक गया तो मेरे हाथ काँपेंगे। मेरी ताकत चली जाएगी। मैं फिर कभी नहीं जीतूँगा।"
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