Spirit of a Fighter67 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 67

7 min read November 5, 2026

"बेटा, वो पर्ची अब भैरव के पास है। जिस चीज़ के लिए तुम आए थे, वो नहीं मिलेगी। पर उससे पहले — बहुत पहले — रघुवीर ने एक बात मुझसे कही थी। एक ही बात। और मैंने उसे बीस साल अपने अंदर छुपाकर रखा है। आज तुम्हारे सामने कह रहा हूँ।"

वो रुके। लालटेन की रोशनी में उनकी आँखें चमक रही थीं।

"ज़हर की असली काट तहखाने की मिट्टी में है। वो मिट्टी जिसने सैकड़ों साल साधु-संतों के पसीने सोखे हैं। ज़हर जिस मिट्टी से बनता है, उसी मिट्टी में उसकी काट भी छुपी है। पर वो काट सिर्फ़ उसी को मिलेगी जो उस मिट्टी पर अपना खून गिराए। अपना खून, बेटा। और वो खून माँगेगा — इलाज के लिए, जान बचाने के लिए। बिना दर्द के नहीं मिलेगा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मीरा की साँस रुक गई।

"मतलब," मैंने धीरे से कहा, "अगर किसी ने ज़हर पी लिया है… तो उसे बचाने के लिए—"

"तो उस तहखाने में जाना होगा," कालू काका ने कहा। "और उस मिट्टी पर सिर्फ़ खून नहीं, खून के साथ दर्द भी गिराना होगा। रघुवीर ने कहा था — 'जो अपना दर्द मिट्टी को दे देगा, मिट्टी उससे ज़हर छीन लेगी।' मैंने ये बात किसी को नहीं बताई। क्योंकि अगर भैरव को पता चलता, तो वो तहखाने की मिट्टी हमेशा के लिए जला देता।"

मैं संदूक के पास उठकर खड़ा हो गया। नीम की पत्तियाँ हवा में खड़खड़ा रही थीं। दूर अखाड़े के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी — धीमी, भारी।

"काका," मैंने कहा, "आपने ये बात इतने साल क्यों छुपाई?"

कालू काका ने अपनी लालटेन उठाई। उनका चेहरा आधा अंधेरे में, आधा रोशनी में था।

"क्योंकि मैं डरपोक हूँ, बेटा।" उनकी आवाज़ में शर्म थी, पर छुपाव नहीं। "मैंने तुम्हारे पापा को इसी डर के कारण खो दिया। जिस दिन भैरव ने उन्हें ज़हर दिया, मैं दीवार के पीछे खड़ा देख रहा था। और चुप रहा। आज अगर मैंने चुप रहना सीखा है, तो ये सीखा है कि चुप्पी से सिर्फ़ एक ही आदमी जीतता है — भैरव।"

टिंकू ने अपनी छड़ कसकर पकड़ी। "तो अब क्या, काका? हम तहखाने जाएँ?"

"आज नहीं," कालू काका ने कहा। "आज रात भैरव सतर्क है। उसने जो कुछ संदूक से निकाला है, उसे वो कहीं और छुपा चुका है। आज रात हम यहाँ से जितना ले सकते हैं ले लें — मिट्टी का नमूना, काग़ज़ का कोना, और ये धोती का टुकड़ा। बाकी कल।"

मीरा ने अपनी थैली में मिट्टी भरी। मैंने पापा की धोती का टुकड़ा अपने सीने से लगा लिया। वो ठंडा था, पर मुझे लगा जैसे उसमें कोई हाथ है जो मेरी पीठ थपथपा रहा हो।

जब हम वापस मुड़े, तो कालू काका ने मुझे रोक लिया।

"बेटा, एक बात और। भैरव को तुम्हारी ताकत का अंदाज़ा हो गया है। अब वो सीधा नहीं लड़ेगा। वो तुम्हारी मिट्टी में ज़हर घोल देगा। तुम्हारे चूल्हे में, तुम्हारे पानी में, तुम्हारी माँ की चक्की में।"

"तो क्या करें?"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली सूखी थी, पर गरम।

"तीन दिन," उन्होंने कहा। "भैरव ने तीन दिन का वक़्त दिया है। इन तीन दिन में हमें वो नक्शा वापस लाना है — नहीं तो तहखाना तक पहुँचना नामुमकिन। और इसके लिए ज़रूरी है कि भैरव तीन दिन में तहखाने जाए। वो जाएगा, पर उससे पहले हमें उसके रास्ते में एक ऐसी चीज़ रखनी होगी जो उसे रोके।"

"क्या?" मीरा ने पूछा।

कालू काका मुस्कुराए। पहली बार उस रात उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"वो चीज़ तुम्हारे पास है, बेटी। तुम्हारी आयुर्वेद की किताब। जिसमें ज़हर की काट लिखी है। अगर भैरव को शक हो जाए कि तुम ज़हर की काट खोज रही हो, तो वो तहखाने की मिट्टी जल्दी उठाने जाएगा। जल्दबाज़ी में वो गलती करेगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में चमक थी।

"मतलब हम भैरव को हमारे जाल में लाएँगे," उसने कहा।

"नहीं," मैंने कहा। "हम उसे अपने ही जाल में लाएँगे। वो जिस ज़हर से हमें डराता रहा है, उसी ज़हर का सच हमारा हथियार बनेगा।"

हम नीम के नीचे से चल पड़े। रात और गहरी हो रही थी। मैंने एक बार पलटकर देखा — संदूक वहीं पड़ा था, टूटा हुआ, खाली, और उसकी मिट्टी की परत पर चाँदनी पड़ रही थी।

और मुझे लगा जैसे वो संदूक मुस्कुरा रहा है।

घर पहुँचे तो दरवाज़ा खुला था। गुड़िया दरवाज़े के पास बैठी थी, आँखें बंद किए, सिर दीवार से टिकाया हुआ। पर जैसे ही मेरी आहट आई, वो उठ बैठी।

"भैया!"

"सो जा, बेटी। सब ठीक है।"

"मिला कुछ?"

मैंने उसकी चोटी पकड़ी और हल्का खींचा। "कुछ हाथ लगा। बाकी कल।"

माँ अंदर से आईं। उन्होंने मेरे चेहरे पर नज़र डाली, और फिर मेरे गले में लिपटे पापा की धोती के टुकड़े पर।

कुछ नहीं कहा। बस एक लंबी साँस ली, और चूल्हे की तरफ़ चली गईं। चूल्हा फिर जलाने लगीं। रोटी बनाने लगीं।

मैं आँगन में बैठ गया। मीरा वहीं दीवार के सहारे खड़ी थी। टिंकू नीम के नीचे पड़ी एक चारपाई पर लेट गया और मिनटों में खर्राटे लेने लगा।

मीरा ने मेरे पास आकर कहा, "कल सुबह मैं लैब जाऊँगी। मिट्टी का टेस्ट करूँगी। और एक और बात — मेरे पापा से कल मिलना है। अगर तहखाने की मिट्टी में ज़हर की काट है, तो पापा को इस बारे में पता होना चाहिए।"

"वो आपको मना करेंगे?"

"हाँ।" वो मुस्कुराई। "पर मैं उनसे ज़्यादा ज़िद्दी हूँ। ये तो पता ही है मुझे।"

वो जाने लगी, फिर रुकी।

"वीर, एक बात। तुमने उस संदूक को देखकर जो किया — मिट्टी पर हाथ रखकर, धोती को नाक से लगाकर… वो तुम्हारे पापा के लिए था, या अपने डर को हराने के लिए?"

मैंने उसकी आँखों में देखा। चाँदनी में उसकी आँखें काली, गहरी। जैसे कोई कुआँ जिसमें अपना चेहरा दिख रहा हो।

"दोनों," मैंने कहा।

वो सिर हिलाकर चली गई।

मैं वहीं आँगन में बैठा रहा। रोटी की खुशबू आ रही थी — माँ के हाथ की। पापा की धोती का टुकड़ा मेरे सीने से चिपका था। और मैं सोच रहा था — कालू काका ने जो कहा, वो क्या सच में सच है? खून से ज़हर की काट? या ये बूढ़े आदमी का डर था जो बीस साल में बातों में बदल गया था?

मुझे नहीं पता था। पर अब मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। भैरव ने तीन दिन का वक़्त दिया था। और उस तीन दिन का पहला दिन अब ख़त्म हो चुका था।

मैं उठा। माँ के पास गया। वो रोटी बना रही थीं। मैंने उनके पैर छूए।

"माँ, कल से मैं घर में कुछ नहीं खाऊँगा। न पानी पीऊँगा। जब तक ये सब ख़त्म न हो।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा था, पर उसके पीछे कुछ और भी।

"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने कहा। "पर भूखे पेट की लड़ाई नहीं जीती जाती। कल सुबह, मेरे हाथ का पहला निवाला खाएगा। ये मेरी शर्त है।"

मैंने सिर झुका लिया।

और तभी बाहर से एक आवाज़ आई। दूर से। अखाड़े की तरफ़ से। किसी के चीखने की आवाज़ — दर्द भरी, किसी औरत की।

टिंकू उछलकर उठा। मीरा दौड़कर आई।

"ये आवाज़," मीरा ने कहा, "सुक्खी बुआ की है।"

हम सब दौड़ पड़े।

जब अखाड़े के गेट तक पहुँचे, तो देखा — सुक्खी बुआ ज़मीन पर बैठी थीं, उनकी साड़ी पैरों में उलझी हुई थी, और उनका हाथ किसी चीज़ से कटा हुआ खून बह रहा था। उनके पास एक टूटी लालटेन पड़ी थी।

"बुआ!" मैंने उन्हें उठाया। "क्या हुआ?"

उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। उनकी आँखों में डर था। असली डर।

"अरे, मैंने तो सुना था कि तुम यहाँ हो," उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। "मैं सो नहीं पा रही थी। मुझे लगा कि तुम लोगों की खैरियत ले आऊँ। और फिर… और फिर मैंने देखा—"

वो रुकीं। उनकी आँखें अखाड़े की दीवार पर टिक गईं।

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