Spirit of a Fighter66 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 66

7 min read November 5, 2026

वो सीढ़ियाँ उतरने लगी। फिर रुकी। "वीर, तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

"गुस्से से हैं।"

"नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "डर से हैं। और ये अच्छा है। जो डरता नहीं, वो सोचता नहीं।"

वो चली गई।

मैं मंदिर की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा रहा। नीचे गाँव में दीये जल रहे थे। और उस अंधेरे में, अखाड़े के पीछे, नीम के नीचे — पापा का संदूक रखा था। जिसने बीस साल से कोई नहीं खोला था।

मेरी नाक में वो गंध आई — लकड़ी की सड़ी गंध, ज़हर की कड़वाहट, और उसके नीचे… माँ की चक्की की गंध। जैसे संदूक बीस साल से इंतज़ार कर रहा हो कि कोई उसे खोलने आए।

मैंने धोती कसी। आज रात कोई इंतज़ार नहीं होगा।

॥

आज रात कोई इंतज़ार नहीं होगा — ये बात मैंने अपने मन में दोहराई, और फिर अपने ही हाथों पर नज़र डाली। वो अब भी काँप रहे थे। मीरा सच कह गई थी। अब मैं डर को छुपा नहीं रहा था, उसे अपने साथ लेकर चल रहा था।

घर पहुँचा तो आँगन में चूल्हा अब भी सुलग रहा था। माँ दरवाज़े पर बैठी थीं, आँचल में हाथ छुपाए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा जैसे वो मेरी आँखों से ही सब पढ़ लेंगी।

"कुछ खाया?"

"माँ, आज रात मुझे जाना है।"

उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस चूल्हे की तरफ़ देखती रहीं, फिर उठकर अंदर गईं और एक छोटी-सी पोटली लेकर आईं। सोंठ और गुड़ की।

"रास्ते में खा लेना। हिम्मत बनी रहेगी।"

मैंने पोटली पकड़ी। मेरा गला भर आया, पर मैंने कुछ नहीं कहा।

गुड़िया दरवाज़े के पीछे खड़ी थी, अपनी नई कॉपी सीने से लगाए। "भैया, मैं जागती रहूँगी। जब लौटो, दरवाज़ा खोल दूँगी।"

"सो जाना, गुड़िया।"

"नहीं।" उसने ठुड्डी ऊपर की। "आज मैं तुम्हारी रखवाली करूँगी।"

टिंकू दुकान से लौटा था, हाथ में लोहे की एक छड़। "भाई, ये मिठाई के साँचे वाली छड़ है। भारी है। अगर बात बिगड़ी तो काम आएगी।"

"तू तो दुकान पर रुक—"

"बस करो।" उसने छड़ मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "आज तक तुमने मेरी हर बात मानी है। आज मेरी सुनो — मैं चलूँगा। पीछे नहीं, साथ-साथ।"

मैंने छड़ नहीं ली। मैंने उसका कंधा थामा। "तो चल। पर एक बात — जब मैं कहूँ रुक जा, तो रुक जाना। ज़िद मत करना।"

उसने सिर हिलाया। उसकी टोपी के नीचे से पसीना बह रहा था, पर मुस्कान वही थी।

आधी रात बीत चुकी थी जब हम नीम के पास पहुँचे। अखाड़े की मिट्टी की दीवार चाँदनी में लाल-भूरी दिख रही थी। हवा में मिट्टी की गंध थी, पर उसके नीचे कुछ और भी — जला हुआ काग़ज़, और तेल।

मीरा पहले से दीवार के पीछे खड़ी थी, कंधे पर बैग। उसने हमें देखा और उँगली अपने होठों पर रखी।

नीम के नीचे संदूक पड़ा था।

बड़ा सा। पुरानी लकड़ी, काला रंग, ऊपर उभरा हुआ साँप — सुक्खी बुआ ने ठीक याद किया था। पर संदूक का ढक्कन खुला था। टूटा हुआ। ज़मीन पर उसकी लकड़ी बिखरी थी, जैसे किसी ने जल्दी में उसे तोड़कर खोला हो।

मेरे पैर अपने आप रुक गए।

"खाली है," टिंकू ने फुसफुसाया।

मैं संदूक के पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। चाँदनी में अंदर देखा — सिर्फ़ एक पुरानी मिट्टी की परत बिछी थी, और उस पर एक फटा हुआ कपड़ा पड़ा था। लाल रंग, धूल भरा। मैंने उसे उठाया और नाक के पास लाया।

और मेरी आँखें बंद हो गईं।

वो गंध। हल्दी का टीका। चक्की की धूल। पसीना। और बहुत नीचे, बहुत दूर से, वो कड़वाहट जो मैंने भैरव की बोतल में सूंघी थी।

"ये पापा की धोती का टुकड़ा है," मैंने धीरे से कहा।

मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने संदूक के अंदर लकड़ी पर हाथ फेरा, फिर उँगली रोक दी। बाहर की तरफ़, ढक्कन के अंदरूनी हिस्से पर, कोई चीज़ खुदी हुई थी। मैंने लालटेन की रोशनी मीरा के हाथ पर डाली।

रघुवीर।

नाम खुरदुरा था, अक्षर टेढ़े, पर साफ़। जैसे किसी ने बहुत जल्दी में, बहुत गुस्से से लिखा हो। नाखूनों से खुदा हुआ।

"ये पापा का संदूक था," मैंने कहा। "माँ कहती थी, इसमें उनकी कुश्ती की धोती रखी थी। वो धोती जिसमें उन्होंने पहला मुकाबला जीता था।"

मीरा ने कपड़े की तरफ़ देखा। "तो भैरव ने इसे चुराया। इसमें कुछ छुपाया। और अब—"

"अब उसने वो चीज़ निकाल ली।" मैंने मिट्टी की परत को छुआ। वो सूखी थी, पर हल्की गरम। "और जानती हो सबसे बुरी बात क्या है? यहाँ मिट्टी रखी है। तहखाने की मिट्टी। उसने इसमें मिट्टी रखकर कुछ दबाया था। शायद काग़ज़। शायद कुछ और। अब वो चला गया।"

टिंकू ने अपनी छड़ ज़मीन पर टिका दी। "तो हम बेकार आए?"

"नहीं," मीरा ने कहा। उसने अपना बैग खोला और अंदर से एक छोटी थैली निकाली। "ये मिट्टी बेकार नहीं है। अगर ये तहखाने की है, तो इसमें ज़हर की मात्रा होगी। मैं इसे लैब भेजूँगी। अगर इस मिट्टी में वही चीज़ मिली जो भैरव के मटके में थी, तो ये साबित हो जाएगा कि संदूक तहखाने से जुड़ा है।"

"पर हमारे पास वो पर्ची नहीं है," मैंने कहा।

"सही," एक आवाज़ आई। "पर्ची तो नहीं है। पर जिसने वो पर्ची लिखी थी, उसका एक आदमी अभी तुम्हारे सामने खड़ा है।"

हम सब पलटे।

कालू काका दीवार के कोने से आ रहे थे। हाथ में लालटेन थी, और उसकी रोशनी में उनका चेहरा और भी झुर्रीदार लग रहा था। उनकी आँखें लाल थीं। जैसे वो रो रहे हों, पर आँसू सूख गए हों।

"मैं जानता था तुम यहाँ आओगे," उन्होंने कहा। "बीस साल में पहली बार अपने आप कुछ ठीक हुआ है।"

टिंकू ने छड़ कसकर पकड़ी। "काका, आप यहाँ कैसे—"

"मैं रोज़ यहाँ आता हूँ, बेटा।" कालू काका संदूक के पास आए और बड़ी मुश्किल से घुटनों के बल बैठे। उन्होंने अपनी झुर्रियों वाली उँगलियाँ संदूक की लकड़ी पर रखीं। उनके हाथ काँप रहे थे।

और फिर उन्होंने धीरे-धीरे लकड़ी सहलाई, जैसे कोई बूढ़ा अपने बचपन के दोस्त का चेहरा सहला रहा हो।

"रघुवीर भाई," उन्होंने फुसफुसाया। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "तेरा बेटा तेरे रास्ते पर आ गया है। देख रहा है ना? उसी तरह खड़ा है जैसे तू खड़ा होता था। वही आँखें हैं। वही ज़िद।"

उनकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो पोंछने की ज़हमत नहीं कर रहे थे।

मेरा गला ऐसा भर गया कि मैं कुछ बोल ही नहीं सका। मीरा ने अपना सिर झुका लिया। टिंकू ने अपनी टोपी उतार ली, जैसे किसी की मय्यत पर।

"काका," मैंने आख़िर कहा, "संदूक में क्या था?"

कालू काका ने आँखें पोंछीं। फिर उन्होंने लालटेन को संदूक के अंदर टिकाया और मिट्टी की परत पर अपनी उँगली रखी।

"यहाँ," उन्होंने कहा, "यहाँ एक काग़ज़ दबा रहता था। काला। मोटा। तीन परत वाला। और उस पर रघुवीर की लिखाई में पूरा नक्शा था — तहखाने का, उसकी मिट्टी का, और उस मिट्टी में ज़हर घोलने का पूरा तरीका। कहाँ से मिट्टी उठानी है, कितनी उठानी है, उसमें क्या मिलाना है, कितने दिन सुखाना है — सब।"

"पापा ने ऐसा नक्शा बनाया?" मैंने पूछा।

"नहीं।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "उसने ये नक्शा मुझसे और भैरव से पहले लिखवाया था। जिस आदमी ने तुम्हारे पापा के पापा को ये विद्या सिखाई थी — वही बूढ़ा, जो कुएँ में बंद है — उसने रघुवीर को सब बताया था। और रघुवीर ने अपने हाथ से ये नक्शा लिखा, ताकि अगर कभी ज़रूरत पड़े तो वो ज़हर को पहचान सके। वो इस नक्शे को जानता था ताकि उसे रोक सके। पर भैरव ने उसे चुरा लिया।"

मीरा ने आगे झुककर पूछा, "काका, आपने ये नक्शा देखा था? आपको इसके बारे में कुछ याद है?"

कालू काका का चेहरा सख़्त हो गया। "याद है, बेटी। हर लाइन याद है। क्योंकि मैंने बीस साल उसे अपने सीने में दबाकर रखा है।"

वो खाँसे, और उनके कंधे हिले। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

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