Spirit of a Fighter65 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 65

7 min read November 5, 2026

मैं हँस पड़ा। "तू अपनी खीर संभाल।"

"खीर तो संभाली हुई है।" उसने बोरा फिर ठीक किया। "पर भाई, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"अगर भैरव को पता चल गया कि हमने उसकी गाड़ी रोकी है — तो वो क्या करेगा?"

मैं कुछ देर चुप रहा। नहर का पानी बहता रहा। मैंने देखा कि दूर पुलिया पर एक आदमी खड़ा था। शायद कोई राहगीर। शायद नहीं।

"वो पहले गुस्सा करेगा," मैंने धीरे से कहा। "फिर डरेगा। और जो डरता है, वो गलती करता है।"

टिंकू ने सिर हिलाया। "तो हम उसकी गलती का इंतज़ार करें?"

"नहीं। हम उसे गलती करने की जगह देंगे।"

शाम हो रही थी जब हम गाँव लौटे। सूरज नीचे झुक रहा था और नीम के पेड़ों की परछाइयाँ लंबी हो गई थीं। मैंने टिंकू को उसकी दुकान पर छोड़ा और खुद मंदिर की तरफ़ चल पड़ा — अभी सिर्फ़ देखने के लिए, ताकि रास्ता पता हो।

गाँव के बाहर, नहर पार करके, एक टीले पर पुराना मंदिर है। उसकी सीढ़ियाँ टूटी हुई हैं, दीवारें काई से भरी हैं। पीपल की जड़ें दीवारों को चीरकर अंदर घुसी हैं। मैं सीढ़ियों पर चढ़ा। ऊपर से पूरा गाँव दिखता था — दूर अखाड़े की ऊँची दीवार, नहर का मोड़, और उस पार शहर की तरफ़ जाता रास्ता।

मैं सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठ गया। यहाँ से सब कुछ दिखता था। और सबसे अच्छी बात — यहाँ कोई नहीं आता था।

मैं बैठा ही था कि पीछे से पैरों की आहट आई। मैं पलटा। मीरा सीढ़ियों पर चढ़ रही थी, हाँफती हुई। उसकी कुर्ता पर धूल थी और बाल बिखरे हुए।

"तुम जल्दी आ गई," मैंने कहा।

"मैंने सोचा तुम अकेले हो, तो मैं भी आ जाऊँ।" उसने अपना बैग सीढ़ी पर रखा और मेरे पास बैठ गई। "काग़ज़ पहले ही लाने थे। आज उम्मीद से ज़्यादा हो गया।"

हम दोनों चुप बैठे रहे। दूर गाँव में दीये जलने लगे थे।

"वीर," उसने कहा। "तुम्हारी माँ कैसी हैं?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्यों पूछ रही हो?"

"क्योंकि तुम्हारी माँ ने मुझे अपनी बहू जैसा अपनाया था। और मैंने उनसे ठीक से बात नहीं की।" उसने अपने घुटनों को गले लगाया। "मैं ऐसी ही हूँ। जब लोग मुझे प्यार करते हैं, तो मैं सोचती हूँ — ये जल्दी ही बदल जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें दूर देख रही थीं।

"मेरी माँ कहती हैं," मैंने कहा, "कि जो लोग प्यार से डरते हैं, वो असल में प्यार से पहले कभी तोड़े गए होते हैं।"

वो मेरी तरफ़ मुड़ी। "तुम्हारी माँ ने ये कहा?"

"नहीं।" मैंने दूर देखा। "मैंने खुद समझा।"

वो हँस पड़ी। पहली बार। ज़ोर से नहीं, बस ऐसे जैसे बहुत देर से बंद कमरे में हवा घुसी हो।

"तुम्हें पता है," उसने कहा, "तुम कभी-कभी अच्छी बातें बोल देते हो।"

"कभी-कभी?"

"बस तब जब तुम मुझसे झगड़ते नहीं हो।"

हम फिर हँसे। फिर चुप। पर वो चुप डरावनी नहीं थी। वो चुप ऐसी थी जैसे दो आदमी एक ही किताब का एक ही पन्ना पढ़ रहे हों।

तभी सुक्खी बुआ की आवाज़ आई — दूर से नहीं, ठीक मंदिर की सीढ़ियों के नीचे से।

"अरे! अरे! मैंने तो सुना था कि मंदिर में कोई बैठा है, पर ये तो… ये तो—"

हम दोनों एक साथ उठ गए। सुक्खी बुआ सीढ़ियों पर खड़ी थीं, हाथ में पान का बीड़ा, आँखें फाड़कर हम दोनों को देख रही थीं।

"वीर? और… और ये अखाड़े वाली मैडम?" उनका मुँह खुला रह गया। "ये तो… ये तो…"

मैं झट से एक कदम पीछे हटा। पर मीरा नहीं हटी। वो बैठी रही — बिलकुल अडिग, जैसे कोई जज कुर्सी पर बैठा हो।

"बुआ," उसने बहुत ठंडे मुँह से कहा, "हम दवा की बात कर रहे थे।"

"दवा?" सुक्खी बुआ सीढ़ी चढ़कर पास आ गईं। "अरे दवा की बात करने के लिए मंदिर की सीढ़ियाँ? गाँव में कोई जगह नहीं थी? और ये तुम… ये तुम दोनों…" उन्होंने अपना पान का बीड़ा दूसरे गाल में दबाया। "अरे मैंने तो सुना है कि—"

"बुआ," मीरा ने कहा, फिर भी उसी ठंडे लहजे में, "अगर आपने अभी कोई बात सुनी है, तो वो सच नहीं है।"

सुक्खी बुआ एक पल के लिए रुकीं। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़। फिर उनकी आँखें चमकीं — वो चमक जो तब आती है जब किसी को सबसे बड़ी खबर मिली हो।

"अरे, मैं तो कुछ नहीं कह रही।" उन्होंने अपनी साड़ी ठीक की। "मैं तो बस देखने आई थी कि मंदिर में दीया कौन जलाता है। पर अब देखो, दीया तो तुम दोनों ने जला दिया।" वो मुस्कुराईं। "हाँ, बात दवा की ही होगी। बिलकुल। दवा की ही।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "बुआ, प्लीज—"

"अरे वीर, तू मुझे क्या समझता है?" उन्होंने हाथ हिलाया। "मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगी। बस…" उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा। "ये मैडम क्या दवा बनाती हैं?"

मीरा ने अपना बैग उठाया। "औषधियाँ। आयुर्वेद।"

"अच्छा? तो फिर मेरी कमर के लिए भी कुछ बता दे। सुबह उठते ही…" वो बैठ गईं सीढ़ी पर, जैसे अभी घंटों बातें होंगी।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा — एक नज़र, बस एक पल। उस नज़र में साफ़ लिखा था — भागो मत, संभालो।

और मीरा ने संभाला। उसने अपना बैग खोला और सुक्खी बुआ को कुछ पत्तियाँ दिखाकर समझाने लगी। मैं हैरान रह गया। ये लड़की जानती थी कि सुक्खी बुआ को कैसे रोकना है — उन्हें बात करने दो, खुद बतियाती रहेगी, और जब वो खुद थक जाए तो असली बात भूल जाएगी।

आधे घंटे बाद सुक्खी बुआ उठीं। "अच्छा, तो कमर के लिए ये पत्तियाँ चबानी हैं?"

"हाँ, बुआ। रोज़ सुबह।"

"और ये मंदिर वाली बात—"

मीरा ने उनकी तरफ़ देखा। बस देखा — कुछ नहीं कहा।

सुक्खी बुआ एक पल रुकीं। फिर हँसीं। "अरे, मैं तो मज़ाक कर रही थी। तुम दोनों दवा की बात कर रहे थे। मैं किसी को क्या बताऊँगी?" वो सीढ़ियाँ उतरने लगीं। फिर ठीक आख़िरी सीढ़ी पर रुककर पलटीं।

"अच्छा सुनो," उन्होंने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी। "एक बात तो सच है। भैरव ने कल रात किसी को बड़ा सा बक्सा अखाड़े के पीछे नीम के पास ले जाते देखा गया है। बड़ा सा बक्सा। दो आदमी उठा रहे थे।" उन्होंने पान का बीड़ा पलटा। "और वो बक्सा… वो बक्सा रघुवीर के घर का पुराना संदूक है। मैंने उसे बीस साल पहले देखा था, जब रघुवीर की माँ इसे बेचने आई थी। लकड़ी पर काला साँप बना है। मुझे याद है।"

वो मुड़ीं और अंधेरे में उतर गईं।

मैं सीढ़ी पर खड़ा रह गया। मेरे कानों में खून की आवाज़ आ रही थी।

पापा का संदूक। जो बीस साल से गायब था। जिसे माँ ने बेचना नहीं चाहा था, पर एक दिन वो अपने आप गायब हो गया था। और अब वो भैरव के पास है।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर?"

मैंने अपनी मुट्ठी खोली। नाखूनों के निशान हथेली पर बन गए थे।

"वो संदूक मेरे पापा का है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "और उसमें कुछ है। जो भैरव नहीं चाहता कि मैं कभी देखूँ।"

मीरा ने अपना बैग उठाया। "तो कल हम वो भी लाएँगे।"

"नहीं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वो संदूक आज रात लाएँगे। क्योंकि अगर भैरव को पता चला कि सुक्खी बुआ ने इसे देख लिया है, तो वो इसे फिर से गायब कर देगा। और इस बार हमेशा के लिए।"

मीरा ने एक पल सोचा। फिर सिर हिलाया। "ठीक है। पर एक शर्त — मैं साथ चलूँगी।"

"मीरा—"

"मैं तहखाने नहीं जाऊँगी," उसने कहा। "मैं बाहर रहूँगी, दीवार के पीछे। अगर तुम अंदर फँसे, तो कोई तो हो जो बाहर से आवाज़ दे।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि उसने अपना हाथ बढ़ाया। "सबूत के बिना आरोप नहीं, और आरोप के बिना चुप्पी नहीं। पर अकेले के बिना जीत नहीं। ये मेरी नई लाइन है।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली ठंडी थी, पर मज़बूत।

"ठीक है," मैंने कहा। "आज रात। नीम के पास।"

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