Spirit of a Fighter64 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 64

7 min read November 5, 2026

"गाँव का आदमी हूँ। ये बोरे कहाँ जा रहे हैं?"

"तेरे बाप का हिसाब नहीं है।" उसने लाठी घुमाई।

मैंने एक कदम आगे रखा। "इस मिट्टी में ज़हर है। जो इसे छुएगा बीमार पड़ेगा।"

दोनों हँसे। बैल हाँकने वाले ने कहा, "अरे, ये वही है ना — जो मिट्टी सूंघता है? भैरव सर ने बताया था।" वो मुस्कुराया। "सर कह रहे थे, ये लड़का बड़ी-बड़ी बातें करता है।"

भैरव सर। मेरे मुँह में कड़वाहट भर आई।

मैंने टाट की तरफ़ इशारा किया। "खोलो इसे। मैं सबके सामने सूंघकर बता दूँगा कि इसमें क्या मिला है।"

"हट जा रास्ते से।" लाठी वाले ने लाठी सीधी की।

मैंने अपनी मुट्ठी भींची। पर तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई — नहर के उस पार से, साइकिल की घंटी। मैं पलटा।

मीरा साइकिल से उतर रही थी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था और चेहरे पर वो भाव जो मैं जानता था — जब उसे कुछ पक्का पता होता था।

"रुको," उसने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी साफ़ थी कि दोनों आदमी रुक गए। वो सीधी गाड़ी के पास गई, काग़ज़ खोला। "ये परचे भैरव के हाथ के नहीं हैं। ये हरनाम के हाथ के हैं। और हरनाम का हाथ ऐसे काम में नहीं लगता जिसमें खतरा हो।" उसने गाड़ी की तरफ़ देखा। "तुम दोनों ने गाड़ी भर ली, पर जानते हो इसके नीचे क्या है?"

दोनों आदमियों के चेहरे बदले। "मैडम, हमें सिर्फ़ गाड़ी पहुँचाने को कहा गया है।"

"कहाँ?"

"शहर के बाहर एक गोदाम है। वहाँ से आगे कोई और ले जाता है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। "अगर तुम दोनों इस गाड़ी को आगे ले गए, और किसी पहलवान ने इस मिट्टी में हाथ लगाया — तो उसकी मौत के साथ तुम दोनों का नाम जुड़ेगा। पुलिस तुम्हें ढूँढेगी, भैरव को नहीं।"

पहला आदमी घबराया। "मैडम, हम तो मज़दूर हैं। हमें क्या पता—"

"तो अभी जान लो।" मीरा की आवाज़ में वो ठंडक थी जो कोर्ट में होती है। "गाड़ी यहीं खड़ी करो और जाओ। कह देना रास्ते में पहिया टूट गया।"

दोनों आदमी एक-दूसरे को देखने लगे। बड़ा वाला लाठी नीचे करके खड़ा रह गया। फिर उसने बैल की रस्सी खोली और दोनों चुपचाप गाड़ी छोड़कर पैदल ही नहर किनारे लौट गए।

मैं हक्का-बक्का खड़ा था। "तुमने… तुमने ये कैसे—"

"मैंने कुछ नहीं किया।" मीरा ने काग़ज़ फिर निकाला। "ये हरनाम के घर से उठाया है — ये लिखा है कि मिट्टी दो जगह से आती है, और दोनों जगह के नाम भैरव के कमरे की तिजोरी में हैं। पर ये काग़ज़ अधूरा है। फाड़ा हुआ है।" वो मेरी तरफ़ देखने लगी। "वीर, गाड़ी खोलो।"

हमने टाट उठाया। नीचे बोरे थे — मोटे, भारी, ऊपर से धूल से भरे। टिंकू भी पीपल के पीछे से निकल आया और एक बोरा खींचने लगा।

मैंने बोरा खोला। अंदर मिट्टी थी — लाल, भुरभुरी, पर उसमें कुछ मिला था। छोटे-छोटे सफ़ेद दाने, जैसे कुटी हुई जड़ें। और गंध — मैंने आँख बंद करके सूँघा। मेरा सिर चकराया। माँ की चक्की की आवाज़ कानों में गूँजी, और मुझे अपनी उल्टी आने लगी।

"वीर, तुम ठीक हो?" मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी।

"यही है," मैंने हाँफते हुए कहा। "यही मिट्टी है। जो कुएँ के नीचे थी। जो मेरे पापा के सीने पर पड़ी थी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "इसे शहर भेज रहे हैं। ताकि वहाँ के पहलवान भी—"

मीरा ने मेरी बात काट दी, बहुत ठंडे मुँह से। "हाँ। जानती हूँ।"

"तो फिर तुम—"

"पर सबूत के बिना आरोप नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "अगर हम अभी पुलिस लेकर गए, और पुलिस में भैरव का आदमी निकला — तो ये सारा सामान गायब हो जाएगा। और हम पर चोरी का इल्ज़ाम लग जाएगा।"

मैंने मुट्ठी भींची। "और आरोप के बिना चुप्पी नहीं।"

वो एक पल चुप खड़ी रही। फिर उसके होंठों पर एक हल्की-सी रेखा आई — जो शायद मुस्कान थी, शायद नहीं। "तो फिर ये मिट्टी हमें कहीं ऐसी जगह छिपानी है जहाँ भैरव का हाथ न पहुँचे।"

टिंकू ने बोरा बंद किया। "भाई, ये गाड़ी मेरी दुकान के पीछे रख लेते हैं। वहाँ कोई नहीं आता।"

हमने गाड़ी को टिंकू की दुकान के पीछे पुरानी बाड़ के अंदर खड़ा कर दिया और ऊपर से भूसा डाल दिया। फिर तीनों नहर किनारे बैठ गए — दूर से दिखने वाले मोड़ पर, जहाँ कोई देख नहीं सकता था।

मीरा ने अपनी किताबों का बैग खोला। उसमें से एक-एक काग़ज़ निकालकर सामने रखने लगी। कुछ पुराने, पीले; कुछ नए, सफ़ेद।

"ये तेरे पापा की पर्ची है," उसने एक पीला काग़ज़ रखा। "ये मेरे पापा की दवा का पर्चा है — पिछले छह महीने का। ये हरनाम की कॉपी का एक पन्ना है। और ये—" उसने आख़िरी काग़ज़ रखा — "ये मेरी माँ के हाथ का लिखा है। जो उन्होंने मरने से पहले लिखा था।"

मैंने वो काग़ज़ देखा। लिखावट झुकी हुई थी, जैसे कमज़ोर हाथ से लिखी गई हो।

मीरा ने धीरे से कहा, "मेरे पापा की दवा में भी वही कड़वाहट है। मैंने पिछले कुछ दिन से चखकर देखा है। हर बार। वो कड़वाहट तेरी बताई हुई गंध से मिलती है।" उसने अपनी आँखें उठाईं। "मैं पिछले कुछ दिन से पर्चियाँ जोड़ रही थी, वीर। सब एक जगह आ रही हैं।"

मेरा गला सूख गया। "तो तुम्हारे पापा को भी—"

"हाँ।" उसने मेरी बात काट दी, पर इस बार आवाज़ में वो ठंडक नहीं थी। बस एक रुकी हुई साँस थी। "जानती हूँ।" उसने काग़ज़ सीधा किया। "पर सबूत के बिना—"

"मीरा।" मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। "तुम्हारे पापा बीस साल से इसी ज़हर से जूझ रहे हैं। और तुम ये सब अकेले जोड़ रही थी?"

उसने काग़ज़ों को करीने से रखा। "मैं अकेले की आदत वाली हूँ, वीर।"

"अब नहीं।" मैंने कहा। "अब नहीं।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में कुछ था — हैरानी नहीं, बस एक अजीब सी शांति, जैसे कोई बहुत देर से बंद दरवाज़ा अंदर से खुल गया हो।

"तो फिर सुनो," उसने कहा। "मेरे हिसाब से भैरव की दो जगहें हैं। पहली — भैरव का कमरा, जहाँ मटका है। दूसरी — तहखाना, जहाँ मिट्टी है। अगर हमें पूरा सबूत चाहिए, तो दोनों जगह से एक साथ नमूना उठाना पड़ेगा। एक ही रात में।"

"तहखाने का रास्ता कालू काका जानते हैं," मैंने कहा। "पर वो अब भी डरते हैं।"

"तो उन्हें हमारे साथ आना पड़ेगा।"

मैंने सोचा। "और भैरव का कमरा? वहाँ तो वो खुद सोता है।"

मीरा ने एक कोना मोड़ा। "मेरे पापा उस कमरे के ठीक ऊपर वाले कमरे में रहते हैं। मैं उनके पास रहती हूँ। मैं जानती हूँ कि भैरव किस वक्त सोता है — दोपहर में, खाने के बाद, दो घंटे। उस वक्त उसका कमरा खुला रहता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम भैरव के कमरे में घुसोगी?"

"मैं ही घुसूँगी। तुम्हारी शक्ल वो पहचानता है। मेरी नहीं।" उसने काग़ज़ समेटे। "तुम तहखाने जाओ, कालू काका के साथ। मैं मटके से पानी उठाऊँगी। फिर दोनों मिलते हैं — मंदिर की सीढ़ियों पर।"

"मंदिर?" मैंने पूछा।

"गाँव के बाहर पुराना मंदिर है। जहाँ कोई नहीं जाता।" उसने अपनी आँखें सिकोड़ीं। "वहाँ हम पूरी बात जोड़ेंगे।"

मैं सहमत हो गया।

हम उठे। मीरा ने अपनी साइकिल उठाई, और फिर रुकी। "वीर, एक बात।"

"क्या?"

"अगर कल रात कुछ गड़बड़ हो जाए — और मैं न आ पाऊँ — तो तुम मंदिर की सीढ़ियों पर मेरा इंतज़ार करना। पर ज़्यादा देर नहीं।"

"क्यों?"

उसने अपना सिर हिलाया, जैसे कोई बात कहने से पहले तौल रही हो। "क्योंकि मेरे पापा कहते हैं — इंतज़ार करने वाला आदमी दुश्मन के लिए भी आसान शिकार होता है।"

वो साइकिल पर बैठी और चली गई। टिंकू ने मेरी कोहनी मारी। "भाई, ये लड़की तो…"

"क्या?"

"अच्छी है।" उसने अपनी टोपी ठीक की। "बस थोड़ी डरावनी है।"

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