Spirit of a Fighter63 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 63

7 min read November 5, 2026

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखें जल रही थीं, पर रोना नहीं था। "तुम… तुम ऐसा क्यों करोगी?"

वो थोड़ी देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने कंधे उचकाए। "क्योंकि तुम्हारी माँ अच्छी हैं," उसने कहा। "और क्योंकि वो गेहूँ बेकार नहीं जाना चाहिए।"

मुझे कुछ अजीब हुआ। मेरे गले में एक गाँठ बन गई। मैंने सिर हिलाया, कुछ बोल नहीं पाया। सिर्फ़ इतना कहा — "मैं लौटा दूँगा। जब सच खुलेगा, मैं लौटा दूँगा।"

"पैसा नहीं लौटाना तुम्हें," उसने कहा। "सच लौटाना। मेरे पिता का।" वो उठ खड़ी हुई। अपने कुर्ते पर लगी धूल झाड़ी। "अब सुनो। आज रात मुझे अखाड़े में आना है। भैरव के कमरे में और उसकी अलमारी में। मैंने सुना है वो काग़ज़ अपनी अलमारी में रखता है — वो पीली पर्ची, और वो हिसाब की फ़ाइल। मुझे उन्हें उठाना है।"

"तुम अकेली नहीं जाओगी," मैंने कहा।

"नहीं जाऊँगी," उसने मेरी आँखों में देखा। "पर तुम्हें अपनी माँ के पास जाना है। उन्हें आज अकेला मत छोड़ना। वो चक्की टूटी देखकर टूट गई हैं।"

मैंने धीरे से सिर हिलाया।

वो चलने लगी। दो कदम गई। फिर रुकी, पलटी। उसकी आँखों में कुछ बदला था — वो तेज़ी, वो ज़िद, वो सब कुछ पीछे चला गया था। सिर्फ़ एक लड़की बची थी जो मेरी तरफ़ देख रही थी।

"वीर," उसने कहा, और यह पहली बार था जब उसने मेरा नाम ऐसे लिया — बिना झगड़े के, बिना ताने के। "तुम्हारी माँ का पत्थर टूटा। उससे तुम्हारा घर नहीं टूटा। ये याद रखना।"

वो नहर किनारे के रास्ते पर चली गई। उसकी सफ़ेद कुर्ता हवा में फड़फड़ा रही थी। मैं उसे देखता रहा जब तक वो पेड़ों के पीछे नहीं छिपी।

फिर मैं घर लौटा।

माँ आँगन में बैठी थीं। पत्थर के पास। उन्होंने मुझे देखा। मेरे चेहरे पर कुछ पढ़ा। फिर बोलीं, बहुत सादा आवाज़ में — "भाग आया?"

मैं उनके पास जाकर बैठ गया। "हाँ, माँ। मीरा ने रोक लिया।"

माँ की आँखों में कुछ चमका। "मीरा?"

"वो कहती है — नया पत्थर बनवा देगी। पास के कस्बे में एक बढ़ई है।"

माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली खुरदरी थी, गेहूँ की धूल से भरी। "ये लड़की तेरे लिए अच्छी है," वो बोलीं। और फिर मुस्कुराईं — जैसे बरसों बाद। "पर पत्थर मत बनवाना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो पत्थर मेरे हाथ का टूटा, उसे किसी और के हाथ का जोड़ना ठीक नहीं।" उन्होंने मेरे गाल पर हल्का थप्पड़ मारा। "अभी भूख लगी है। दाल चूल्हे पर है। नमक देख लेना।"

वो उठकर चलीं, बिना सहारे के। मैं देखता रहा। उनकी कमर फिर झुकी हुई थी, पर कदम पहले जैसे थे।

दोपहर में टिंकू आया। खीर लेकर, जैसे रोज़। पर आज उसके चेहरे पर खीर नहीं थी, पसीना था।

"भाई," वो फुसफुसाया, "मैंने आज सुबह अखाड़े के पीछे से आते हुए देखा — भैरव के आदमी बोरे लाद रहे थे। बड़े-बड़े बोरे। जैसे मिट्टी के बोरे हों।"

मैंने खीर का कटोरा रखा। "कहाँ ले जा रहे थे?"

"पता नहीं। पर उन्होंने बोरे उस पुरानी गाड़ी पर रखे जो शहर जाती है।" उसने आवाज़ और धीमी की। "और भाई, एक बात और। उन बोरों से… मुझे गंध आई।"

मेरी छाती कस गई। "कैसी गंध?"

टिंकू ने अपनी टोपी खींची। "वो गंध… जो कुएँ के पास आती थी। जो मैंने कल रात भैरव के हाथों से आती देखी थी। भाई, वो मिट्टी थी, पर… उसमें कुछ मिला हुआ था।"

मैंने आँखें बंद कीं।

अगर भैरव ने तहखाने की ज़हरीली मिट्टी शहर भेजनी शुरू कर दी है, तो ये सिर्फ़ एक अखाड़े का खेल नहीं है। ये पूरे इलाक़े में फैलने वाली बीमारी है। शहर के बड़े अखाड़े में, भारत केसरी में, हर पहलवान उस मिट्टी में उतरेगा। और एक-एक करके गिरता जाएगा।

मैं उठा। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "भाई, अकेले मत जाना।"

"कोई नहीं जा रहा।" मैंने आँगन के कोने में रखी पापा की धोती उठाई। उसकी गंध अब भी मेरे हाथ में थी। "पर जो मिट्टी मेरे पापा के सीने पर पड़ी थी, वो शहर नहीं जाएगी। ये मैं देख लूँगा।"

टिंकू ने अपनी टोपी पकड़ी। "तो मैं भी चलूँगा।"

"तू खीर लेकर कहाँ जाएगा?"

"खीर बाद में।" उसने अपनी टोपी मज़बूती से सिर पर रखी। "पहले गाड़ी रोकनी है।"

॥

"पहले गाड़ी रोकनी है।" टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की और कमर पर हाथ रखकर खड़ा हो गया, जैसे अभी वो अकेला दस आदमियों से भिड़ जाएगा।

मैंने उसे ऊपर से नीचे देखा। बनियान में सूखी हड्डियाँ, हाथ में मिठाई का डिब्बा, और आँखों में वो दम जो आज तक मैंने उसमें नहीं देखा था। "तू चलेगा?" मैंने पूछा।

"भाई, तेरी खीर खाकर बड़ा हुआ हूँ। आज खीर का कर्ज़ चुकाने का दिन है।"

मैं हँस पड़ा। डर के बीच भी हँसी आ गई। "तेरा कर्ज़ तो पूरी ज़िंदगी का है।"

"तो आज थोड़ा-सा चुका दूँ।" उसने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पहले खा ले। खाली पेट लड़ने वाला जल्दी गिरता है।"

मैंने खीर खाई। मीठी थी, पर आज उसमें कुछ और भी था — जैसे टिंकू ने उसमें अपनी सारी हिम्मत घोल दी हो। दो चम्मच में खत्म करके मैंने डिब्बा उसे लौटाया और पापा की धोती कंधे पर रख ली।

गाड़ी उस पुराने रास्ते से जाती है जो नहर के किनारे-किनारे गाँव से बाहर निकलता है और फिर पुलिया के पास से शहर की तरफ़ मुड़ जाता है। मैं जानता था कि पुलिया के पहले एक जगह है जहाँ गाड़ी को धीरे होना पड़ता है — ऊबड़-खाबड़ पत्थरों की पट्टी। वहीं हमें मिलना है।

हम नहर के किनारे-किनारे चले। दोपहर का सूरज सिर पर था और पैरों के नीचे रेत गरम थी। टिंकू बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता रहा।

"किसको ढूँढ रहा है?" मैंने पूछा।

"किसी को नहीं।" उसने आवाज़ धीमी की। "बस देख रहा हूँ कोई हमारे पीछे न आ रहा हो।"

"टिंकू, तू पीछे देखते-देखते चल रहा है, आगे का रास्ता दिखेगा?"

वो एक पत्थर से ठोकर खाकर लड़खड़ाया। "देखा? यही तो डर है भाई। आदमी जब पीछे देखता है तो आगे ठोकर खाता है।"

मैं उसकी बात पर रुक गया। कभी-कभी ये लड़का बिना जाने बड़ी बात कह जाता है।

पुलिया आ गई। वहाँ हम पुराने पीपल के नीचे बैठ गए और साँस ली। टिंकू ने पानी की सुराही खोली, पहले मुझे दी, फिर खुद पी। हम चुप बैठे रहे। नहर का पानी नीचे पत्थरों से टकराकर आवाज़ कर रहा था। मुझे भूख लग रही थी फिर भी — अजीब बात थी, खतरे के वक्त मेरी भूख कभी नहीं मरती। शायद शरीर जानता है कि आगे ताकत चाहिए।

टिंकू ने अचानक मेरी बाँह पकड़ी। "आ रही है।"

दूर से धूल उड़ती दिखी। फिर बैलगाड़ी की घरघराहट। फिर वो पुरानी गाड़ी दिखी — ऊँचे-ऊँचे बोरे लदे, ऊपर से टाट पड़ा हुआ। गाड़ी पर दो आदमी थे। एक तो पीछे मुँह करके बैठा था, दूसरा बैल हाँक रहा था।

मेरी नाक में गंध आई। वो गंध। धूल के नीचे से, टाट के नीचे से, वो कड़वी, भारी गंध — जो कुएँ के पास मिलती थी। मेरा सिर घूमा। मैंने आँखें बंद करके गहरी साँस ली।

"भाई, तेरा रंग उड़ गया।"

"यही है," मैंने कहा। "यही मिट्टी है।"

गाड़ी पत्थरों की पट्टी पर आई और धीमी हो गई। बैल कराहते हुए रुके। बैल हाँकने वाला नीचे उतरा और बैल की गर्दन सहलाने लगा। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"तू पीछे रह," मैंने कहा। "अगर बात बिगड़े तो भाग जाना।"

"भाई—"

"टिंकू, ये मेरा हुक्म है।"

उसका मुँह खुला रह गया। मैंने कभी उसे हुक्म नहीं दिया था। वो पीछे हट गया, पीपल के तने के पीछे।

मैं सामने आया। धोती कंधे से उतारकर सिर पर रख ली — जैसे पापा करते थे। "रुक जाओ," मैंने कहा।

दोनों आदमी मेरी तरफ़ देखने लगे। पीछे बैठे वाले ने हाथ में लाठी उठाई। "कौन है तू?"

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