Spirit of a Fighter677 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 677

6 min read November 5, 2026

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठों पर एक मुस्कान आई — ऐसी मुस्कान जो दुख से बनी हो।

"मैंने कहा," वो बोलीं, "कि मेरा बेटा मुकाबले में उतरेगा, और वो जीतेगा। और तेरे भैरव को उसकी शक्ल देखनी होगी, तो अखाड़े में आना।"

मैं हँसा। हँसी में पानी मिला हुआ था।

"माँ," मैंने कहा, "आप…"

"अब चुप कर," उन्होंने कहा। "और मुझे यहाँ से निकाल। मेरी कमर टूट रही है इस चारपाई पर।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें उठाया। वो मेरे सहारे से खड़ी हुईं और उनकी कमर से एक आवाज़ आई जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुला हो।

हम बाहर आए। रामदीन अब भी चारपाई पर बँधा था, पर उसने हमें देखते ही अपनी आँखों में रोशनी देखी।

"सरस्वती," उसने धीरे से कहा।

माँ रुकीं। उन्होंने रामदीन की तरफ़ देखा और उनका चेहरा बदल गया।

"रामदीन?" उनकी आवाज़ काँपी। "तुम… तुम ज़िंदा हो?"

"बीस साल से मरा हुआ हूँ," रामदीन ने कहा। "आज तुम्हारे बेटे ने ज़िंदा किया।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक सवाल था, और वो सवाल मैं पढ़ नहीं पाया।

"माँ," मैंने कहा, "इन्हें भी निकालना है।"

माँ ने रामदीन की कलाइयों की तरफ़ देखा। रस्सी, खून, सूजन।

"टिंकू," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में फिर वो सख़्ती आ गई जो मैं बचपन से जानता था, "चाकू निकाल। अब काट।"

टिंकू ने चाकू निकाला और रस्सी काटी। रामदीन की कलाइयाँ खुलीं और उसने उन्हें अपनी छाती से लगाया। वो रोया। ज़ोर से नहीं, बस पानी बहता रहा।

पर तभी पीछे से ज़ंजीर खड़खड़ाई।

मैं पलटा।

और भैरव की आवाज़ आई —

"तो तुम आ गए, वीर सिंह। मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।"

वो दरवाज़े पर खड़ा था। लाल धोती, सोने की चेन, तेल लगी मूँछें। उसके पीछे दो आदमी थे, दोनों के हाथों में लाठियाँ।

पर उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। वो थी जो एपिसोड एक सौ तिरसठ में थी — थकी हुई, टूटी हुई।

माँ मेरे पीछे आईं और मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"मोहन," उन्होंने कहा।

भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर कुछ और आया — शायद शर्म, शायद दर्द।

"चुप रहो," उसने कहा। "तुमने मुझे ये नाम दिया था, और अब यही नाम मुझे मार रहा है।"

"ये नाम तुझे मैंने नहीं दिया," माँ ने कहा। "तेरे पापा ने दिया था। शेर सिंह ने।"

भैरव ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।

"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब सख़्त थी। "मैं तुझे मारने नहीं आया। मैं तुझे एक आख़िरी बात कहने आया हूँ।"

"क्या?"

"मैंने तेरे पापा को जलाया," भैरव ने कहा। "और मैंने ही तेरी माँ को यहाँ बंद किया। मैंने ही तेरे लिए ज़हर के बोतलें भेजीं। मैंने ही तेरे दोस्त को डराया।"

वो रुका। उसके पीछे के दोनों आदमी हिले नहीं।

"पर आज," भैरव ने कहा, "मैं तुझे नहीं मारूँगा। मैं तुझे अखाड़े में मारूँगा। सबके सामने। ताकि सब देखें कि मिट्टी किसकी है।"

मैंने अपनी मुट्ठी बांधी। "तो अखाड़े में मिल," मैंने कहा। "और अपनी बोतलें भी ले आना। क्योंकि मैं तुझे उन्हीं के सामने हराऊँगा।"

भैरव हँसा। हँसी ऐसी थी जैसे किसी कुएँ में पत्थर गिरा हो।

"बच्चा," उसने कहा। "तू अभी भी बच्चा है।"

वो पलटा और चला गया। उसके दोनों आदमी पीछे-पीछे गए।

मैंने राहत की साँस ली।

पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ मज़बूत थी, और उनकी आवाज़ धीमी।

"वीर," उन्होंने कहा, "वो जानबूझकर तुझे छोड़कर गया। इसका मतलब है कि उसने कुछ और सोचा है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "क्या?"

"उसने जो हँसी हँसी," माँ ने कहा, "वो हारने वाले की हँसी नहीं थी। वो जीतने वाले की हँसी थी।"

रामदीन ने धीरे से कहा, "वो सही कह रही है। भैरव ने पहले भी ऐसे हँसा था — बीस साल पहले, उस रात जब उसने मुझे कुएँ में बंद किया था।"

टिंकू ने अपना चाकू जेब में रखा और हम सबकी तरफ़ देखा।

"तो अब क्या?" उसने पूछा।

मैंने माँ को देखा। उनके चेहरे पर वो सख़्ती लौट आई थी जो मैं बचपन से जानता था — वो सख़्ती जो कहती थी कि मैं जानती हूँ क्या करना है।

"अब," माँ ने कहा, "हम घर चलेंगे। और सुबह अखाड़े में।"

मैंने सिर हिलाया।

पर जब मैं पलटा, तो मेरी नज़र रामदीन पर पड़ी। वो अपनी कलाइयाँ देख रहा था, और उसकी उँगलियाँ हिल नहीं रही थीं। उसने मुट्ठी बनानी चाही, पर बन नहीं पाई।

"काका," मैंने कहा, "आपकी उँगलियाँ…"

"बीस साल रस्सी में बँधी थीं," रामदीन ने कहा। "अब वो मेरी नहीं लगतीं।"

मीरा उसके पास गई। उसने कलाई पकड़ी, धीरे से दबाया। रामदीन ने दर्द से आँखें सिकोड़ लीं।

"ये ठीक हो जाएँगी," मीरा ने कहा। "पर वक़्त लगेगा। और मालिश करनी होगी।"

"वक़्त," रामदीन ने धीरे से कहा। "बीस साल से यही तो काट रहा हूँ।"

मैं उसके पास बैठ गया। "काका," मैंने कहा, "मुकाबले में एक गवाह चाहिए जो भैरव के खिलाफ़ बोले। कोई ऐसा जिसने उसे ज़हर बनाते देखा हो।"

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर उसके नीचे कुछ और भी था — एक बीस साल पुराना गुस्सा जो अब बाहर आना चाहता था।

"मैं गवाही दूँगा," उसने कहा। "पर एक शर्त पर।"

"क्या शर्त?"

"मैं उस अखाड़े में खड़ा होऊँगा जहाँ मुझे बंद किया गया था," रामदीन ने कहा। "और मैं सबके सामने बताऊँगा कि भैरव ने क्या किया।"

उसकी आवाज़ में अब कँपकँपी नहीं थी।

माँ ने उसकी तरफ़ देखा और उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई।

"तो तय रहा," माँ ने कहा। "कल सुबह अखाड़े में।"

हम सब उठे। टिंकू ने रामदीन का हाथ पकड़ा और उसे सहारा दिया। रामदीन लड़खड़ाया, पर खड़ा रहा।

मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। पर तभी मेरी नाक में कुछ आया। तेज़, जली हुई। और उसके नीचे — कुछ और भी।

मैं रुक गया।

"वीर?" मीरा ने कहा।

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस ली। हाँ, वही गंध थी। जली हुई मिट्टी। और उसके नीचे — जले हुए बाल। और उसके भी नीचे — कुछ और जो मैंने पहले नहीं सूँघा था।

"कुछ जल रहा है," मैंने धीरे से कहा।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "कहाँ?"

मैंने दीवार की तरफ़ इशारा किया। "ऊपर। आँगन में।"

हम भागे। सुरंग से बाहर, सीढ़ियों से ऊपर, और जैसे ही मैं आँगन में पहुँचा, मेरे पैर रुक गए।

आँगन में आग जल रही थी। पर वो आग घर में नहीं थी। वो घर के बाहर थी — उस पेड़ के नीचे जहाँ गुड़िया की थैली गिरी थी। और आग के बीच में एक लाल धोती पड़ी थी, जल रही थी।

वो धोती मेरी थी। जो मैंने अखाड़े के लिए रखी थी।

आग धीमी थी, पर धुएँ में एक बात थी — वो सिर्फ़ कपड़ा नहीं जल रहा था। उसमें कुछ और भी था। मैंने करीब जाकर देखा। धोती के पास मिट्टी पर कुछ लिखा था, उँगली से। राख गिर रही थी, पर अक्षर अभी बचे थे — "कल तेरी माँ रोएगी।"

मेरा हाथ अपने आप मुट्ठी में बंद हो गया। मीरा ने मेरा कंधा पकड़ा।

"वीर, देखो।"

पेड़ की जड़ के पास गुड़िया की थैली पड़ी थी। जली नहीं थी। जैसे किसी ने उसे जानबूझकर आग से बचाकर रखा हो। और उसके ऊपर एक छोटी सी पोटली रखी थी। मैंने खोली। अंदर सूखी लाल मिर्च और एक टूटा हुआ शीशा। शीशे पर उँगली से खून से लिखा था — "मुकाबला नहीं, मौत।"

टिंकू ने पीछे से कहा, "ये भैरव का काम है। वो चाहता है कि तुम डर जाओ।"

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