Spirit of a Fighter – Chapter 678
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। "ये डराने का नहीं, बुलाने का तरीका है। वो चाहता है कि मैं अभी भागकर उसके पास जाऊँ, गुस्से में। ताकि अखाड़े का मुकाबला कल न हो, आज रात ही हो जाए। और आज रात उसके पास सौ आदमी हैं।"
माँ ने धुएँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"वीर," उन्होंने कहा, "मेरे पास सिर्फ़ तू है। मैं चाहती हूँ कि तू जीतकर आए। पर मैं ये भी चाहती हूँ कि तू लौटकर आए। अगर इन दोनों में से एक चुनना पड़े, तो लौटकर आ जाना। मैं हार सह लूँगी।"
मेरा गला भर आया। मैंने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा, क्योंकि कहता तो रो पड़ता।
रामदीन ने धीरे से कहा, "माँ की बात सुन ले, बेटा। बीस साल पहले मैंने भी एक रात गुस्से में भैरव के पास जाने की सोची थी। अगले दिन मैं कुएँ में था।"
मैंने आग को लात मारकर बुझाया। राख उड़ी और हवा में घुल गई।
मैंने पोटली उठाई और जेब में रखी।
"कल," मैंने कहा। "सुबह। अखाड़े में। जैसा तय हुआ।"
हम पलटे। पर तभी पीछे से ज़ंजीर खड़खड़ाई — वो ज़ंजीर जो सुरंग के दरवाज़े पर लगी थी, और जो हमने खुली छोड़ी थी।
भैरव की आवाज़ आई, धीमी और ठंडी।
"तो तुम आ गए, वीर सिंह। मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।"
॥
वो आवाज़ सुरंग के दरवाज़े से आई थी, और मैंने अपने हाथों को मुट्ठी में कस लिया। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। टिंकू ने रामदीन को अपने पीछे किया। माँ ने पीतल का ढक्कन सीने से लगा लिया।
दरवाज़े पर भैरव खड़ा था। एक हाथ में लालटेन, दूसरा हाथ दरवाज़े की चौखट पर टिका। लाल धोती, वही सोने की चेन, और चेहरे पर वो पुरानी मीठी मुस्कान। जैसे कुछ हुआ ही न हो। जैसे अभी-अभी उसने किसी को खीर खिलाई हो।
"मैं जानता था तुम माँ के लिए आओगे," उसने कहा। "और मैं यही चाहता था।"
मैंने एक कदम आगे रखा। "माँ कहाँ है?"
भैरव ने पीछे के कमरे की तरफ़ सिर हिलाया। "अंदर है। ठीक है। बैठी है। उसे कुछ नहीं हुआ। मैंने कभी किसी औरत को हाथ नहीं लगाया।"
"तूने माँ को उठवाया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से कुछ उबल रहा था। "चूल्हे पर आधी जली रोटी छोड़ी। मेरी धोती जलाई। गुड़िया की थैली के पास खून से लिखा शीशा रखा। ये सब क्या है?"
"ये सब बुलाने का तरीका है," भैरव ने कहा। वो मुस्कुराया। "और तुम आ गए। तो तरीका काम कर गया।"
"माँ कहाँ है?" मैंने फिर कहा। इस बार आवाज़ तेज़ थी।
भैरव ने लालटेन ऊपर उठाई। उसकी रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी। "पहले एक बात सुन लो। आज रात अगर तुमने माँ को ले जाने की कोशिश की, तो सुबह मुकाबले में तुम्हारी जगह तुम्हारी लाश उतरेगी।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। रामदीन ने साँस रोक ली। टिंकू का हाथ मेरे कंधे पर आया और रुक गया।
मीरा आगे आई। उसके कदम साफ़ थे, बिना डर के।
"भैरव," उसने कहा, "तुम अदालत हार चुके हो। माधव सिंह पकड़े जा चुके हैं। तुम्हारा ज़हर सबके सामने खुल चुका है। अब तुम्हारे पास कुछ नहीं बचा।"
भैरव हँसा। पर वो हँसी पहले जैसी नहीं थी। उसमें कुछ टूटा हुआ था।
"मैडम," उसने कहा, "जिसके पास मौत बची हो, उसके पास सब कुछ बचा होता है।"
वो जेब से कुछ निकालने लगा। एक छोटी शीशी। नीली। उसने उसे लालटेन की रोशनी में उठाया और घुमाया। शीशी में कुछ सफ़ेद था।
"ये ज़हर नहीं है," उसने कहा। "ये दवा है। तुम्हारी माँ के लिए। तुम्हारी माँ का दम फूलता है, है ना? रात को उठकर बैठ जाती है? मैं जानता हूँ। मैं बीस साल से जानता हूँ।"
मेरा पेट ठंडा हो गया। माँ को दम फूलता था। ये बात मैंने कभी किसी को नहीं बताई थी। रात को जब वो उठकर बैठ जाती थीं, मैं चुपचाप पानी लेकर आता था और कुछ नहीं पूछता था।
"ये दवा तुम्हारी माँ को रोज़ मिलती है," भैरव ने कहा। "कल भी मिलेगी। पर अगर तुम कल मुकाबले में उतरे, तो ये दवा उसकी माँ को नहीं मिलेगी। बात सीधी है। तुम्हारी जीत या उसकी साँस। दोनों एक साथ नहीं।"
रामदीन ने पीछे से कहा, "झूठ। तेरे पास कोई दवा नहीं है। तू तो सिर्फ़ ज़हर जानता है।"
भैरव ने रामदीन की तरफ़ देखा। पहली बार उसकी आँखों में कुछ और आया। "तू अभी भी ज़िंदा है," उसने धीरे से कहा। जैसे अपने आप से बोल रहा हो। "बीस साल। मैंने सोचा था तू सूखकर मर गया होगा।"
"मैं मरा नहीं," रामदीन ने कहा। "मैं सिर्फ़ बंद था। फ़र्क़ है।"
तभी कालू काका आगे आए। उनकी लाठी ज़मीन पर टिकी हुई थी और उनका कुबड़ा शरीर अब भी झुका हुआ था। पर उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था। साफ़ थी, सीधी।
"भैरव," उन्होंने कहा, "बीस साल पहले मैंने तुम्हें इसी कुएँ पर देखा था। उस रात। जब शेर सिंह जला। मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि मैं डर गया था। आज मैं गवाही दूँगा।"
भैरव का चेहरा पहली बार बदला। वो मुस्कान जो हमेशा उसके चेहरे पर चिपकी रहती थी, वो खिसक गई। उसने लालटेन दूसरे हाथ में ली। उँगलियाँ काँप रही थीं।
"कालू," उसने धीरे से कहा, "तू तो मेरे साथ खाया है। तू तो मेरी मिट्टी में हाथ डालता है।"
"हाँ," कालू काका ने कहा। "और वही मिट्टी आज मुझसे बोल रही है। मैं बूढ़ा हूँ, भैरव। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं बचा। इसलिए अब डरने का भी वक़्त नहीं बचा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा और बहुत हल्का सिर हिलाया। जैसे कहे — देख, अब सब तेरे साथ हैं।
मैं भैरव की तरफ़ बढ़ा। मेरे पैर नंगे थे। कीचड़ और राख मेरे तलवों पर चिपकी हुई थी। मैं उसके सामने रुका, इतने पास कि उसकी साँस की गंध आने लगी। उसकी साँस में वही कड़वाहट थी जो उस रात हरी शीशी में थी। ज़हर अपनी भी साँसों में घोल रखा है, मैंने सोचा। और सोचकर मुझे उस पर तरस आया। ये सोचकर मुझे अपने आप पर गुस्सा आया।
"मैं तुमसे लड़ने नहीं आया," मैंने कहा। "मैं माँ को लेने आया हूँ।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो टलीं नहीं। पर उनमें वो ठंडक कुछ कम थी।
"और माँ को लेने के लिए मुझे किसी ज़हर की ज़रूरत नहीं," मैंने कहा। "मुझे सिर्फ़ अपनी मिट्टी की ज़रूरत है। वो मिट्टी जो तेरी अलमारी में नहीं है, तेरी बोतलों में नहीं है, तेरे काग़ज़ों में नहीं है। वो मिट्टी मेरे पैरों के नीचे है। और वो मेरे साथ है।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सोचा वो कुछ कहेगा। कोई ताना। कोई धमकी। पर उसने कुछ नहीं कहा।
वो पलटा। कमरे के बीच में आया। और फिर उसने वो नीली शीशी ज़मीन पर पटक दी।
शीशी टूटी। सफ़ेद पाउडर मिट्टी पर बिखर गया। और मेरी नाक में पहली बार उसका असली रंग आया — मीठी, हल्की, जानी-पहचानी गंध। वो ज़हर नहीं था। वो हल्दी थी। सूखी हल्दी। वही हल्दी जो माँ माथे पर लगाती है।
भैरव झुका। उसने उँगली से मिट्टी से मिली हल्दी छुई और अपनी ज़ुबान पर लगाई। "बीस साल," उसने धीरे से कहा, "मैंने जो सबको ज़हर दिया, वो ज़हर था। और जो सबसे आख़िर में मुझे मिला, वो हल्दी थी। तुम्हारी माँ ने वो पोटली मुझे दी थी। उस दिन तहखाने में। कहा था — 'मोहन, तेरे पापा ने भी तुझे ज़हर दिया था। अब हल्दी लगा, सिर ठंडा हो।'"
उसकी आवाज़ रुँध गई। उसने हाथ से मुँह ढक लिया। फिर हटा दिया। "मैंने वो पोटली जेब में रखी और कभी नहीं खोली। आज खोली। सिर्फ़ हल्दी थी। सिर्फ़ हल्दी।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno