Spirit of a Fighter676 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 676

6 min read November 5, 2026

"तेरे पापा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ जैसे किसी कुएँ से आ रही हो, "शेर सिंह मेरे भाई से कम नहीं थे। जब भैरव ने मुझे इस कुएँ में बंद किया, तो सिर्फ़ एक आदमी मेरे लिए पानी लेकर आया था। तेरे पापा। रात के अंधेरे में, चुपके से। और जब भैरव को पता चला, तो उसने तेरे पापा को जलाने का हुक्म दिया।"

मेरा गला सूख गया।

"मेरे पापा ने आपके लिए…" मैं बोल नहीं पाया।

"हाँ," रामदीन ने कहा। "और उससे पहले, जिस रात भैरव ने मुझे यहाँ बंद किया, उस रात तेरे पापा ने मेरी कलाई पकड़ी थी। उन्होंने कहा था — भाई, अगर मैं न रहूँ, तो मेरे बेटे को बता देना कि अखाड़े की मिट्टी किसी की जागीर नहीं, वो सबकी माँ है।"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने अपनी आँखें मलीं, पर पानी रुका नहीं।

"बीस साल," रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "बीस साल मैंने इस तहखाने में काटे। रोज़ रोज़ मैंने सोचा कि कोई आएगा। रोज़ रोज़ मैंने दीवारों से बात की। और आज तू आया है।"

वो रो पड़ा। उसका पूरा शरीर काँप रहा था, और रस्सी उसकी कलाइयों में और गहरी धँस रही थी।

टिंकू ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। "काका," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भी भर्रा गई, "अब आप अकेले नहीं हैं। अब हम हैं।"

रामदीन ने टिंकू की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक बच्चे जैसा भरोसा था।

"तू मिठाई बनाता है?" रामदीन ने पूछा।

"हाँ, काका," टिंकू ने कहा। "गाँव में मेरी दुकान है। टिंकू मिष्ठान भंडार।"

"मेरी माँ भी मिठाई बनाती थी," रामदीन ने धीरे से कहा। "गुड़ की। और नारियल की।"

टिंकू ने उसकी आँखों में देखा। "जब आप बाहर आएँगे," उसने कहा, "मैं आपके लिए गुड़ और नारियल की मिठाई बनाऊँगा। आप खाएँगे?"

रामदीन ने धीरे से सिर हिलाया। "खाऊँगा," वो बोला। "अगर बाहर निकला।"

मैंने अपनी आँखें पोंछीं। अब रोने का वक़्त नहीं था। मैं उठा और दीवार की तरफ़ बढ़ा।

"काका," मैंने कहा, "अगले कमरे का दरवाज़ा किस तरफ़ है?"

रामदीन ने अपने होंठ से इशारा किया। "बाईं तरफ़। पर अंधेरे में मत जाना। पहले लालटेन मीरा से लो।"

मीरा पहले ही मेरे पास आ चुकी थी। उसने लालटेन मेरे हाथ में दी, और अपनी जेब से एक छोटी थैली निकाली।

"ये काली मिर्च और तुलसी का पाउडर है," उसने कहा। "अगर वो जाग जाए, तो उसकी आँखों में फेंकना। जलन होगी, और हमें वक़्त मिलेगा।"

मैंने थैली ली और अपनी जेब में रखी।

टिंकू मेरे पीछे आया। "मैं साथ चलूँ?" उसने पूछा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ में चाकू था, पर वो काँप रहा था।

"तुम यहाँ रहो," मैंने कहा। "रामदीन काका के पास। अगर कोई आए, तो आवाज़ करना।"

टिंकू ने सिर हिलाया। उसने अपना चाकू मज़बूत से पकड़ लिया।

मैं मीरा के साथ बाईं तरफ़ बढ़ा। अंधेरा ऐसा था कि मुझे अपने ही हाथ नहीं दिख रहे थे। लालटेन की रोशनी दीवारों पर पीले धब्बे बना रही थी।

और फिर मुझे आवाज़ आई। कोई सो रहा था। खर्राटे। ऊँचे, भारी।

मीरा ने मेरा कंधा दबाया। हम दोनों रुक गए।

सामने, कुछ दूर पर, एक लोहे का दरवाज़ा था। उस पर ज़ंजीर बंधी थी, और ज़ंजीर पर एक बड़ा ताला लगा था। दरवाज़े के सामने एक चारपाई थी, और उस पर एक आदमी पीठ के बल सो रहा था। उसका पेट ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके हाथ में लाठी थी, वो उसने सीने पर रखी हुई थी।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा।

मैंने अपनी जेब से थैली निकाली और उसे खोला। काली मिर्च और तुलसी की तेज़ गंध मेरी नाक में घुसी और मेरी आँखें भर आईं।

मीरा ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा और उसके होंठ मेरे कान के पास आए।

"मैं ज़ंजीर की तरफ़ जाती हूँ," उसने फुसफुसाया। "तुम उसके पास। अगर वो जागा, तो पाउडर फेंकना। पर तभी, जब मैं कहूँ।"

"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "तुम…"

"अभी मत बोलो," उसने कहा। और फिर एक पल के लिए उसने मेरे हाथ को दबाया — इतना हल्का कि मुझे लगा मुझे भ्रम हुआ। "बाद में बोलना।"

वो दीवार के साथ-साथ सरकने लगी। उसके कदम ऐसे पड़ रहे थे जैसे बिल्ली चलती है।

मैं सीधा उस आदमी की तरफ़ बढ़ा। एक कदम। दो कदम। मेरी साँस मैंने रोक ली थी।

सोता हुआ आदमी खर्राटे ले रहा था। उसका चेहरा भद्दा था, झुर्रियाँ थीं और मुँह में दो दाँत ही बचे थे। उसकी गंध मुझ तक आई। पुराना पसीना, धुआँ और तेज़ शराब। उसने पी रखी थी।

मैं उसके पास पहुँचा। लाठी उसके सीने पर थी। मुझे उसे पकड़ना था, बिना आवाज़ किए।

मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया। मेरी उँगलियाँ लाठी तक पहुँचीं।

और मीरा की तरफ़ से आवाज़ आई। ज़ंजीर की आवाज़। धीमी, बहुत धीमी।

पर वो आदमी जाग गया।

उसकी आँखें खुलीं। वो एक पल के लिए घबराया, और फिर उसकी नज़र मेरे ऊपर पड़ी।

उसने मुँह खोला — चीखने के लिए।

मैंने थैली उसके मुँह पर दे मारी। काली मिर्च और तुलसी का पाउडर उसकी आँखों और नाक और मुँह में घुस गया।

वो चीखा। उसकी चीख दबी हुई थी, क्योंकि उसका गला पाउडर से भर गया था। वो हाथ से मुँह पकड़कर उठा, चारपाई से गिरा, और ज़मीन पर गड़बड़ाने लगा।

"मीरा!" मैं चिल्लाया।

मीरा ने ज़ंजीर खींची। ताला खुला नहीं था, पर ज़ंजीर ढीली थी। वो ज़ोर लगा रही थी।

मैं उस आदमी को छोड़कर मीरा की तरफ़ दौड़ा। उसने मेरी तरफ़ ताला दिखाया। बड़ा, काला लोहे का।

"चाबी?" मैंने कहा।

"उसके पास होगी," मीरा ने कहा और उस आदमी की तरफ़ इशारा किया।

मैं पलटा। वो आदमी अब भी ज़मीन पर था, आँखें मल रहा था। मैंने उसके कुर्ते की जेब टटोली। पहली जेब खाली। दूसरी में कुछ था — एक लोहे की छोटी चाबी।

मैंने उसे निकाला और मीरा को दिया।

मीरा ने ताला खोला। ज़ंजीर खुली और दरवाज़ा खुल गया।

और मैं अंदर गया।

कमरा छोटा था। दीवार पर एक मिट्टी का दीया जल रहा था — धीमी, काँपती लौ। और उस लौ के नीचे, कोने में, एक चारपाई पर, मेरी माँ बैठी थीं।

वो सीने से पीतल का ढक्कन लगाए हुए थीं। उनकी आँखें बंद थीं। होंठ हिल रहे थे — कोई दुआ पढ़ रही थीं, या कोई नाम ले रही थीं।

"माँ," मैंने कहा।

उनकी आँखें खुलीं।

और जो मैंने उनकी आँखों में देखा, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। पहले डर। फिर पहचान। और फिर — मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा होगा — गुस्सा।

"तू क्यों आया?" उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी, चटक रही थी। "मैंने तुझे कहा था न, तीन रात में लौट आना। मैंने कहा था, मैं खुद अंदर आऊँगी। तू क्यों आया?"

मैं उनके पास गया। उनके हाथ ठंडे थे। मैंने उन्हें अपने हाथों में लिया।

"क्योंकि मैं बेटा हूँ," मैंने कहा। "और बेटा माँ को अकेला नहीं छोड़ता।"

उनकी आँखों में पानी आ गया। पर उन्होंने अपने हाथ मेरे हाथों से छुड़ाए और मेरे गाल पर एक हल्का-सा थप्पड़ मारा। ज़ोर से नहीं, बस इतना कि मैं समझ जाऊँ।

"बेवकूफ," उन्होंने कहा। और फिर मुझे अपने सीने से लगा लिया। "मेरा बेवकूफ बेटा।"

मैंने उन्हें अपने सीने से लगाया। उनके शरीर में हल्की-सी कँपकँपी थी, और उनकी साँस मेरे कंधे पर गर्म पड़ रही थी।

"भैरव ने कुछ कहा?" मैंने पूछा।

वो मुझसे अलग हुईं और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें साफ़ थीं। डर नहीं था उनमें। बस वो ठंडी थीं।

"उसने कहा," माँ ने कहा, "कि तू मुकाबले में उतरेगा, तो मैं तुझे आख़िरी बार देख लूँ।"

"और आपने क्या कहा?"

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