Spirit of a Fighter675 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 675

6 min read November 5, 2026

"वीर सिंह?" वो दोहराई, जैसे नाम को ज़ुबान पर रखकर तौल रही हो। "तो तू आ गया।"

मेरा दिल धक्क से रह गया। ये आवाज़ मैंने बीस साल सुनी थी — हर सुबह, हर शाम। पर ये आवाज़ वो नहीं थी जिसे मैं अब तक माँ कहता आया था।

ये आवाज़ किसी और की थी।

॥

वो आवाज़ आई थी — "ये आवाज़ किसी और की थी।" — और मेरे हाथ से लालटेन फिसलने लगी।

मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा। लोहे की कड़ी पर उँगलियाँ जम गई थीं, ऐसी ठंडी थी। सामने का अंधेरा ऐसा था जैसे किसी ने काली चादर तान दी हो।

"लालटेन दे," मीरा ने पीछे से कहा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था, बस वो तेज़ थी जो काम पड़ने पर हो जाती है।

मैंने लालटेन उसकी तरफ़ बढ़ाई। वो मेरे हाथ के पास आई, और उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर पड़ीं। उसके हाथ ठंडे थे। पर साफ़।

उसने लालटेन के पेंदे में एक छोटी सी पिन जैसी चीज़ घुमाई, और रोशनी तेज़ हो गई। मुझे इतना भी नहीं पता था कि लालटेन की लौ बढ़ाई भी जा सकती है।

"तुम ये कैसे किया?" मैंने पूछा।

"किताब में पढ़ा था," वो बोली। "पर अभी ये मत पूछ। अंदर देख।"

रोशनी दीवार तक पहुँची। दीवारें मिट्टी की थीं, पर पत्थर जैसी सख़्त, ऊपर से नीचे तक काली। ज़मीन पर सीलन थी और मेरे पैरों के नीचे कुछ चरमराया।

मैंने नीचे देखा। सूखी हड्डियाँ नहीं थीं। सिर्फ़ भूसी और सड़ी लकड़ी थी। मेरी साँस लौटी।

कमरा बड़ा था। कोने में एक चारपाई पड़ी थी, उस पर फटी चटाई। और उस चटाई पर कोई बैठा था।

आदमी की कलाइयाँ रस्सी से बँधी थीं, रस्सी का दूसरा सिरा दीवार में लगे लोहे के कुंदे से बंधा था। उसका शरीर ऐसा सूखा था जैसे भीतर से खोखला हो गया हो। सिर पर सफ़ेद बाल बिखरे थे, दाढ़ी बढ़ी हुई, और आँखें — मुझे उसकी आँखें देखकर लगा कि जैसे कोई बहुत दिनों से रोशनी न देखा हो।

"तू वही है?" उसने कहा। आवाज़ फटी थी, सूखी, जैसे पुरानी भुजिया।

"मैं वीर सिंह हूँ," मैंने कहा। "तुम कौन हो?"

वो हँसा। हँसी से ज़्यादा खाँसी थी।

"मुझे नहीं पहचाना?" वो बोला। "मैंने तुझे तेरे दादा की गोद में खेलते देखा था। तब तेरे पैर इतने नन्हे थे कि एक हथेली में आ जाएँ।"

मेरा गला सूख गया। "रामदीन?"

उसकी आँखों में चमक आई। ऐसी चमक जैसे बरसों बाद किसी ने उसका नाम लिया हो।

"तो तू मुझे जानता है," वो बोला। "मैंने सोचा था भैरव मेरा नाम भी मिटा देगा।"

टिंकू पीछे से आया। उसने रामदीन को देखा और उसका मुँह खुला रह गया।

"ये तो…" टिंकू ने धीरे से कहा। "ये तो बिल्कुल खत्म हो गया है।"

रामदीन ने टिंकू की तरफ़ देखा। "तू कौन है, नन्हे?"

"मैं टिंकू हूँ," वो बोला। "वीर का दोस्त। मिठाई बनाता हूँ।"

रामदीन की आँखों में कुछ पिघला। "मिठाई," उसने धीरे से दोहराया। "बीस साल में मैंने मिठाई नहीं खाई।"

टिंकू ने बिना एक पल गँवाए अपनी जेब से डिब्बी निकाली। उसने ढक्कन खोला और एक लड्डू रामदीन के मुँह के सामने किया।

"पहले खा," उसने कहा। "फिर बात करना।"

रामदीन ने लड्डू देखा और उसकी आँखों से पानी बहने लगा। उसने मुँह खोला, पर होंठ काँप रहे थे इतने कि लड्डू गिर गया।

टिंकू ने उसे उठाया और इस बार अपने हाथ से रामदीन के मुँह में डाल दिया।

रामदीन ने धीरे-धीरे चबाया। उसका चेहरा ऐसे बदला जैसे कोई बच्चा पहली बार मिठाई खा रहा हो। आँसू उसकी दाढ़ी में गिर रहे थे और वो चबा रहा था।

"ठीक है," वो बोला, मुँह भरा हुआ। "तू अच्छा लड़का है।"

मीरा आगे आई। उसने रामदीन की कलाई पकड़ी और रस्सी देखी।

"ये रस्सी बहुत कसी है," उसने कहा। "आपकी कलाई कट रही है।"

"अब दर्द नहीं होता," रामदीन ने कहा। "बीस साल में दर्द भी आदत बन जाता है।"

मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से एक छोटी सी काँच की शीशी निकाली, जिसमें पीला-सा तेल था। उसने रामदीन की कलाई पर लगाया।

रामदीन ने आँखें बंद कर लीं। उसकी साँस धीमी हो गई।

"ये गंध," वो बोला। "हल्दी और नीम। मेरी माँ भी यही लगाती थी।"

"ये घाव जल्दी भर जाएगा," मीरा ने कहा। "पर रस्सी ढीली करनी पड़ेगी।"

"नहीं!" रामदीन ने अचानक आँखें खोलीं। "ढीली मत करो। भैरव के आदमी आते हैं। अगर उन्हें पता चला कि मैं खुला हूँ, तो वो मुझे यहीं खत्म कर देंगे।"

मैं उसके पास बैठ गया। ज़मीन ठंडी थी और सीलन मेरी धोती में उतर रही थी।

"रामदीन काका," मैंने कहा, "माँ कहाँ है?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर आ गया था।

"तू माँ को ढूँढने आया है?" उसने कहा। "वो अगले कमरे में है। पर वहाँ जाना आसान नहीं। दरवाज़े पर लोहे की ज़ंजीर है, और उसके पीछे भैरव का आदमी सो रहा है। बड़ा आदमी है, हाथ में लाठी रखता है।"

मैं उठा। मेरे पैरों ने अपने आप दीवार की तरफ़ बढ़ना चाहा, पर रामदीन ने मेरा कुर्ता पकड़ लिया।

"रुक," वो बोला। "जल्दबाज़ी में सब बिगड़ जाएगा। भैरव ने उस आदमी से कहा है कि अगर कोई आए, तो पहले उसकी आवाज़ सुने बिना लाठी चलानी है। वो अंधेरे में भी सुनता है। कान तेज़ हैं उसके।"

"तो क्या करें?" टिंकू ने पूछा। "हम चार हैं, वो एक है।"

"चार नहीं," रामदीन ने कहा। "तुम तीन हो। मैं तो रस्सी से बँधा हूँ।"

टिंकू ने अपनी जेब से एक चाकू निकाला। छोटा-सा, मिठाई काटने वाला।

"मैं रस्सी काट दूँ?" उसने पूछा।

रामदीन ने चाकू देखा और उसकी आँखों में डर फैल गया। "नहीं! अभी नहीं। अगर भैरव को पता चला कि मैं खुला हूँ, तो वो तुम्हारी माँ को कुछ कर देगा। पहले उसे बाहर निकालो, फिर मुझे।"

मैंने रामदीन के सामने घुटने टेके। "काका, माँ को कुछ हुआ?"

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में करुणा आ गई। वो कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द उसके गले में अटक रहे थे।

"बोलो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।

"उसे कुछ नहीं हुआ," रामदीन ने धीरे से कहा। "वो ठीक है। पर भैरव ने उससे एक बात कही है।"

"क्या?"

रामदीन ने निगाह नीची कर ली। "भैरव ने कहा — अगर वीर मुकाबले में उतरा, तो तू अपने बेटे को आख़िरी बार देख ले।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए। सीलन वाली ज़मीन पर मेरी मुट्ठी से पानी टपका, ऐसा मुझे लगा। पर वो मेरा पसीना था।

"आख़िरी बार?" टिंकू ने कहा। "मतलब…"

"मतलब वो जो तू सोच रहा है," रामदीन ने कहा। "भैरव मुकाबले में वीर को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी।

"वीर," उसने कहा। "सुनो मेरी बात।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा आधा अंधेरे में था और आधा उजाले में।

"मैं सुन रहा हूँ," मैंने कहा।

"अगर हम जल्दबाज़ी करेंगे, तो वो आदमी जाग जाएगा और माँ को खतरा होगा। हमें सोच-समझकर चलना होगा।"

"मैं सोच-समझकर नहीं चल सकता," मैंने कहा। "मेरी माँ वहाँ बंद है।"

"और मेरे पिता भी बंद थे बीस साल," रामदीन ने कहा। उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी। "मैंने सोच-समझकर चलना सीखा, इसलिए आज ज़िंदा हूँ। तेरे पापा ने भी सोच-समझकर चलना सीखा था, तभी तू आज यहाँ खड़ा है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "आपने मेरे पापा को जाना?"

रामदीन की आँखें भर आईं। उसने मेरा कुर्ता पकड़कर मुझे अपने पास खींचा। उसकी साँस में मिठाई की मीठी गंध और उसके नीचे सड़न की बू थी, पर मैंने उसे दूर नहीं किया।

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