Spirit of a Fighter – Chapter 657
"तू मेरी मिठाई का हिसाब रखता है," मैंने कहा। "आज रात अपनी जान का रख ले।"
"मेरी जान का हिसाब मेरी माँ रखती है," उसने कहा। "मैं तेरे साथ चलूँगा।"
रात ग्यारह बजे के आस-पास हम निकले। आसमान में बादल थे, चाँद कभी दिखता, कभी छुप जाता। नहर का पानी काला लग रहा था और उसकी आवाज़ आज कुछ ज़्यादा तेज़ थी, जैसे वो भी कुछ कहना चाहता हो। मीरा ने अपने बैग से एक छोटी शीशी निकाली और मुझे दी।
"ये क्या है?"
"तुलसी, काली मिर्च और थोड़ी-सी हींग। अगर कोई पीछे आए, आँखों पर मार देना। जलन होगी, पर नुकसान नहीं।"
"तू ये सब लेकर चलती है?"
"मैं आयुर्वेद पढ़ती हूँ," उसने कहा, "मेडिकल किट मेरा बैग है।"
टिंकू ने पीछे से कहा, "मेरे पास भी कुछ है।" उसने अपनी जेब से एक मुट्ठी गुड़ निकाला। "अगर भूख लगे।"
मैं हँसा, पर मेरी हँसी अंदर तक नहीं गई। रास्ते में मैंने एक बार पलटकर देखा। गाँव की लाइटें दूर थीं, और उनके पीछे मेरा घर था, जहाँ माँ जाग रही थी और पापा चारपाई पर लेटे थे और गुड़िया अपनी कॉपी से चिपकी सो रही थी।
नदी का पत्थर। मुझे याद आया — बीस साल पहले, पापा जब जले थे, तो उन्हें कहाँ ले जाया गया था? माँ ने कभी नहीं बताया। भैरव ने कहा था कि उसे जंगल के किनारे एक झोपड़ी में रखा गया था। पर जंगल के किनारे नदी नहीं थी।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर कोई आदमी बीस साल तक किसी को छुपाकर रखे, तो वो कहाँ रखेगा?"
"वहाँ जहाँ कोई ढूँढने न आए," उसने कहा। "और जहाँ पानी हो। क्योंकि जले हुए शरीर को हर दिन पानी चाहिए।"
मेरे पैर रुक गए। "नदी के किनारे।"
"नदी के किनारे," उसने कहा। "पर कौन-सी नदी? हमारी नहर तो सिर्फ़ बहाना है। असली नदी तो उस पार है, शहर के रास्ते पर, जहाँ पुराना पुल है।"
पुराना पुल। वो पुल जिसके नीचे से मैं बचपन में गुज़रा था। जहाँ कभी माँ मुझे ले जाती थीं और कहती थीं, "यहाँ से आगे मत जाना।" मैंने हमेशा सोचा था कि वो डरती थीं कि मैं गिर न जाऊँ। पर अब समझ आ रहा था कि वो किसी और चीज़ से डरती थीं।
हम पुराने पुल तक पैदल चले। रास्ते में एक बार एक कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया। एक बार टिंकू की चप्पल टूट गई, उसने उसे हाथ में उठा लिया और चलता रहा। मीरा के कदम सबसे तेज़ थे — जैसे वो वहाँ पहले से पहुँचना चाहती हो।
पुल के नीचे उतरते वक़्त मैंने अपनी नाक से हवा खींची। पानी की गंध थी, कीचड़ की, और… उसके ऊपर एक पतली-सी गंध जो मैं भूल नहीं सकता था। जली हुई लकड़ी। और उसके नीचे — हल्दी।
"यहाँ कोई है," मैंने धीरे से कहा।
"कौन?" मीरा ने पूछा।
"पता नहीं। पर वो माँ की तरह हल्दी इस्तेमाल करता है।"
पुल के नीचे एक छोटी-सी झोपड़ी थी, पुरानी, टूटी हुई, जिसकी छत पर सूखी घास पड़ी थी। उसका दरवाज़ा खुला था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी — लालटेन की। मैंने मीरा की तरफ़ देखा और उसने सिर हिलाया। टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।
अंदर जाते ही मैंने देखा — एक बूढ़ी औरत, चूल्हे के पास बैठी, हाथ में लकड़ी। उसके बाल पूरी तरह सफ़ेद थे और उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर उसकी आँखें — वो आँखें किसी बूढ़ी औरत की नहीं थीं। वो साफ़ थीं, तेज़, और उनमें वो चीज़ थी जो मैंने माँ की आँखों में देखी थी।
"आ गए," उसने कहा, बिना पलटे, जैसे उसे पता था कि हम कब आएँगे। "बैठो। चाय बनाई है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें छोटी हो गई थीं। टिंकू ने अपना मुँह खोला, फिर बंद कर लिया।
"तू कौन है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सख़्त थी, क्योंकि मेरे भीतर डर था और मैं उसे छुपा रहा था।
औरत ने चूल्हे से एक कटोरी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "पहले पी ले। फिर पूछ। रास्ते में ठंड लग गई होगी।"
"मैं कुछ नहीं पीने वाला," मैंने कहा। "जब तक तू अपना नाम नहीं बताती।"
वो हँसी। उसकी हँसी सूखी थी, पर उसमें कुछ था जो मुझे अजीब लगा — जैसे मैंने ये हँसी पहले सुनी हो।
"मेरा नाम कमला है," उसने कहा। "बीस साल पहले इस गाँव के हर बच्चे को पता था कि कमला कौन है। आज किसी को याद नहीं।"
"कमला?" टिंकू ने कहा। "वो कमला जो… जो रघुवीर की…"
"हाँ," उसने कहा। "वो कमला जो रघुवीर की बीवी थी। मीरा की माँ।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"ये झूठ है," मीरा ने धीरे से कहा। "मेरी माँ मर चुकी है। मेरे पापा ने बताया था।"
कमला ने अपना सिर हिलाया। "तेरे पापा ने तुझे बताया था कि मैं मर गई हूँ। पर मैं मरी नहीं। मुझे मारने की कोशिश हुई — भैरव ने की थी, माधव के कहने पर। पर तेरे पापा ने मुझे बचाया। और फिर वो मुझे यहाँ ले आए। बीस साल तक मैं इस झोपड़ी में रही। तेरे पापा हर महीने आते थे, और हर बार मैं उनसे पूछती थी — 'मीरा कैसी है?' और वो कहते थे, 'बड़ी हो रही है। तेरे जैसी हो रही है। पर उसे मत बताना।'"
मीरा की आँखों से पानी बह रहा था, पर वो रो नहीं रही थी। वो बस देख रही थी, जैसे किसी पुरानी तस्वीर को पहली बार देख रही हो। "तो तुम मेरी माँ हो," उसने धीरे से कहा। "और तुमने मुझे बीस साल तक अकेला रहने दिया?"
कमला ने अपनी कटोरी नीचे रखी और उसके हाथ काँपे। "अकेला नहीं," उसने कहा। "मैं हर रोज़ तेरे स्कूल के बाहर खड़ी रहती थी। हर रोज़। तू बाहर आती थी, अपना बैग सँभालती थी, और मैं दूर से देखती थी। एक बार तू गिर गई थी — तेरे घुटने से खून आया था — और मैं भागकर जाने ही वाली थी। पर तेरे पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उन्होंने कहा — 'एक बार दिख गई, तो भैरव को पता चल जाएगा। और फिर तेरा बचना मुश्किल है।' इसलिए मैं रुकी। हर रोज़ रुकी।"
मीरा ने अपना मुँह अपनी हथेली पर रख लिया। उसकी साँस तेज़ थी। मैंने उसका कंधा पकड़ा, और वो मेरे सहारे से खड़ी रही।
"तो ये सब," मीरा ने कहा, "पापा की बीमारी, भैरव का ज़हर, माधव का झूठ… तुम सब जानती थीं?"
"कुछ जानती थी," कमला ने कहा। "कुछ अंदाज़ा लगाती थी। पर सबूत नहीं थे। और एक औरत, जो मरी हुई मानी जाती है, किस अदालत में जाएगी?"
वो उठी और एक लोहे के बक्से के पास गई। उसने उसे खोला और अंदर से कुछ निकाला — एक पुरानी कॉपी, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे।
"ये तेरे पापा की डायरी है," उसने कहा। "जो उन्होंने बीस साल पहले लिखनी शुरू की थी। इसमें हर वो चीज़ लिखी है जो उन्होंने देखी — और मुझे दी, ताकि अगर कल वो न रहें, तो कोई इस सच को आगे ले जाए।"
उसने डायरी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने उसे खोला। पन्नों पर रघुवीर की लिखाई थी — टेढ़ी, काँपती हुई, जैसे वो बीमारी में लिख रहे हों। एक पन्ने पर लिखा था — "आज माधव ने भैरव को अखाड़े का मैनेजर बना दिया। मैंने विरोध किया। माधव ने मेरी तरफ़ देखा और कहा — 'तू अब पहलवान नहीं, तू अब सिर्फ़ एक बीमार आदमी है। अपना मुँह बंद रख।'"
दूसरे पन्ने पर — "आज कमला ने कहा कि वो मीरा को देखना चाहती है। मैंने मना किया। वो रोई। मुझे अपने आप से नफ़रत हुई।"
तीसरे पन्ने पर — "मुझे पता है कि मेरे पैर कैसे गए। भैरव ने मेरे पानी में कुछ डाला था। माधव जानता था। पर मैं कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि मीरा उनके हाथ में है। अगर मैं बोला, तो वो मीरा को नुकसान पहुँचा देंगे। इसलिए मैं चुप हूँ। इसलिए मैं मरा हुआ आदमी हूँ जो ज़िंदा है।"
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