Spirit of a Fighter – Chapter 658
मेरी आँखें भर आईं। मैंने डायरी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भी गीली थीं।
"तो ये था सच का आधा हिस्सा," मैंने कहा।
"नहीं," कमला ने कहा। "ये आधा हिस्सा है। बाकी आधा…" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बाकी आधा तू है, वीर सिंह।"
"मैं?"
"तेरे पापा शेर सिंह ने बीस साल पहले जो लिखा था, वो सिर्फ़ इतना था — 'अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।' तूने वो किया। तूने ज़हर पानी में नहीं, मिट्टी में डाला। तूने सच को मिट्टी से निकाला।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आवाज़ भारी थी। "अब कल अदालत में क्या होगा?"
कमला ने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया। "कल अदालत में जो होगा, वो तेरे पापा की डायरी से होगा। और मैं गवाही दूँगी। मैं बीस साल बाद अपना चेहरा दिखाऊँगी। और जब माधव सिंह मुझे देखेंगे, तो उन्हें पता चल जाएगा कि उनका सबसे बड़ा सच — कि उन्होंने मुझे मरवाया था — ज़िंदा है।"
टिंकू ने अचानक कहा, "तो ये थैली तुमने भेजी थी?"
कमला ने सिर हिलाया। "मैंने सुना कि अदालत में आज क्या हुआ। मुझे पता था कि राघव हार नहीं मानेगा। वो अपने बाप की तरह है — हारकर भी जीतने का रास्ता ढूँढता है। इसलिए मैंने तुझे बुलाया। मुझे डर था कि अगर मैं सीधे आई, तो कोई मुझे रास्ते में रोक देगा।"
"राघव," मैंने कहा। "वो माधव का बेटा है?"
कमला ने एक गहरी साँस ली। "राघव माधव का बेटा नहीं है," उसने कहा। "राघव भैरव का बेटा है।"
मेरा दिमाग़ रुक गया। मैंने मीरा की तरफ़ देखा — वो भी पत्थर की तरह खड़ी थी।
"भैरव का बेटा?" टिंकू ने कहा। "पर भैरव तो खुद माधव का बेटा है।"
"हाँ," कमला ने कहा। "और राघव भैरव का बेटा है। यानी माधव का पोता। तीन पीढ़ियाँ। बीस साल पहले भैरव की एक बीवी थी — सुनीता। वो मर गई, बच्चा पैदा करते वक़्त। बच्चा बच गया — वो राघव है। माधव ने राघव को अपना बेटा बनाकर पाला, ताकि कोई ये न पूछे कि भैरव का बेटा कहाँ से आया। और राघव आज तक नहीं जानता कि उसका असली बाप कौन है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरे भीतर एक ठंडी हवा चल रही थी। राघव — वो आदमी जो मुझे अदालत में हराने आया था, जो भैरव का वकील बनकर खड़ा था — वो भैरव का बेटा था। और वो खुद नहीं जानता था। ये कैसा खेल था जो माधव सिंह खेल रहा था?
"राघव को ये पता नहीं?" मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — दया।
"नहीं," कमला ने कहा। "और अगर माधव को लगा कि राघव को पता चल गया है, तो वो राघव को भी खत्म कर देगा। माधव के लिए बेटा-पोता सब बराबर हैं। सब मोहरे हैं।"
टिंकू ने अपनी टोपी उतार ली और उसे अपने हाथ में दबाया। "तो कल अदालत में क्या होगा?"
"कल," कमला ने कहा, "मैं अदालत में जाऊँगी। और जब मैं खड़ी होकर कहूँगी कि मैं कमला हूँ, रघुवीर की बीवी, तो माधव सिंह की सारी दीवारें गिर जाएँगी।"
मीरा ने धीरे से कहा, "पर वो तुझे मार डालेगा।"
कमला हँसी। "बेटा, मैं बीस साल से मरी हुई हूँ। मौत से डरने की उम्र नहीं रही।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर वो उसके पास गई और उसके पैरों पर गिर गई। उसने कमला के घुटनों पर अपना सिर रखा और रोने लगी — पहली बार पूरी तरह, बिना रुके, बिना छुपाए। कमला ने उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फेरीं। उसकी आँखें भी भर आईं थीं, पर वो रोई नहीं।
"मैंने हर रोज़ तेरे बाल बाँधने की सोची," कमला ने धीरे से कहा। "हर रोज़। पर हाथ नहीं बढ़ाए।"
मैं बाहर आ गया। मुझे हवा चाहिए थी। मैंने अपना मुँह ठंडी हवा में खोला। पुल के नीचे पानी की आवाज़ थी। मैंने अपने आप से कहा — वीर, कल अदालत में तुझे बोलना है। तुझे अपने पापा का सच बोलना है। तुझे कमला को खड़ा करना है। और तुझे राघव को ये बताना है कि उसका बाप कौन है — भले वो तेरा दुश्मन हो।
टिंकू बाहर आया और मेरे पास बैठ गया। उसने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद उसने अपना गुड़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने एक टुकड़ा लिया। वो भी खाने लगा। हम दोनों चुप बैठे रहे, और पुल के नीचे पानी बहता रहा।
"टिंकू," मैंने कहा, "कल के बाद अगर सब ठीक हो जाए, तो तू क्या करेगा?"
"मैं?" उसने कहा। "मैं अपनी दुकान के लिए नया बोर्ड बनवाऊँगा। और उस पर लिखवाऊँगा — 'टिंकू मिष्ठान भंडार, भारत केसरी के दोस्त का।'"
मैं हँस पड़ा। पहली बार उस रात मेरी हँसी अंदर तक गई।
"और तू?" उसने पूछा।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बादल छँट रहे थे। "मैं माँ से कहूँगा कि वो कल से चक्की न चलाए। और अगर वो न माने, तो मैं खुद चलाऊँगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ बारह साल की दोस्ती में दिखती है।
सुबह चार बजे हम लौटे। माँ जाग रही थीं। चूल्हे पर चाय थी। मैंने उन्हें सब बताया — कमला, डायरी, राघव, सब। माँ ने सब सुना, फिर उन्होंने चाय का प्याला मेरी तरफ़ बढ़ाया और कहा, "रघुवीर को बता। वो जानने का हक़ रखते हैं।"
मैं पापा के पास गया। उनकी आँखें खुली थीं। मैंने धीरे से सब कहा। जब मैंने कमला का नाम लिया, तो उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ी। फिर उन्होंने मेरी हथेली पर फिर तीन बार दबाया — वही तीन दबाव। इस बार मुझे समझ आया। तीन हैं — माँ, मीरा, गुड़िया। तीन औरतें जिन्हें वो बचाना चाहते थे। और उन्होंने मुझे ये ज़िम्मा सौंपा था।
अदालत सुबह दस बजे शुरू हुई।
भीड़ पहले से ज़्यादा थी। गाँव के लोग, अखाड़े के पहलवान, बच्चे, बूढ़े। सुक्खी बुआ पहली पंक्ति में बैठी थीं और अपने पान का बीड़ा चबा रही थीं। मैंने मीरा की तरफ़ देखा — वो मेरे बगल में बैठी थी, और उसका हाथ मेरे हाथ पर था। उसकी हथेली अब गर्म थी।
राघव अपनी फ़ाइलों के साथ बैठा था। उसने आज लाल रूमाल जेब में रखा था — माधव का रंग। मैंने उसकी तरफ़ देखा और सोचा — तू अपने बाप को नहीं जानता। तू उसी आदमी के लिए लड़ रहा है जिसने तेरे बाप को ज़हर बनाया।
जज आए। कार्यवाही शुरू हुई। राघव ने अपनी बात रखी — वही बातें, जो दो दिन से दोहरा रहा था। वीर असामान्य है, वीर झूठा है, वीर ने माँ के नाम पर काग़ज़ बनाए।
फिर जज ने कहा, "गवाह बुलाओ।"
मैं खड़ा हुआ। मेरी आवाज़ काँपी, पर मैंने उसे सीधा रखा। "महाराज," मैंने कहा, "मैं अपना गवाह नहीं बुलाऊँगा। मैं अपने पापा को बुलाऊँगा।"
दरवाज़ा खुला। पापा आए — लाठी के सहारे, माँ के सहारे। उनका चेहरा जला हुआ था, उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। पर उनके कदम बढ़ रहे थे। भीड़ में सन्नाटा छा गया। माधव सिंह पीछे बैठे थे — उनका चेहरा पहली बार बदला।
पापा गवाह के बॉक्स में खड़े हुए। जज ने पूछा, "तुम कौन हो?"
उन्होंने अपना मुँह खोला। आवाज़ आई — कर्कश, टूटी, जैसे कोई पुरानी घड़ी बज रही हो। "शेर सिंह। रणवीर अखाड़े का… पहलवान। और वीर का… बाप।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी — किसी औरत ने "हे राम" कहा। माधव सिंह की कुर्सी खिसकी।
जज ने पूछा, "तुम्हें क्या हुआ?"
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