Spirit of a Fighter – Chapter 656
मेरे पापा ने अपनी लाठी पकड़ी और धीरे से बोले, "जला हुआ आदमी… किसी को नहीं दिखता।" उन्होंने रुककर साँस ली। "मैं मरा नहीं था। पर मरा हुआ ही… अच्छा था।"
और फिर उन्होंने जो कहा, वो मेरे दिल में हमेशा के लिए बैठ गया।
"मैं ज़िंदा रहा… सिर्फ़ इसलिए… कि एक दिन अपने बेटे को… अपना चेहरा दिखा सकूँ। पर मेरा चेहरा… मेरे पास नहीं था। मेरा चेहरा… इस आदमी के पास था।"
उन्होंने अपनी टेढ़ी उँगली से उस नक़ली आदमी की तरफ़ इशारा किया। "मैं बीस साल… अपना चेहरा ढूँढता रहा। आज मिल गया।"
मैंने उनका हाथ फिर पकड़ लिया।
जज ने गहरी साँस ली और फिर बोले, "अदालत आज के लिए स्थगित। कल सुबह ग्यारह बजे फिर मिलेंगे। तब तक शेर सिंह, वीर सिंह और कमली देवी — तीनों की गवाही दर्ज की जाएगी।"
उन्होंने घंटी बजाई। अदालत उठ गई।
भीड़ धीरे-धीरे बाहर जाने लगी। पर कोई भी मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था — जैसे सब जानते थे कि आज कुछ ऐसा हुआ जो गाँव की मिट्टी में हमेशा के लिए दब जाएगा।
मैं अपने पापा का हाथ पकड़े खड़ा था। माँ मेरे पीछे आईं और उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनकी आँखें लाल थीं, पर उनका मुँह — पहली बार — मुस्कुरा रहा था।
"अब तू…" उन्होंने धीरे से कहा, "अब तू अपने पापा को घर ले चल।"
पर मैंने जब पलटकर देखा, तो मेरे पापा नहीं थे। वो मेरे पीछे कुछ और देख रहे थे। मैंने उनकी नज़र का पीछा किया।
दरवाज़े पर, भीड़ के पीछे, राघव खड़ा था। उसने अपनी फ़ाइलें सँभाली थीं और वो बाहर जाने लगा था। पर जाते-जाते उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
और उसकी आँखों में मैंने कुछ ऐसा देखा जो मुझे ठंडा कर गया।
वो डर नहीं था।
वो हार नहीं थी।
वो एक मुस्कान थी। बहुत छोटी, बहुत धीमी — पर वो वहाँ थी। जैसे किसी ने अपना एक पत्ता खोया हो, और उसके पीछे और भी पत्ते छुपे हों।
मैंने अपने पापा का हाथ कसकर पकड़ा।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "आप घर चलिए। माँ आपको ले जाएँगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — वो एक आँख, भरी हुई — और उन्होंने मेरा माथा चूम लिया। उनके होंठ सूखे, फटे हुए थे, पर वो चुंबन इतना गर्म था कि मेरी आँखें फिर भर आईं।
वो माँ के साथ धीरे-धीरे बाहर चले गए। लाठी की आवाज़ — टिक… टिक… टिक… — दूर होती गई।
मैं मीरा की तरफ़ पलटा।
"तूने देखा?" मैंने पूछा।
"देखा," उसने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसकी आँखें तेज़ थीं। "राघव को अंदर से कोई डरा नहीं रहा। वो किसी और चीज़ का इंतज़ार कर रहा है।"
"किस चीज़ का?"
मीरा ने अपना बैग उठाया। "कल सुबह जब कमली और पापा की गवाही होगी, तब पता चलेगा। पर एक बात पक्की है — आज रात कुछ होगा।"
हम बाहर निकले। धूप तेज़ थी और आँगन में मिट्टी की गंध उठ रही थी। भीड़ छँट रही थी, पर मैंने एक चीज़ देखी जिसने मेरे पैर रोक दिए।
अदालत के बाहर वाले नीम के पेड़ के नीचे एक चौकी पर एक छोटी सी थैली रखी थी। लाल कपड़े की। बँधी हुई।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा।
"मैंने इसे पहले नहीं देखा," उसने कहा।
मैंने थैली उठाई। उसकी गंध मेरी नाक में आई — सूखी हल्दी, काली मिर्च, और… जला हुआ काग़ज़। एक बहुत छोटी चीज़, जली हुई, जिसकी गंध अभी ताज़ी थी।
मैंने थैली खोली। उसमें एक पत्थर था — चिकना, काला, नदी का पत्थर। और उस पर एक शब्द खुदा हुआ था, बहुत छोटे अक्षरों में।
मैंने उसे पढ़ा और मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।
"कल… पूरा सच… नहीं खुलेगा।"
मीरा ने पत्थर मेरे हाथ से लिया और उसे पलटकर देखा। "पीछे कुछ है?"
मैंने पलटकर देखा। पीछे एक और लाइन थी, और उसे पढ़कर मेरी साँस रुक गई।
"क्योंकि सच का आधा हिस्सा… अभी ज़िंदा है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "अगर सच का आधा हिस्सा अभी ज़िंदा है… तो बाकी आधा क्या है?"
मीरा ने पत्थर मुझे वापस दिया। उसकी आँखें नीम के पेड़ के पीछे, दूर नहर की तरफ़ थीं।
"ये सवाल का जवाब," उसने कहा, "कल अदालत में नहीं मिलेगा। ये जवाब आज रात उस जगह मिलेगा जहाँ से ये थैली आई है।"
उसने मेरी कलाई पकड़ी।
"और वो जगह," उसने कहा, "वो हमारे गाँव में नहीं है।"
॥
उसकी बात सुनकर मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला जो शब्दों में नहीं था। मैंने थैली को जेब में दबाया और पूछा, "गाँव में नहीं है? तो कहाँ है?"
मीरा ने नहर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "ये पत्थर नदी का है। चिकना, काला — ऐसे पत्थर सिर्फ़ उस जगह मिलते हैं जहाँ पानी सालों तक बहता रहा हो। हमारी नहर में ऐसे पत्थर नहीं हैं।"
"तो?"
"तो ये किसी ऐसे आदमी ने भेजा है जो अभी भी उस जगह से जुड़ा है जहाँ से सब शुरू हुआ था।"
मैंने अपना सिर हिलाया, पर अंदर से मैं सुन रहा था सिर्फ़ उस आख़िरी लाइन को — "सच का आधा हिस्सा अभी ज़िंदा है।" मेरे पापा ज़िंदा हैं। भैरव ज़िंदा है। माधव सिंह अभी भी अपनी पूरी ताकत में है। तो फिर कौन-सा हिस्सा मरा है?
"मीरा," मैंने कहा, "आज रात हम नहीं जा सकते। कल अदालत है।"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा। "इसीलिए तो वो चाहता है कि हम आज रात जाएँ। ये जाल है।"
"या ये मौका है," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ पलटी। उसकी आँखों में वो तेज़ी आई जो तब आती है जब वो किसी चीज़ के दो पहलू देखती है। "वीर, आज रात अगर हम निकले और कुछ हो गया, तो कल अदालत में हमारा कोई नहीं होगा।"
"अगर हम नहीं निकले," मैंने कहा, "तो कल अदालत में हमारे पास जो आधा सच है, वो भी छोटा लगेगा।"
उसने मेरी बात सुनी और चुप हो गई। फिर उसने अपना बैग उठाया और कहा, "ठीक है। पर अकेले नहीं।"
घर लौटकर मैंने माँ को सब कुछ बताया। पापा आँगन की चारपाई पर लेटे थे, उनकी आँखें खुली थीं। माँ मेरी बात सुनकर चूल्हे के पास बैठी रहीं, और उनकी उँगलियाँ आटे में चली गईं, जैसे शब्द वहाँ छुपाना चाहती हों।
"जाओ," उन्होंने धीरे से कहा। "पर सुबह होने से पहले लौट आना।"
"माँ, तू रो क्यों रही है?"
"मैं नहीं रो रही," उन्होंने कहा, और उसी वक़्त उनकी उँगली से आटा गीला हो गया। "मैं तो बस सोच रही हूँ — कितनी रातें इस घर में ऐसी आई हैं जब कोई नहीं लौटा।"
मैंने उनके हाथ पकड़े। उनके हाथ सूखे थे, चक्की की गर्मी से तपे हुए, त्वचा पर वो बारीक आटा जमा था जो सालों से कभी पूरा नहीं गया।
"आज कोई नहीं जाएगा," मैंने कहा।
पापा ने चारपाई से अपना हाथ बढ़ाया। उनकी उँगलियाँ हवा में काँपीं। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने मेरी हथेली पर एक-एक करके तीन बार दबाया। तीन बार। पर मुझे समझ नहीं आया कि उनका इशारा क्या था। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं, और उनकी साँस धीमी हो गई।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में लालटेन। "भाई, मैं साथ चलूँगा।"
"तू नहीं।"
"मैं नहीं तो कौन?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो झिझक नहीं थी जो हमेशा रहती थी। "मैं तेरे साथ बारह साल से हूँ। तू जहाँ जाएगा, मैं वहाँ जाऊँगा। और अगर कुछ हो गया, तो कम से कम दो लोग होंगे जो उस रास्ते को याद रखेंगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी टोपी टेढ़ी थी और कान के पीछे पेंसिल अब भी थी। मैं हँस पड़ा। वो हँसा नहीं, गंभीर रहा।
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