Spirit of a Fighter – Chapter 652
“मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ।” वो रुकी। “पर एक दिन बनूँगी।”
मेरा हाथ काँपा। मैंने उसे छुपाने की कोशिश की, पर उसने महसूस कर लिया। और उसने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
आसमान से पहली बूँद गिरी। मेरे माथे पर। ठंडी।
और तभी नहर के पार से एक लालटेन की रोशनी आई। धीरे-धीरे बढ़ती हुई। और उसके साथ एक आवाज़।
“दोनों जाने कहाँ बैठे हो? अदालत कल है।”
वो आवाज़ शांति की थी।
॥
वो आवाज़ शांति की थी।
लालटेन उसके हाथ में थी और वो इतनी धीरे चल रही थी जैसे हर कदम पर कुछ सोच रही हो। उसने सिर पर एक मैला सा दुपट्टा लपेट रखा था, चेहरा आधा छुपा हुआ। जब वो पास आई तो मैंने देखा कि उसके होंठ सूखे हुए हैं और आँखों के नीचे काले घेरे हैं। वो मेरे सामने रुकी और एक पल चुप खड़ी रही, जैसे कोई पहाड़ ढोने के बाद साँस ले रहा हो।
"मैंने तुम्हारे पापा को बीस साल छुपाया," उसने कहा। "अब मैं तुम्हें कुछ बताने आई हूँ।"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ ठंडी थी।
"बैठिए," मैंने कहा और अपनी धोती का एक कोना नहर किनारे की सूखी ज़मीन पर बिछा दिया।
शांति बैठी। लालटेन उसने अपने आगे रख दी, और उसका पीला उजाला हम तीनों के बीच एक छोटा सा द्वीप बना गया।
"भैरव के पास अदालत में एक और गवाह है," वो बोली। "एक औरत। वो भैरव की चचेरी बहन है। तुम्हारी माँ की उम्र की है, पर आवाज़ बदलने में उस्ताद है। बचपन में वो गाँव के मेले में लोगों की आवाज़ निकालकर सबको हँसाती थी। किसी की माँ की, किसी की बहन की, किसी के बाप की।"
मेरी साँस रुक गई।
"वही तो," मैंने कहा। "तहखाने में। वो औरत जो माँ की आवाज़ में बोल रही थी।"
"वही।" शांति ने सिर हिलाया। "उसका नाम कमली है। भैरव उसे कल अदालत में खड़ा करेगा। वो कहेगी कि तुमने उसे धमकाया था, उसकी नक़ल की थी, उसका नाम खराब किया। और उसकी गवाही से ये साबित होगा कि तुम्हारी नाक… तुम्हारा सब कुछ… सिर्फ़ बीमारी है। बहकावा है। नक़ल है।"
मीरा ने धीरे से कहा, "तो वो यही कहेगा कि वीर पागल है।"
"सिर्फ़ पागल नहीं," शांति ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो बहुत दिनों की जमा हुई हो। "वो ये भी कहेगी कि वीर ने उसके घर आकर उसका आदमी मारा। हरनाम की मौत का इल्ज़ाम भी तुम पर डालेगा।"
अब मेरा हाथ काँपने लगा। मीरा ने महसूस किया, पर इस बार उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। उसने शांति की तरफ़ झुककर पूछा — और उसकी आवाज़ वही थी जो अदालत में होती है, सीधी, बिना डर।
"तुम हमें ये क्यों बता रही हो?"
शांति कुछ देर चुप रही। उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ दुबली थीं, नाखूनों में मिट्टी भरी थी।
"क्योंकि मैंने बीस साल तुम्हारे पापा को छुपाया," वो बोली। "और आज वो मेरे पास नहीं, अपनी माँ के पास लौट गए। मैंने सोचा था आदमी को छुपाना है — पर वो तो मरता हुआ आदमी भी अपने बेटे के आँगन में गिरना चाहता था। मैं अब कुछ नहीं छुपाऊँगी।"
उसकी आवाज़ टूटी, पर वो रोई नहीं। उसने अपनी कमर से एक छोटा सा काग़ज़ निकाला, मोड़ा हुआ, किनारों से मैला। मीरा की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये कमली के हाथ की लिखाई है। एक पुरानी रसीद है, मेले के टिकट की। उसने अपने नाम से लिखी थी। इसे अदालत में रख लेना। जब वो अपना बयान दे, उसकी लिखाई से मिलान कर लेना। कलम किसी की हो, लिखाई अपनी ही होती है।"
मीरा ने काग़ज़ खोला और लालटेन की रोशनी में गौर से देखा। उसकी आँखें तेज़ी से चलीं।
"ये तो…" मीरा ने धीरे से कहा, "ये तो उसी लिखाई जैसी है जो हरनाम की कॉपी में थी।"
शांति ने सिर हिलाया।
"वही तो। कमली ही हरनाम की कॉपी भरती थी। उसका हाथ है।"
मेरे पेट में एक ठंडी सी गेंद बन गई। जो औरत मेरी माँ की आवाज़ में बोली थी, वही हरनाम का हिसाब भी रखती थी। मतलब वो सिर्फ़ आवाज़ नहीं थी — वो पूरा जाल थी।
"एक बात और," शांति ने कहा। "मैंने बीस साल तुम्हारे पापा की सेवा की। उनका चेहरा जला हुआ था, उनकी ज़ुबान जल गई थी, वो बोल नहीं सकते थे। पर उनकी आँखें…" वो रुकी। उसने लालटेन की तरफ़ देखा जैसे उसमें कुछ खोज रही हो। "उनकी आँखें रोज़ सुबह उसी एक नाम से खुलती थीं। वीर। बस वीर। मैंने उन्हें खाना खिलाया, दवा पिलाई, उनका घाव साफ़ किया — पर उनका दिल मेरे पास नहीं था। वो तुम्हारे पास था। हर रोज़ नहर के उस पार देखते रहते थे, जिधर तुम्हारा गाँव है।"
मेरा गला भर आया। मैंने अपनी आँखें मसलीं और दूसरी तरफ़ देखा, पर मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर वो नरमी आ गई जो कभी-कभार आती है।
"बीस साल मैंने एक आदमी को ज़िंदा रखा," शांति ने धीरे से कहा, और अब उसकी आवाज़ दबी हुई थी, "पर उसका दिल उसके बेटे के पास था। आज मैंने उसका दिल लौटा दिया। अब मेरा काम खत्म।"
वो उठने लगी। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"आप बताइए, पापा अब कहाँ हैं? वो घर आए थे…"
"वो अपने हिसाब से चल रहे हैं," शांति ने कहा। "उन्हें मत ढूँढो। जिस दिन उन्हें लगेगा कि तुम तैयार हो, वो खुद सामने आएँगे। बस एक बात — उनका दिमाग़ अभी पूरा नहीं है। कभी वो बीस साल पुराने दिन में जीते हैं, कभी आज में। जब वो सामने आएँ, तो उनकी बात पर तुरंत भरोसा मत करना। पहले अपनी आँखों से देखना।"
मीरा ने काग़ज़ को अपने बैग में रखा और उसकी ज़िप ऐसे बंद की जैसे कोई कीमती चीज़ रख रही हो।
"शांति दीदी," मीरा ने कहा, और मुझे हैरानी हुई कि उसने उसे दीदी कहा, "एक बात सच बताइए। उस रात… जब भैरव ने पापा को जलाया था… आपने देखा था?"
शांति की आँखें एक पल के लिए बंद हो गईं।
"मैंने नहीं देखा। पर मैंने जली हुई खाल की गंध सुनी। किसी की चीख बंद हो गई थी, और मैंने सुना कि आग अभी भी जल रही है। फिर मैं भागी, और मुझे वो मिले — नहर किनारे, आधे जले हुए। मैंने उन्हें उठाया, अपनी साड़ी से लपेटा। मुझे नहीं पता था कि वो ज़िंदा हैं। जब मैंने पानी डाला तो उनकी आँख खुली।"
उसकी आवाज़ रुक गई।
"उस रात मैंने भगवान से एक ही दुआ माँगी थी — कि ये आदमी ज़िंदा रहे, और एक दिन अपने बेटे से मिले।"
मैंने अपनी आँखें नीची कर लीं। मेरी नाक में वही जली खाल की गंध आ रही थी — थोड़ी देर पहले जो कुएँ की तरफ़ से आई थी। मैंने अपना सिर उठाया और नहर के पार देखा। सिर्फ़ अंधेरा था।
शांति उठी। मैंने अपने आप को रोका नहीं। मैं झुक गया और उसके पैर छू लिए। उसने मना किया, हाथ बढ़ाया, पर मैंने उसका हाथ हटा दिया।
"आपने मेरे पापा को ज़िंदा रखा," मैंने कहा। "मैं आपका कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता।"
"तू मुझे कुछ नहीं देना," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार एक मुस्कान आई। "तू बस कल अदालत में जीत जाना। पापा ने कहा था — मेरा बेटा मेरी मिट्टी में लौटेगा। आज वो मिट्टी में लौट आया।"
उसने मेरे सिर पर हाथ रखा। उसका हाथ ठंडा था, पर वहाँ से एक गरमाहट मेरे पूरे शरीर में फैल गई।
वो लालटेन उठाकर चलने लगी। कुछ कदम गई और रुकी। पलटी।
"और वीर," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो शांति नहीं थी जो अभी थी। "अदालत में एक आदमी आएगा जो तेरे पापा के चेहरे से मिलता होगा। उसे देखकर तू रुक मत जाना।"
मैं सन्न रह गया।
"कौन?" मैंने पूछा। "कौन आएगा?"
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