Spirit of a Fighter – Chapter 651
"तुमने उन्हें जिंदा रखा।"
"जिंदा नहीं रखा," रघुवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं उन्हें मरने नहीं दिया। ये जिंदा रखना नहीं है। ये सिर्फ़… ये सिर्फ़ अपने गुनाह का बोझ ढोना है।"
वो अपने हाथों को देखता रहा।
"तुमने माधव को क्यों नहीं रोका?" मैंने पूछा।
"क्योंकि डर गया," उसने कहा। "मैं बीस साल से डरा हुआ हूँ। और इसीलिए आज भी भैरव का वकील बना हूँ। क्योंकि माधव ने मुझे बताया है कि अगर मैं नहीं माना, तो वो तेरी माँ को, तुझे, सबको खत्म कर देगा।"
"माधव जेल में है," मैंने कहा।
"माधव जेल में है," रघुवीर ने कहा, "पर उसके आदमी बाहर हैं। और उसका पैसा बाहर है। और अदालत में उसका वकील मैं हूँ।"
वो उठा और मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
"वीर," उसने कहा, "मैं तुझसे एक बात कहूँगा। और ये सच है। मैं तेरे पापा का दोस्त था। मैं तेरी माँ का भाई हूँ। मैंने जो किया, वो माफ़ी के लायक नहीं है। पर मैं एक बात के लिए बीस साल से जिंदा हूँ — कि किसी दिन कोई आएगा जो उस माचिस को मेरे हाथ से छीन लेगा।"
"तुम मुझे क्यों बता रहे हो?" मैंने पूछा।
"क्योंकि तू वो आदमी है," रघुवीर ने कहा। "और मैं आज रात तुझे कुछ देने आया हूँ।"
वो दीवार के पास गया, ईंट निकाली, और उसमें से एक छोटा डिब्बा निकाला। डिब्बा पुराना था, लकड़ी का, ऊपर घिसा हुआ।
उसने डिब्बा मेरे हाथ में रखा।
"ये तेरे पापा का है," उसने कहा। "इसे उन्होंने मुझे दिया था, उस रात से पहले। कहा था — 'अगर मैं मरूँ, तो ये मेरे बेटे को देना।'"
मैंने डिब्बा खोला।
अंदर एक शीशी थी — काली, छोटी, ऊपर मोम की मुहर। और एक काग़ज़, जिस पर मेरे पापा की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन थी।
"इसे पहन लेना, जिस दिन सच बोलने की हिम्मत हो।"
मैंने शीशी उठाई। उसका वज़न हल्का था। मैंने उसे सूंघा।
और मेरे शरीर में एक झटका लगा।
ये शीशी… इसकी गंध… ये वही गंध थी जो तहखाने में थी। ये वही गंध थी जो रघुवीर की दवाओं की थी। ये वही गंध थी जो पीली शीशी से आई थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
रघुवीर ने मेरी आँखों में देखा।
"ये," उसने कहा, "तेरे पापा की बनाई आख़िरी दवा है। उसने इसे अपने हाथ से बनाया था। और इसमें माधव के ज़हर का तोड़ है।"
मैंने शीशी को अपनी हथेली में दबाया। मेरी हथेली में वो ठंडी लगी।
"तुम्हारे पास ये बीस साल से थी," मैंने कहा, "और तुमने कभी इस्तेमाल नहीं की?"
"कैसे करता?" रघुवीर ने कहा। "माधव के पास इसे बनाने का तरीका नहीं था। और मुझे पता था कि अगर मैंने इसे बनाया और माधव को पता चला, तो वो इसे खुद ले लेगा। इसलिए मैंने इसे छुपाया। बीस साल।"
वो रुका। उसने अपनी आँखें साफ़ कीं।
"कल अदालत में," उसने कहा, "मैं खड़ा होकर ये बताऊँगा कि मैंने तेरे पापा को जलाया। मैं अदालत में अपना गुनाह कबूल करूँगा।"
मैं ठिठक गया।
"क्या?"
"मैं भैरव का वकील हूँ," रघुवीर ने कहा। "मैं तेरे खिलाफ़ खड़ा हूँ। पर जब अदालत मुझसे सच पूछेगी, तो मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मैं वो सब बताऊँगा जो मैंने आज तक छुपाया है।"
"तुम्हें जेल जाना पड़ेगा," मैंने कहा।
"बीस साल से मैं जेल में ही हूँ," रघुवीर ने कहा। "इस घर में। अपने गुनाह के साथ। अब असली जेल में जाऊँगा, तो कम से कम आज़ाद तो होऊँगा।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
मैं उठा। मेरे हाथ में डिब्बा था।
"मामा," मैंने कहा।
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।
"मीरा को छूना मत," मैंने कहा। "ये तुमने किसके लिए कहा था? माधव के लिए? या अपने लिए?"
रघुवीर कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा।
"मैंने उससे ये इसलिए कहा था क्योंकि वो बेटी जैसी है मेरी। मैं उसे माधव के हाथों में नहीं देख सकता था।"
"तो तुम माधव के साथ थे या उसके खिलाफ़?"
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। और इस बार उसकी आँखों में वो आग दिखी जो बीस साल से दबी थी।
"मैं बीस साल से माधव के साथ हूँ," उसने कहा, "क्योंकि मैं बीस साल से उसके खिलाफ़ हूँ।"
मैंने सिर हिलाया। मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"वीर," रघुवीर ने पीछे से कहा।
“वीर।”
मैं रुका, पर पलटा नहीं।
“जब अदालत में मैं सच बोलूँ, तो तेरे पापा की आँखें मुझमें होंगी। मैं उनसे नज़र नहीं मिला पाऊँगा। तू… तू उस वक़्त मेरी तरफ़ मत देखना। प्लीज।”
मैंने कुछ नहीं कहा। दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया।
बाहर हवा में नमी थी। आसमान पर बादल घिर रहे थे। मेरे हाथ में डिब्बा था और मेरे भीतर एक ही बात गूँज रही थी — भैरव ने मीरा को धमकाया है। उसने मेरे ज़रिए धमकाया है। मतलब वो जानता है कि मीरा कितनी ज़रूरी है। और जो आदमी जानता है, वो निशाना भी लगाता है।
मैं दौड़ा। गलियाँ, मोड़, वो पुरानी मस्जिद का कोना जहाँ कुत्ते सोते हैं — मुझे कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ मीरा का चेहरा।
उसका कमरा जगा हुआ था। दरवाज़ा खुला था। मैं भीतर घुसा तो वो काग़ज़ों के ढेर के बीच बैठी थी, चश्मा नाक पर, बाल एक तरफ़ बिखरे। मुझे देखकर वो मुस्कुराई।
“तुम्हें कब से नींद नहीं आई?”
मैंने जवाब नहीं दिया। डिब्बा उसके सामने रख दिया। फिर काग़ज़ — जो रघुवीर ने दिया था — उसकी तरफ़ सरका दिया।
वो पढ़ने लगी। उसकी उँगली लाइनों पर रुकी, फिर धीमी हुई। उसका चेहरा वो मुस्कान खो बैठा जो अभी थी।
“तो अब हमें सिर्फ़ अदालत नहीं,” उसने धीरे से कहा, “रास्ता भी सुरक्षित रखना है।”
“मैं तुम्हें घर भेज दूँगा,” मैंने कहा।
वो उठी। कुर्सी पीछे सरकी, खड़खड़ाई।
“मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूँ जो घर भेज दोगे। मैं तुम्हारी वकील हूँ।”
मैं चुप हो गया। कमरे में सिर्फ़ पंखे की धीमी आवाज़ रह गई।
“मैंने ऐसा नहीं कहा,” मैंने कहा।
“कहा।” उसकी आँखें मुझ पर जमी थीं। “तुमने वही कहा जो सब कहते हैं। कि लड़की को सुरक्षित रखना है, बस। जैसे मैं कोई सामान हूँ जो खिड़की से गिर सकता है।”
मेरे भीतर कुछ टूटा। मैंने सोचा — ये वही लड़की है जो अदालत में अकेले खड़ी होती है और जज भी उसकी आवाज़ सुनकर चुप हो जाते हैं। और मैं उसे घर भेजने की बात कर रहा था।
“माफ़ करना,” मैंने कहा।
दरवाज़े से एक आवाज़ आई।
“अरे भाई, पहले लड़ाई, फिर प्यार।”
टिंकू हाथ में थाली लिए खड़ा था, मुँह में एक लड्डू दबा हुआ।
“अभी मैं दोनों के लिए लड्डू लाया हूँ। ठंडे हो जाएँगे तो स्वाद नहीं रहेगा।”
मीरा की हँसी फूट पड़ी। मेरी भी। और उस हँसी में वो सारा तनाव घुल गया जो अभी कमरे में भरा था।
रात को हम नहर के किनारे बैठे थे। पानी काला दिख रहा था, ऊपर आसमान भी काला। मीरा ने घुटनों को बाँहों में भर लिया था।
“तुम्हारी नाक तुम्हारी ताकत है,” उसने कहा। “और मैं इसे सबके सामने साबित करूँगी। अदालत में। भैरव के सामने।”
मैंने पानी में कंकड़ फेंका। छपाक हुई और लहरें फैल गईं।
“मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का है,” मैंने कहा — और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजीब लगी, “कि कहीं मैं तुम्हें खो न दूँ।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। और फिर उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि नहर की आवाज़ भी उसे दबा दे।
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