Spirit of a Fighter – Chapter 642
हम अंदर गए। दालान के बीच में एक बड़ी मेज़ थी, उसके पीछे लकड़ी की ऊँची कुर्सी पर जज साहब बैठे थे — सफ़ेद बाल, मोटा चश्मा, हाथ में कलम। उनके दाएँ-बाएँ दो कुर्सियाँ और थीं।
और बाएँ कोने में, एक छोटी बेंच पर, माँ बैठी थीं। उनके हाथ जोड़े हुए थे और वो सीधी सामने देख रही थीं। उनके माथे का हल्दी का टीका अभी भी था। मेरी आँखें उनसे जा टकराईं, पर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
मेरे पेट में ठंडा पानी उँडेल दिया गया।
"जज साहब," एक आवाज़ आई, और मैंने पलटकर देखा।
वो राघव था। मेरी माँ का भाई। मेरा मामा।
आज वो अपनी पोशाक में नहीं था। आज उसके ऊपर काला कोट था, और हाथ में एक मोटी फ़ाइल। वो मुस्कुरा रहा था, और उस मुस्कान में वो सब कुछ था जो मैंने बीस साल से गाँव के कुत्तों की आँखों में देखा था।
"मेरे पास पहले एक निवेदन है," राघव ने कहा। "मैं अदालत से कहता हूँ कि जो लड़का आज अपनी नाक की बात करने आया है, वो पहले अपने खून की बात करे।"
जज ने चश्मे के ऊपर से देखा। "मतलब?"
"मतलब ये, जज साहब, कि ये लड़का मेरा भांजा है," राघव ने कहा, और उसकी मुस्कान बढ़ गई। "मेरी बहन का बेटा। और मेरी बहन — जो वहाँ बैठी है — उसने बीस साल पहले अपने ही ससुराल को लूटा था। ये लड़का उसी औरत का बेटा है जिसने अपने पति को ज़हर दिया।"
दालान में सन्नाटा छा गया। मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी गोद में रखे हाथों की उँगलियाँ काँप रही थीं।
मीरा मेरे बगल में खड़ी थी, और मैंने उसकी साँस को तेज़ होते सुना।
"जज साहब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मुझे भी अजीब लगी — शांत। "क्या मैं एक बात कह सकता हूँ?"
जज ने मेरी तरफ़ देखा। "कहो।"
"मेरे मामा जी ने अभी मेरी माँ पर इल्ज़ाम लगाया," मैंने कहा। "पर उन्होंने ये नहीं बताया कि मेरी माँ का भाई — यानी वो खुद — बीस साल पहले माधव सिंह के पैसे लेकर अदालत में झूठी गवाही दे चुका है। और आज वो भैरव का वकील बनकर खड़ा है। जिस भैरव ने खुद कल सबके सामने कबूल किया कि उसने बीस साल ज़हर घोला।"
राघव की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी, पर वो हिला नहीं।
"भांजे," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में मिठास घुल गई। "तेरी माँ ने तुझे बहुत कुछ बताया होगा। पर एक बात वो भूल गई — तेरी नाक।"
वो मेज़ की तरफ़ झुका। "जज साहब, ये लड़का दावा करता है कि उसकी नाक कुत्ते से तेज़ है। अब मैं पूछता हूँ — अगर ये सच है, तो ये कुदरत का करिश्मा है या कोई बीमारी? क्योंकि मेरे पास एक रिपोर्ट है — एक डॉक्टर की रिपोर्ट — जो कहती है कि ऐसी हालत में इंसान का दिमाग़ कमज़ोर हो जाता है। ये लड़का झूठ बोलता है, जज साहब, और वो इसलिए क्योंकि उसका दिमाग़ उसे सच और झूठ में फर्क नहीं करने देता।"
उसने फ़ाइल खोली और एक काग़ज़ जज की तरफ़ सरका दिया।
जज ने काग़ज़ पढ़ा। उनका चेहरा कुछ नहीं बोला।
"किस डॉक्टर की रिपोर्ट है?" जज ने पूछा।
"डॉक्टर सक्सेना," राघव ने कहा। "शहर के बड़े डॉक्टर। उन्होंने इस लड़के की जाँच की है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"डॉक्टर सक्सेना?" उसने धीरे से कहा। "वो भैरव का जीजा है।"
मेरे पेट में आग जली। मैंने आगे कदम बढ़ाया।
"जज साहब," मैंने कहा। "ये रिपोर्ट झूठी है। और मैं इसे झूठा साबित कर सकता हूँ।"
"कैसे?" जज ने पूछा।
"मेरे पास एक गवाह है," मैंने कहा। "एक डॉक्टर जो बीस साल से मेरे परिवार को जानता है।"
राघव हँसा। उसकी हँसी दालान की दीवारों से टकराई। "जज साहब, हर गवाह कोई भी हो सकता है। कोई भी आदमी आकर कह सकता है — ये लड़का ठीक है। पर सबूत? सबूत कहाँ है?"
जज ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारे पास काग़ज़ है?"
मेरे हाथ में माँ का ढक्कन था, और उसके अंदर रघुवीर की लिखाई वाला काग़ज़। पर राघव की बात सही थी — ये काग़ज़ मेरी नाक का सबूत नहीं था। ये सिर्फ़ ज़हर का सबूत था।
मैं चुप हो गया। मेरी जीभ सूख गई।
तभी दालान का दरवाज़ा खुला।
हवा का एक झोंका अंदर आया, और उसके साथ एक गंध — पुरानी किताबों की, स्याही की, और हल्की-सी औषधि की।
डॉक्टर भार्गव अंदर आए। उनके हाथ में एक पुरानी लाल किताब थी, जिसकी जिल्द फटी हुई थी और पन्ने पीले पड़ गए थे।
"जज साहब," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठहराव था जो सिर्फ़ उन लोगों में आता है जिन्होंने बहुत कुछ देखा है। "मैं डॉक्टर भार्गव हूँ। और मैं बीस साल से इस परिवार को जानता हूँ।"
राघव का चेहरा बदला। उसने कुछ कहना चाहा, पर जज ने हाथ उठाया।
"आने दीजिए," जज ने कहा।
डॉक्टर भार्गव मेज़ तक आए। पर वो जज के सामने नहीं रुके। वो मुड़े, और उन्होंने रणवीर सिंह की व्हीलचेयर की तरफ़ चले, जो दालान के दूसरे कोने में एक तरफ़ खड़े थे, और उनके पीछे मीरा की चाची खड़ी थी।
डॉक्टर भार्गव रणवीर सिंह के सामने झुके। उन्होंने उनका हाथ पकड़ा, और धीरे से कहा — इतने धीरे कि सिर्फ़ पास वाले सुन सकें:
"रणवीर, तेरे पैरों की रिपोर्ट मैंने आज तक नहीं लिखी। क्योंकि मुझे पता था — सच तू खुद लड़ेगा। और मैं उस काग़ज़ पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहता था जो किसी दिन तेरे ही हाथों में सबूत बने।"
रणवीर सिंह की आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ कहना चाहा, पर उनकी आवाज़ साथ नहीं दे रही थी। उन्होंने सिर्फ़ डॉक्टर का हाथ थाम लिया, और उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
मेरी आँखें भी भर आईं। मैंने अपना सिर नीचे किया।
डॉक्टर भार्गव उठे और जज की मेज़ की तरफ़ बढ़े। उन्होंने लाल किताब मेज़ पर रख दी।
"ये किताब मैंने लिखी है," उन्होंने कहा। "इसका नाम है — 'गंध का विज्ञान'। इसमें मैंने उन लोगों के बारे में लिखा है जिनकी सूंघने की शक्ति आम लोगों से तेज़ होती है। इस किताब के बारहवें पन्ने पर एक लड़के का नाम है — वीर सिंह। और उसके नीचे मेरी लिखाई है — 'यह लड़का बीमार नहीं है। यह कुदरत का तोहफ़ा है।'"
राघव ने आगे कदम बढ़ाया। "जज साहब, एक किताब किसी भी आदमी की लिखी हो सकती है। इसे सबूत कैसे माना जाए?"
"सही कहा," डॉक्टर भार्गव ने कहा। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटी सी पीतल की प्लेट निकाली, जिस पर कुछ लिखा था। "इस किताब का रजिस्ट्रेशन मेडिकल काउंसिल में है। और मेरे साथ ये प्लेट है — काउंसिल की मुहर वाली। जज साहब, आप चाहें तो खुद जाँच लीजिए।"
जज ने प्लेट उठाई, चश्मे के ऊपर से देखा, और फिर उन्होंने किताब के पन्ने पलटे।
दालान में सन्नाटा था। इतना सन्नाटा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
तभी मेरी नाक में कुछ आया।
उस गंध में स्याही ताज़ी थी। और तेज़।
मैंने धीरे से मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा। उसकी आँखें बोल रही थीं — "मुझे भी आ रही है।"
मैंने अपना सिर उठाया। "जज साहब," मैंने कहा।
जज ने ऊपर देखा।
"मेरी नाक काम कर रही है," मैंने कहा। "और मैं आपको बताता हूँ कि ये दालान में क्या-क्या है। बाईं तरफ़ की खिड़की के पास एक आदमी बैठा है, जिसकी जेब में मिठाई है — गुड़ की। बीच की कुर्सी पर बैठी औरत के हाथ में तुलसी की माला है। और आपके बाएँ हाथ की तरफ़, उस फ़ाइल के नीचे, एक काग़ज़ है जिस पर स्याही अभी भी गीली है — क्योंकि वो अभी-अभी लिखा गया है, यहाँ, इस दालान में।"
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