Spirit of a Fighter641 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 641

6 min read November 5, 2026

डॉक्टर भार्गव आँगन में आए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा, और उनका चेहरा नरम पड़ गया।

"रणवीर," उन्होंने कहा। "तू अभी भी उसी व्हीलचेयर पर है?"

"हाँ," रणवीर सिंह ने कहा। "पर मेरा दमाद खड़ा है। उसकी तरफ़ देख।"

डॉक्टर भार्गव मेरे पास आए। उन्होंने मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने मेरी नाक की तरफ़ देखा, और वो मुस्कुराए।

"तो ये वो लड़का है," उन्होंने कहा, "जिसकी नाक कुत्ते से तेज़ है?"

मैं झिझका। "आपको किसने बताया?"

"टिंकू ने," डॉक्टर ने कहा, और उन्होंने टिंकू की तरफ़ देखा। "और टिंकू ने ये भी बताया कि इस लड़के को इसी बात पर मारा गया है।"

उन्होंने अपना बैग खोला। उसमें से एक छोटी शीशी निकाली।

"मैं कल तहसील में तेरे साथ खड़ा होऊँगा," उन्होंने कहा। "और मैं कहूँगा — ये बीमारी नहीं है। ये एक तोहफा है। और मैं ये भी कहूँगा कि तेरे जैसे लोग शताब्दियों में एक बार पैदा होते हैं, और उन्हें पागल कहकर मार दिया जाता है।"

मेरी आँखें भर आईं।

"पर एक बात," डॉक्टर ने कहा, और उनकी आवाज़ गंभीर हो गई। "तेरी नाक तेरी ढाल है, पर तेरी तलवार नहीं। कल तहसील में तुझे अपनी नाक पर नहीं, अपने सच पर भरोसा करना होगा। क्योंकि वकील तेरी नाक को झूठ साबित करने की कोशिश करेगा।"

"मैं समझ गया," मैंने कहा।

डॉक्टर भार्गव ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "और सुन," उन्होंने कहा। "मैं आज रात यहीं रुकूँगा। सुबह हम सब साथ जाएँगे।"

माँ दौड़कर आईं। उन्होंने डॉक्टर के लिए पानी लाया, और चूल्हे पर उनके लिए रोटी बेली।

और मैं आँगन में खड़ा रह गया। मेरे पास काग़ज़ थे। गवाह थे। डॉक्टर था। माँ थी। पापा थे। मीरा थी। टिंकू था।

और कल सुबह तहसील थी।

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। आसमान में तारे थे। और मुझे लगा कि उनमें से एक तारा मेरे पापा की तरह टिमटिमा रहा है — बीस साल से बुझा हुआ, और आज फिर जल रहा है।

तभी मेरी नाक में कुछ आया।

धुआँ।

मैं चौंका। मैंने आँगन के बाहर देखा। दूर, अखाड़े की तरफ़ से धुएँ का एक काला स्तंभ उठ रहा था।

"आग!" मैंने चिल्लाया। "अखाड़े में आग लगी है!"

मीरा मेरे पास दौड़ी। टिंकू ने मिठाई की डिब्बी नीचे रखी।

"वो काग़ज़!" मीरा ने कहा। "वो सुरंग में बचे काग़ज़ जलाने की कोशिश कर रहा है!"

मैंने पीतल का ढक्कन अपने सीने से लगाया और दौड़ पड़ा। मेरे पीछे मीरा, टिंकू, और डॉक्टर भार्गव भी दौड़े।

अखाड़े की तरफ़ जाते हुए मुझे सिर्फ़ एक बात सूझ रही थी — जो काग़ज़ आज जल गए, वो कल तहसील में नहीं होंगे।

और जो कल नहीं होंगे, वो सच नहीं बनेंगे।

मैं दौड़ता रहा, और मेरे पैरों तले मिट्टी फिसल रही थी, और मेरी साँस रुक रही थी, पर मैं रुका नहीं।

क्योंकि अब रुकना मौत थी।

॥

मैं दौड़ता रहा, और मेरे पैरों तले मिट्टी फिसल रही थी, और मेरी साँस रुक रही थी, पर मैं रुका नहीं।

अखाड़े का फाटक खुला था। अंदर धुआँ भर रहा था, पर आग कहीं नहीं दिख रही थी। मैं रुका। मैंने नाक ऊपर की और गहरी साँस खींची।

धुआँ था, पर जलती लकड़ी की गंध नहीं थी। ये गंध थी — गीली घास जलाने की। जैसे कोई जानबूझकर धुआँ कर रहा हो, आग नहीं।

मेरे पीछे मीरा ने भी रुककर देखा। "काग़ज़?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "ये सिर्फ़ धुआँ है। कोई आग नहीं लगी।"

टिंकू हाँफता हुआ आया, हाथ में मिठाई की डिब्बी अभी भी पकड़े हुए। "तो फिर धुआँ क्यों?"

"धोखा," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा चढ़ आया। "कोई चाहता था कि हम यहाँ आएँ, ताकि असली जगह पर कोई और कुछ कर सके।"

मेरे पेट में झटका लगा। मैं पलटा। मेरी आँखें घर की तरफ़ भागीं, पर मेरे पैर नहीं हिल रहे थे।

"माँ," मैंने धीरे से कहा। "गुड़िया।"

हम भागे। डॉक्टर भार्गव पीछे रह गए थे, उनकी साँस फूल रही थी, पर वो भी रुके नहीं।

घर पहुँचे तो आँगन खाली था। चूल्हा बुझा था। माँ के हाथ की आधी बेली हुई रोटी अब भी चक्की के पास पड़ी थी, सूखकर कड़ी हो गई थी।

"माँ!" मैंने आवाज़ दी। कोई जवाब नहीं।

गुड़िया की कॉपी आँगन में खुली पड़ी थी। मैंने उसे उठाया। उसके पन्ने पर गुड़िया की लिखाई थी — "भैया जीतेंगे।" और उसके नीचे किसी और के हाथ से, कोयले से लिखा था — "अगर बच गए तो।"

मेरा हाथ काँपा। मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया और पढ़ा। उसका चेहरा कठोर हो गया।

"ये राघव का काम है," उसने कहा। "मामा जी का।"

"या माधव का," मैंने कहा। "पर फर्क क्या है।"

तभी नीम के पेड़ के पीछे से एक छोटी आवाज़ आई। "भैया?"

मैं दौड़ा। गुड़िया नीम के तने से चिपकी बैठी थी, घुटने सीने से लगाए, आँखें डबडबाई हुईं। उसके हाथ में मिट्टी की थैली थी, और उसकी उँगलियों में मिट्टी भरी थी — जैसे उसने मुट्ठी में मिट्टी पकड़ी हो और छोड़ी न हो।

मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। "क्या हुआ? माँ कहाँ है?"

"दो आदमी आए," वो फूट-फूटकर रोई। "माँ ने मुझे पेड़ के पीछे छुपा दिया। बोली — चुप रह, जैसे पत्थर हो जा। मैंने पत्थर की तरह चुप रही, भैया। मैंने एक शब्द नहीं कहा।"

मेरा दिल बैठ गया।

"उन्होंने माँ को कहाँ ले जाया?"

"वो बोले — तहसील में जज साहब तुझे बुला रहे हैं, बूढ़ी।" गुड़िया ने आँखें पोंछीं। "और माँ हँसी। बोली — जज साहब मुझे बुलाएँगे तो काग़ज़ भेजेंगे, तुम्हारे हाथ नहीं। फिर वो आदमी बोला — तो काग़ज़ ये है। और उसने माँ के मुँह पर काग़ज़ रख दिया।"

मैंने मुट्ठी भींची।

"और माँ ने उस काग़ज़ को पढ़ा," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "और माँ का चेहरा ऐसा हो गया, भैया, जैसे कोई भीतर से टूट गया हो। फिर माँ खुद चल पड़ी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।"

मैं खड़ा हो गया। मेरे पैरों में जान नहीं थी, फिर भी मैं खड़ा हो गया।

मीरा मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा था, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।

"वीर," उसने कहा। "ये जाल है। वो चाहते हैं तुम टूटो। वो चाहते हैं तुम बिना सोचे भागो।"

"तो मैं सोचूँ?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी।

"तुम मेरी बात सुनो," उसने कहा, और उसकी आँखें मेरी आँखों से जा टकराईं। "तहसील आज है। आज ही सुबह। और माँ को भी वहीं लाया गया है। इसका मतलब साफ़ है — वो चाहते हैं कि तुम आज ही टूट जाओ, अदालत में। अगर तुम गुस्से में भागोगे, तो तुम हार जाओगे। और अगर तुम हार गए, तो माँ को कोई नहीं बचा सकेगा।"

मैंने उसके हाथ को देखा। उसकी उँगलियों में औषधि की गंध थी, और उस गंध में कुछ ऐसा था जो मुझे रोक रहा था।

"ठीक है," मैंने कहा। "हम चलेंगे। पर पहले मुझे माँ का ढक्कन चाहिए।"

वो मुस्कुराई। "वो मेरे पास है। मैंने रास्ते में उठा लिया था।"

मैंने गुड़िया का हाथ पकड़ा। उसकी मुट्ठी में मिट्टी थी।

"इस मिट्टी का क्या करूँ, भैया?" उसने पूछा।

"इसे अपनी जेब में रख," मैंने कहा। "आज ये मेरी ताकत है।"

और हम चले।

तहसील का दालान पूरा भरा हुआ था। मैंने दरवाज़े पर खड़े होकर एक बार नाक ऊपर की और गहरी साँस ली। मुझे गाँव की मिट्टी की गंध आई, फिर पसीने की, फिर सुक्खी बुआ के पान के बीड़े की, और फिर — माँ की हल्दी की।

माँ यहाँ है। वो ज़िंदा है।

मेरे पैरों में ताकत लौट आई।

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