Spirit of a Fighter – Chapter 643
दालान में फुसफुसाहट उठी। जज ने अपने बाएँ हाथ के नीचे देखा। वहाँ सच में एक काग़ज़ था।
"किसने लिखा इसे?" जज ने पूछा।
राघव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "जज साहब, ये… ये मेरा नोट्स है…"
"नोट्स?" डॉक्टर भार्गव ने कहा। "और उस नोट्स पर स्याही इतनी ताज़ी क्यों है? क्योंकि मैं आया, और आपको लगा कि मैं आपका खेल बिगाड़ दूँगा। तो आपने अपना आख़िरी हथियार निकाला।"
उन्होंने मेज़ की तरफ़ देखा। "जज साहब, वो काग़ज़ माँगिए। और देखिए — उस पर क्या लिखा है।"
जज ने काग़ज़ उठाया। उन्होंने पढ़ा, और उनका चेहरा गंभीर हो गया।
"इस पर लिखा है," जज ने धीरे से कहा, "कि अगर ये लड़का जीता, तो केस खत्म। और अगर हारा, तो अखाड़ा और मिट्टी सरकार के हवाले।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और हम दोनों ने एक साथ साँस छोड़ी।
राघव ने मेज़ पर हाथ रखा। "हाँ, जज साहब। ये मेरा निवेदन है। और ये सही भी है। क्योंकि इस लड़के ने दावा किया है कि वो पहलवान बनेगा। तो साबित करे। अगर उसकी नाक सच में कुदरत का तोहफ़ा है, तो वो मुकाबले में जीते। और अगर हार गया, तो ये सब झूठ है — उसकी नाक, उसका सच, उसका सब कुछ।"
जज ने कलम उठाई। उन्होंने सोचा। कमरे में सब साँस रोके बैठे थे।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने इस बार मेरी तरफ़ देखा। और उनके होंठ हिले — बिना आवाज़ के। मैंने पढ़ा: "मत डर।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है," जज ने कहा। "मैं ये शर्त मंज़ूर करता हूँ। मुकाबला भारत केसरी का होगा। अगर वीर सिंह जीते, तो उस पर लगे सारे इल्ज़ाम हट जाएँगे और अखाड़ा उसका रहेगा। और अगर हारे, तो अखाड़ा और उसकी मिट्टी सरकार के हवाले।"
राघव मुस्कुराया।
पर जज ने अपना हाथ उठाया। "और एक बात। मैं ये भी देखता हूँ कि इस दालान में स्याही अभी-अभी गीली हुई है। यानी कोई कुछ छुपा रहा है। इसलिए मैं ये आदेश देता हूँ कि इस केस के सारे काग़ज़ आज से मेरी निगरानी में रहेंगे। कोई उन्हें छुएगा नहीं।"
राघव की मुस्कान फीकी पड़ गई।
और तभी माँ खड़ी हुईं।
वो धीरे-धीरे उठीं, उनके घुटने काँप रहे थे, पर वो उठीं। उन्होंने अपने हाथ जोड़े और जज की तरफ़ मुड़ीं।
"जज साहब," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, "मेरे बेटे को मुकाबला लड़ने दीजिए। पर एक बात पहले कह दूँ। जो लोग कहते हैं मेरे बेटे का दिमाग़ कमज़ोर है — उन्हें मेरी तरफ़ देखना चाहिए। मैंने बीस साल उस चक्की पर बिताए हैं, और मैंने अपने बेटे को कभी भूखा नहीं सोने दिया। अगर उसका दिमाग़ कमज़ोर है, तो मेरी रोटी में भी दम नहीं। और जिन्होंने मेरी रोटी खाई है, वो जानते हैं — मेरी रोटी में दम है।"
दालान में हँसी की एक लहर उठी। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा हिलाया और बोलीं — "अरे, सरस्वती की रोटी में तो मेरा भी दम है!"
जज मुस्कुराए। उन्होंने घंटी बजाई।
"अदालत आज के लिए स्थगित," उन्होंने कहा। "मुकाबले की तारीख़ बाद में तय होगी।"
बाहर निकलते वक़्त राघव मेरे पास से गुज़रा। उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"भांजे," उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि सिर्फ़ मैं सुनूँ। "तेरे पापा शेर सिंह ने भी ऐसे ही जीतने की सोची थी। और आज वो जला हुआ भूत है। तेरी नाक तुझे बचा नहीं सकेगी।"
वो जाने लगा।
मैंने उसे रोका। "मामा जी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ शांत थी। "आपने माँ को बीस साल पहले धोखा दिया था। आज आपने माँ को अदालत में खींचा। पर आज आप एक बात भूल गए।"
"क्या?"
"आज मेरी माँ ने खुद आपके सामने खड़े होकर कहा कि उसकी रोटी में दम है। और जिस औरत की रोटी में दम हो, उसके बेटे की नाक में भी दम होगा।"
राघव कुछ नहीं बोला। वो पलटा और चला गया, पर उसके कदम पहले से धीमे थे।
मैं माँ के पास गया। उन्होंने मेरा माथा चूमा।
"घर चल," उन्होंने कहा। "आज तूने अदालत में जो किया, वो मैंने सुना। पर एक बात याद रख — अदालत में जीतना आसान है। मिट्टी में जीतना मुश्किल है।"
मैंने सिर हिलाया।
बाहर आँगन में टिंकू मेरे पास आया। उसकी टोपी तिरछी हो गई थी, और उसके हाथ में अभी भी मिठाई की डिब्बी थी।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी। "आज मैंने गवाही देने की सोची थी। पर जब मैं अंदर गया, तो मेरे पैर काँप गए और मैं बाहर आ गया।"
मैंने उसका कंधा थामा। "कोई बात नहीं।"
"नहीं, बात है," उसने कहा, और उसकी आँखें भर आईं। "मैं तेरा दोस्त हूँ, और मैं अदालत में तेरे साथ खड़ा नहीं हो सका।"
"टिंकू," मैंने कहा। "तू जब मेरे लिए खीर लाता है, तो तू अपनी माँ से झूठ बोलता है। क्या वो झूठ छोटा है? नहीं। पर वो झूठ तू मेरे लिए बोलता है। और आज जब तूने डॉक्टर भार्गव को खीर खिलाकर लाया — तो तूने सबसे बड़ी गवाही दी। तेरे पैर नहीं काँपे थे, टिंकू। तेरे पैर तब काँपे जब तेरा दोस्त सच बोल रहा था और तू उसे सुन नहीं पा रहा था।"
टिंकू ने मिठाई की डिब्बी मेरे हाथ में दी।
"ये ले," उसने कहा। "आज तेरी जीत की मिठाई है।"
"आज मैंने क्या जीता?"
"तूने माँ को वापस जीता," टिंकू ने कहा। "और ये सबसे बड़ी जीत है।"
मैंने डिब्बी खोली। अंदर गुलाब जामुन थे। मैंने एक उठाया और मुँह में रखा।
"अरे," मैंने कहा। "इसमें नमक है!"
टिंकू का चेहरा उतर गया। "मैंने तो शक्कर डाली थी!"
"तो तूने शक्कर की जगह नमक डाल दी।"
"नहीं, मैंने…" वो रुका। "अरे यार।"
मैं हँसा। माँ हँसीं। गुड़िया हँसी। और डॉक्टर भार्गव भी हँसे।
और उस हँसी में वो सारी थकान बह गई जो दालान से लेकर आई थी।
पर उसी पल मेरी नाक में कुछ और आया।
मैं रुका। हँसी मेरे गले में अटक गई।
ये गंध मैंने पहले भी सुनी थी। कल रात। मैदान में। जब मैं माँ को बचाने के लिए भाग रहा था।
जले हुए बालों की गंध।
मैंने पलटकर देखा। तहसील के पीछे वाली गली से एक आदमी गुज़र रहा था। लंबा, चौड़ा, चेहरा ढका हुआ। वो जल्दी-जल्दी चल रहा था, और उसके कदमों में वो अजीब-सी लंगड़ाहट थी जो मैंने कहीं और देखी थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "वो कौन था?"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। "मुझे नहीं पता। पर वो जानता है हम यहाँ हैं।"
मैंने गुलाब जामुन का बाकी हिस्सा जेब में रखा और उस आदमी की तरफ़ कदम बढ़ाया।
पर तभी माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले नहीं सुना था — डर। "वो आदमी नहीं था।"
"माँ?"
"वो… वो जैसे मेरे पीछे-पीछे आ रहा था," उन्होंने धीरे से कहा। "जब मुझे दो आदमी तहसील लेकर आए, तो वो रास्ते में तीन बार दिखा। हर बार एक ही जगह — मेरे पीछे।"
मेरा खून ठंडा हो गया।
"माँ," मैंने कहा। "तुमने उसका चेहरा देखा?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो पानी था जो बीस साल से सूखा नहीं था।
"उसके चेहरे पर चोट के निशान थे," उन्होंने कहा। "जैसे बहुत पुराने। जैसे वो आग से बचा हो। और उसकी आँखें…" वो रुकीं। "उसकी आँखें तेरे पापा की आँखें थीं, बेटा।"
मेरे हाथ से मिठाई की डिब्बी छूट गई। वो ज़मीन पर गिरी और गुलाब जामुन रेत में लुढ़क गए।
मैंने पलटकर गली की तरफ़ देखा। वो आदमी गायब हो चुका था। पर उसके जाने की जगह पर, धूल पर, कुछ लिखा हुआ था — जैसे किसी ने उँगली से मिट्टी में लिखा हो।
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