Spirit of a Fighter – Chapter 635
उसने सबसे ऊपर का काग़ज़ निकाला। वो सफ़ेद था, साफ़ छपाई वाला, और उस पर एक गोल मुहर थी जिसमें कुछ लिखा था जो मैं दूर से नहीं पढ़ पाया।
"ये आज सुबह थाने पहुँचा है," मीरा ने कहा। "भैरव ने पुलिस की गाड़ी में बैठने से पहले एक आवेदन लिखवाया। अपने वकील के हाथों। और उस पर उसने दस्तख़त किए।"
"क्या लिखा है?" रणवीर सिंह की आवाज़ आई। उनकी व्हीलचेयर पास आ रही थी — कोई उन्हें धकेल रहा था, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ी चीज़ सुनी हो।
मीरा ने काग़ज़ पढ़ना शुरू किया। उसकी आवाज़ साफ़ थी, पर धीमी।
"महोदय, मैं भैरव सिंह, आज जो मैंने कबूला, वो सच है। पर एक बात मैं साफ़ करना चाहता हूँ। ये सारा षड्यंत्र मैंने अकेले नहीं रचा। और जो लड़का आज मेरे खिलाफ़ खड़ा हुआ — वीर सिंह — वो मानसिक रूप से ठीक नहीं है।"
मेरे अंदर कुछ रुक गया। जैसे किसी ने मेरी साँस की नली दबा दी हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पढ़ती रही।
"वो अपने आप को अखाड़े का मालिक समझता है। वो कहता है कि उसके दो पिता हैं। वो कहता है कि उसकी माँ ने उसे पीली शीशी दी जो असल में दवा थी। ये सब एक बीमार दिमाग़ की उपज है। मैं उस पर मेहरबान हूँ, इसलिए उसके खिलाफ़ कोई कार्रवाई न हो। पर उसे अखाड़े से दूर रखा जाए। और उसका इलाज हो।"
मीरा ने काग़ज़ बंद कर दिया।
मैदान में लोग खड़े थे, और किसी की आवाज़ नहीं आ रही थी। मुझे लगा मैं ज़मीन में धँस रहा हूँ। मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे कानों में एक ही बात घूम रही थी — "मानसिक रूप से ठीक नहीं।"
बीस साल का सच मैंने खोला था। माँ ने अपनी छाती पर ढक्कन पकड़कर रात काटी थी। टिंकू ने खीर लाकर पिता जी को खिलाई थी। और अब — अब ये।
"ये झूठ है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ फट रही थी। "भाई, ये सब झूठ है। तू बोल कुछ!"
"रुक।" माँ ने टिंकू का कंधा पकड़ा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पत्थर गिरा हो। "मीरा, आगे पढ़।"
मीरा ने सिर हिलाया। "और एक बात। ये लड़का जो खुद को शेर सिंह का बेटा बताता है, वो झूठ है। शेर सिंह का कोई बेटा नहीं था। ये मेरी पहली पत्नी का बेटा है, और वो मेरे साथ नहीं रहती थी। ये बात मैंने बीस साल छुपाई, क्योंकि मुझे इस लड़के से कोई लगाव नहीं था। और अब जब ये मेरे खिलाफ़ खड़ा है, तो मैं सच बोल रहा हूँ। मैं इसका बाप हूँ, पर इसका कोई हक़ अखाड़े पर नहीं।"
काग़ज़ रुक गया।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद था। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"माँ," मैंने कहा। "ये क्या है?"
वो मेरी तरफ़ नहीं देखीं। वो सीधी मीरा को देखती रहीं।
"और आख़िरी बात," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार काँपी। "वो पीली शीशी जिसका वीर सिंह बार-बार ज़िक्र करता है — वो असल में मेरी है। मैंने उसे अपने पिता के इलाज के लिए बनाया था। और वीर सिंह ने उसे मेरे कमरे से चुराया था, और फिर उसे मेरे पिता को ज़हर कहकर दिखाया।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरे पैर मिट्टी में धँसे हुए थे, और मेरी आँखों के सामने लाल धब्बे घूम रहे थे। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे सामने घुटनों पर बैठी थी, और उसके हाथ में वो काग़ज़ था। उसकी आँखें मुझसे मिलीं। और उन आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था।
"मीरा," मैंने कहा। "ये सच है?"
वो उठी। धीरे से। अपने घुटनों की धूल झाड़ी।
"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी। "ये सच नहीं है। ये भैरव की आख़िरी चाल है।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"उसने ये आवेदन लिखवाया," मीरा ने कहा, "ताकि अदालत में सबसे पहले ये पढ़ा जाए। और उसके बाद जो भी सबूत हम दें, अदालत कहेगी — 'ये लड़का मानसिक रूप से ठीक नहीं, इसकी बातों में मत आओ।'" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मैंने इसे थाने से उठाया नहीं। मैंने इसे थाने में जमा होते देखा, और मैंने इसकी कॉपी बनवाई। और मैंने इसे लेकर यहाँ आने का फ़ैसला किया, क्योंकि तुम्हें ये जानना हक़ है।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने काग़ज़ लिया। उस पर भैरव की लिखाई थी — मोटी, झुकी हुई, वो लिखाई जो मैंने रसीदों पर देखी थी।
"तो अब?" मैंने कहा। "अदालत में जो होगा —"
"अदालत में जो होगा," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी, "वो मैं देखूँगा।"
सबने उनकी तरफ़ देखा। वो अपनी व्हीलचेयर में सीधे बैठ गए थे, और उनके हाथ हत्थों पर सफ़ेद हो रहे थे।
"भैरव ने एक बात कही है," उन्होंने कहा, "जो सच है। ये लड़का उसका बेटा है।"
हवा रुक गई।
"पर बाकी सब झूठ है," उन्होंने कहा। "शेर सिंह का बेटा नहीं होना — झूठ। पीली शीशी चुराना — झूठ। और मानसिक बीमार — सबसे बड़ा झूठ।" उन्होंने अपनी मुट्ठी कुर्सी पर मारी। "भैरव ने ये इसलिए लिखवाया क्योंकि उसे पता है कि अदालत में सच्चाई उसके खिलाफ़ है। तो उसने पहले ही वीर को बदनाम कर दिया।"
माँ ने धीरे से कहा, "और उसने मेरे बारे में कुछ नहीं लिखा।"
हम सबने उनकी तरफ़ देखा।
"भैरव ने मेरे बारे में एक लफ़्ज़ नहीं लिखा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो ठंडा कर रहा था। "न पीली शीशी, न तहखाना, न माधव। सिर्फ़ वीर। क्यों? क्योंकि वो जानता है कि अगर उसने मेरा नाम लिया, तो मैं खड़ी हो जाऊँगी। और मेरे खड़े होते ही सारा गाँव खड़ा हो जाएगा।"
वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली गर्म थी और उसमें चक्की का आटा अब भी था।
"वीर," उन्होंने कहा। "तेरे पापा आज जहाँ भी हैं, उन्होंने देखा होगा। और मैंने भी देखा।"
मेरी आँखें भर आईं।
"तूने आज जो किया," वो बोलीं, "वो कोई लड़का नहीं कर सकता था। तूने अपने बाप के खिलाफ़ खड़े होकर सारे गाँव के बेटों को बचाया। अब अगर कोई कहे कि तू पागल है, तो उसकी आवाज़ तेरे पापा की आवाज़ से नहीं, मेरी आवाज़ से टकराएगी।"
मैं उनके गले लग गया। मैंने अपना चेहरा उनके कंधे में छुपा लिया, और मैं फिर रोया — पर इस बार धीरे से, क्योंकि भीड़ देख रही थी, और इस बार मुझे शर्म नहीं आ रही थी।
टिंकू ने मेरी पीठ पर हाथ रखा। "भाई, मैं भी रो रहा हूँ," उसने कहा, "पर मेरी डिब्बी में सिर्फ़ बर्फी है, रूमाल नहीं।"
मैं हँसा। हँसी और रोना एक साथ आ गए, और माँ ने मेरी पीठ थपथपाई।
मीरा दूर खड़ी थी। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके हाथ में काग़ज़ अब भी था। मैंने उससे आँखें मिलाईं। वो कुछ नहीं बोली, बस काग़ज़ को अपनी छाती से लगा लिया।
फिर रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई।
"सुनो सब," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ मैदान में फैल गई। "ये काग़ज़ अदालत में जाएगा। पर उससे पहले — मैं चाहता हूँ कि ये काग़ज़ गाँव की पंचायत के सामने पढ़ा जाए। आज शाम। उसी चबूतरे पर जहाँ बीस साल से झूठ बोला जा रहा था।"
भीड़ में सनसनी फैल गई। एक आदमी ने कहा, "पर साहब, भैरव तो जेल में है —"
"भैरव जेल में है," रणवीर सिंह ने कहा, "पर उसका काग़ज़ यहाँ है। और उसका काग़ज़ ही उसका मुँह है। आज शाम हम उसका मुँह खोलेंगे और गाँव को दिखाएँगे कि वो क्या बोलता है।"
मुंशीजी आगे आए। उनके हाथ में अब भी लाल मुहर वाला काग़ज़ था।
"मैं पढ़ूँगा," उन्होंने कहा। "मैंने बीस साल झूठ लिखा। अब सच पढ़ूँगा।"
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