Spirit of a Fighter – Chapter 634
मुंशीजी के हाथ में वो काग़ज़ था, और उस पर लगी लाल मुहर सूरज की रोशनी में ऐसे चमक रही थी जैसे किसी के घाव से ताज़ा खून टपका हो।
मैं सीढ़ियों पर ही रुक गया। मेरे पीछे टिंकू और मीरा थे। शेर सिंह भी थे — बाबा हरिदास का हाथ पकड़े, धीरे-धीरे साँस लेते हुए।
रणवीर सिंह ने व्हीलचेयर घुमाई। उनकी मूँछें काँप रही थीं, पर आवाज़ में वो पुरानी गरज लौट आई थी।
"किसने रोका?" उन्होंने पूछा। "कहाँ रोका?"
मुंशीजी ने काग़ज़ भींच लिया। उनके चश्मे के पीछे आँखें लाल थीं, जैसे रात भर सोए न हों।
"नहर के पुल के पास। दो आदमी थे। एक ने कहा — 'ये काग़ज़ लेकर आगे बढ़ा, तो तेरा भी वही हाल होगा जो हरनाम का हुआ।'"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। किसी औरत ने अपने बेटे का सिर अपनी छाती से लगा लिया। एक बूढ़े ने लाठी ज़मीन पर टिका दी और आँखें बंद कर लीं।
"फिर?" रणवीर सिंह ने कहा।
"फिर मैंने उन्हें ये दिखाया।" मुंशीजी ने काग़ज़ ऊपर उठाया। "और कहा — 'अगर मुझे कुछ हो गया, तो इसकी चार कॉपियाँ गाँव के चार कोनों में पहुँच जाएँगी। पंचायत, थाना, तहसील, और अख़बार।' वो दोनों एक-दूसरे को देखकर हट गए।"
"बहादुर आदमी हो तुम," रणवीर सिंह ने धीरे से कहा।
"मैं बहादुर नहीं हूँ, साहब।" मुंशीजी की आवाज़ टूटी। "मैं बीस साल से इन काग़ज़ों में ज़िंदा लोगों को मरा हुआ लिखता रहा हूँ। मैंने हर मौत पर 'कुदरती बीमारी' लिखा। मेरी लिखाई से ग्यारह माँ अपने बेटों का मुँह नहीं देख पाईं।" उन्होंने काग़ज़ रणवीर सिंह की तरफ़ बढ़ाया। "ये मेरा इकरारनामा है। मैंने सब लिख दिया — कौन-कौन था, कब क्या हुआ, किसने पैसा लिया।"
वो काग़ज़ रणवीर सिंह के हाथ में गया। और भीड़ आगे बढ़ी — धीरे-धीरे, जैसे कोई नदी किनारा तोड़ रही हो।
मैं सीढ़ी से उतरकर मैदान की मिट्टी पर आ गया। मेरे हाथ में माँ का पीतल का ढक्कन था, और उसकी ठंडक मेरी हथेली में उतर रही थी। मेरे घुटने भारी थे। मैं बैठ गया — सीधे मिट्टी पर, बिना कुछ सोचे।
चारों तरफ़ लोग थे। कोई रो रहा था, कोई मुंशीजी को छू रहा था जैसे उन्हें यक़ीन न हो। एक बूढ़ी औरत मेरे पास आई, झुकी, और मेरे सिर पर हाथ रखा।
"तेरे पापा शेर सिंह ने मेरे बेटे को अखाड़े में पहली बार उतारा था," उसने कहा। "मेरा बेटा लौटा नहीं। पर आज मुझे पता चला कि वो किसके हाथों गया।" उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी। "तू ज़िंदा है, बेटा। यही बहुत है।"
वो चली गई। और मैं वहीं बैठा रहा।
मेरे कानों में अभी भी वो आवाज़ गूंज रही थी — भैरव की आवाज़, जो उसने मिट्टी पर घुटने टेकते वक़्त निकाली थी। "मैं तेरा खून नहीं, तेरा बोया ज़हर हूँ।" उस आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसमें कुछ और था — जो मैं नाम नहीं दे पा रहा था।
फिर मुझे मेरी माँ की गंध आई।
वो मेरे पीछे आकर बैठीं। उनके घुटनों की हड्डी मेरी पीठ से टकराई। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे बालों में हाथ फेरा। उनकी उँगलियाँ चक्की के आटे से भरी थीं, और उनमें हल्दी की गंध थी।
"माँ," मैंने कहा। आवाज़ निकली नहीं। गला सूखा था।
"चुप रह," उन्होंने कहा। "बोलने की ज़रूरत नहीं।"
वो मेरे पास बैठी रहीं। मैदान में लोग धीरे-धीरे बिखर रहे थे। पुलिस की गाड़ी दूर खड़ी थी, उसकी लाल बत्ती अब बंद थी। भैरव और माधव सिंह दोनों जा चुके थे। मैदान में सिर्फ़ उनके जूतों के निशान बचे थे, और वो भी मिट्टी खुरचकर मिट रहे थे।
"आज तक तू जिनसे डरता था," माँ ने धीरे से कहा, "वो आज मिट्टी में बैठे हैं। उनके हाथ बँधे हैं, और तेरे खुले हैं। अब उठ।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके माथे पर हल्दी का टीका फीका पड़ गया था, और आँखों के नीचे काली लकीरें थीं। रात भर वो तहखाने में बंद रही थीं। उनके हाथ में अब भी उस पीतल के ढक्कन की गर्मी थी जो मैंने पकड़ा हुआ था।
"तूने ढक्कन क्यों पकड़ा था?" मैंने पूछा। "जब भैरव तेरे सामने खड़ा था?"
वो हँसीं। हल्की-सी हँसी, जैसे थकी हुई हँसी।
"क्योंकि मुझे पता था तू आएगा," उन्होंने कहा। "और मुझे ये भी पता था कि अगर मैंने उसे सिर पर मार दिया, तो तू आकर मुझे बचाएगा और वो भाग जाएगा। मैं उसे रोकना चाहती थी। बस रोकना।" उन्होंने मेरे हाथ से ढक्कन लिया और उसे अपनी गोद में रख लिया। "ये बीस साल से मेरे सीने से लगा रहा। आज इसका काम हो गया।"
मैंने सिर झुका लिया। और फिर वो हुआ जो मैंने सालों से नहीं किया था। मैं माँ की गोद में सिर रखकर रोया — बच्चे की तरह, बिना रोक, बिना शर्म। मेरी नाक बह रही थी, मेरा गला फट रहा था, और मेरे कंधे ऐसे हिल रहे थे जैसे किसी ने मुझे अंदर से पकड़कर झकझोर दिया हो।
माँ ने मुझे रोका नहीं। उन्होंने बस मेरा सिर सहलाया और धीरे से कहा, "रो ले। बीस साल का हिसाब है।"
मैंने सुना — उनकी आवाज़ में भी पानी था। पर वो रोई नहीं। वो बस मेरे बालों में हाथ फेरती रहीं।
कुछ देर बाद टिंकू की आवाज़ आई। वो दौड़ता हुआ आ रहा था, उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी। पर उसका चेहरा उतरा हुआ था — वो चेहरा नहीं था जो हर बार खीर लाते वक़्त होता था।
"भाई," उसने हाँफते हुए कहा। "तू जल्दी उठ।"
मैंने आँखें पोंछीं। "क्या हुआ?"
"अखाड़े के बाहर लोग खड़े हैं।" टिंकू ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई, फिर वापस खींच ली, जैसे उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे। "पंद्रह-बीस आदमी हैं। कह रहे हैं — 'इस लड़के ने अखाड़े का नाम खराब किया। हमारे बेटों की मौत का बदला इसी से लेंगे।'"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा। वो पुराना डर — जो बचपन में स्कूल के बच्चों ने "कुत्ता" कहकर चिढ़ाया था — वो मेरी छाती में लौट आया। मेरे हाथ ढीले पड़ गए।
"कौन हैं?" माँ ने पूछा। उनकी आवाज़ में अब वो नरमी नहीं थी।
"कुछ तो वो हैं जिनके बेटे मरे," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "पर कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने आज तक अखाड़े का नाम नहीं सुना था। वो भीड़ में शामिल हो गए। कोई उन्हें बुला रहा है, भाई। पीछे से।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो सीधी खड़ी हो गई थीं और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रही थीं — वो हरकत जो वो तब करती हैं जब कोई लड़ाई सामने हो।
"मैं चलती हूँ," उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहली बार लौटी थी। "मैं चलूँगा।"
तभी मीरा आई।
वो सामने से आ रही थी, और उसके कपड़ों पर धूल थी — कुर्ते की नीचे की तरफ़ मिट्टी के छींटे थे, और उसके बालों में भूसा चिपका था। उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था, और वो बंडल दबाया हुआ था, जैसे किसी की जान उसी में बंद हो।
वो सीधी मेरे सामने आई और मिट्टी पर घुटने टेककर बैठ गई। मेरे सामने। मेरे घुटनों के पास। भीड़ में कुछ लोगों ने देखा और उनकी साँस रुक गई।
"तुमने आज जो किया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो कोर्ट में बहस करते वक़्त होती है। उसमें कुछ और था — थकान, और उसके नीचे एक ज़िद। "उसके बाद तुम्हें किसी की बात सुनने की ज़रूरत नहीं। बाहर जो खड़े हैं, उनकी भी नहीं।"
"तो फिर?" मैंने कहा।
"पर एक बात सुननी पड़ेगी।" उसने काग़ज़ों का बंडल खोला। "क्योंकि ये बात तुम्हारे बारे में है।"
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