Spirit of a Fighter633 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 633

7 min read November 5, 2026

मुंशीजी ने आगे पढ़ा। लिखा था कि जब शेर सिंह बीमार पड़ गए, तो माधव सिंह ने उन्हें अखाड़े से बाहर कर दिया, और भैरव को — जो तब 'छोटा मोहन' था — उनके पास नौकर बना दिया। और यही नहीं, काग़ज़ में ये भी लिखा था कि जिस रात शेर सिंह का शरीर जला, उस रात माधव सिंह खुद वहाँ मौजूद थे। भैरव ने लिखा था — "मैंने उस रात आग नहीं लगाई। मैंने सिर्फ़ मिट्टी का तेल दिया। जिसने माचिस जलाई, वो मेरा बाप है।"

मुंशीजी ने काग़ज़ बंद कर दिया। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे। उन्होंने अपना रूमाल निकाला और माथा पोंछा।

भीड़ चुप थी। इतनी चुप कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो अब भी व्हीलचेयर पर बैठे थे, पर उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। वो मुंशीजी को देख रहे थे, और उनके होंठ हिले, पर पहले कोई आवाज़ नहीं निकली। फिर वो बोले, और उनकी आवाज़ पूरे मैदान में फैल गई।

"मुंशीजी," उन्होंने कहा, "आपके हाथ में जो काग़ज़ है, उस पर लाल मुहर लगी है। ये मुहर किसकी है?"

मुंशीजी ने काग़ज़ को पलटा। उन्होंने मुहर देखी। उनका चेहरा बदला।

"ये… ये लाल मुहर है," उन्होंने धीरे से कहा। "पंचायत के मुहर जैसी नहीं है। ये किसी और की है।"

"किसकी?"

मुंशीजी ने एक लंबी साँस ली। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। और जब उन्होंने जवाब दिया, तो उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बोझ उतार रहा हो।

"ये मुहर ठाकुर महेंद्र सिंह की है।"

मैदान में हवा का एक झोंका आया। मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं। मेरे बगल में मीरा खड़ी थी, और उसकी आँखें मुंशीजी पर जमी थीं।

"तो भैरव का इकरारनामा ठाकुर के ज़रिए आया है," मीरा ने कहा। "इसका मतलब ठाकुर अब भैरव के साथ है। और अगर ठाकुर भैरव के साथ है, तो ये काग़ज़ भी ठाकुर की चाल है।"

मुंशीजी ने काग़ज़ को अपनी छाती से लगा लिया। उनकी आँखें डर से भरी थीं।

"मैं… मैं सिर्फ़ काग़ज़ लाया हूँ," उन्होंने कहा। "मुझे नहीं पता इसके पीछे क्या है। मुझे सिर्फ़ ये पढ़ने को कहा गया था।"

"किसने कहा?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ पहली बार मैदान में गूँजी।

मुंशीजी ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला और एक छोटी पर्ची निकाली। पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई, पर उनका हाथ बीच में रुक गया, जैसे वो अभी भी सोच रहे हों।

"ये पर्ची आज सुबह मेरे तकिये के नीचे रखी थी," उन्होंने कहा। "और ऊपर लिखा था — 'काग़ज़ मैदान में पढ़ो, वरना तेरा हिसाब बंद।'"

मैंने पर्ची ली। उस पर कोई नाम नहीं था। बस एक लाइन थी, और नीचे एक मुहर — वही लाल मुहर।

मैंने पर्ची मीरा को दी।

मीरा ने पर्ची पढ़ी और मुझे लौटा दी। उसकी आँखें वैसी ही थीं जैसे उस सुबह थीं जब उसने पहली बार शीशी खोली थी — शांत, पर अंदर से कुछ गिन रही थीं।

"ये पर्ची मुंशीजी के तकिये के नीचे रखने का मतलब साफ़ है," उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुन सकूँ। "जो भी है, वो मुंशीजी के घर तक पहुँच सकता है। उनके सोते हुए सिर के नीचे हाथ डाल सकता है। ये बात सिर्फ़ ठाकुर ही कर सकता है।"

मैंने पर्ची को मुंशीजी के हाथ में वापस रखा और उनकी तरफ़ देखा। बूढ़े आदमी की कलाई पतली थी, चमड़ी ढीली, और उनकी उँगलियाँ पर्ची को ऐसे पकड़े हुए थीं जैसे कोई डूबता हुआ रस्सी पकड़े।

"मुंशीजी, आप घर जाइए," मैंने कहा। "आज रात कहीं और रुकिए। किसी ऐसे की छत के नीचे जिसे ठाकुर नहीं जानता।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और तुम लोग?"

"हमें तहखाने जाना है," मीरा ने कहा। "बाबा हरिदास से। इलाज सिर्फ़ वही जानता है।"

मुंशीजी ने कुछ कहना चाहा, पर फिर चुप हो गए। उन्होंने अपना रूमाल जेब में ठूँसा और भीड़ को चीरते हुए चले गए। मैंने उनकी पीठ देखी — झुकी हुई, हिम्मत से ज़्यादा बोझ लिए हुए।

हम तहखाने की तरफ़ बढ़े। रास्ते में टिंकू मेरे साथ-साथ चल रहा था, और उसकी जेब से कुछ खड़खड़ा रहा था। अचानक वो रुका, अपनी जेब में हाथ डाला, और एक छोटा-सा काग़ज़ का डिब्बा निकाला।

"शेर सिंह जी," वो बोला, और अपनी आवाज़ को जितना हो सके मोटा बनाया।

शेर सिंह ने पलटकर देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, और उनके हाथ अब भी काँप रहे थे — वो काँपना बंद नहीं हुआ था जब से भैरव का काग़ज़ पढ़ा गया।

टिंकू ने डिब्बा खोला। उसमें खीर वाली बर्फी थी, चाँदी के वरक़ से ढकी हुई।

"ये खीर वाली बर्फी है," टिंकू ने कहा, बड़ी गंभीरता से। "भाई को रोज़ खिलाता हूँ। आज आपको खिला रहा हूँ।"

शेर सिंह ने देखा, पहले बर्फी को, फिर टिंकू के चेहरे को। उनके होंठ हिले, पर बोल नहीं पाए। फिर उन्होंने धीरे से एक टुकड़ा उठाया और मुँह में रखा।

और तभी मैंने वो देखा जो मैंने कभी नहीं देखा था। उस आदमी की आँखों से पानी निकला — एक बूँद, बस एक — और वो उसी तरह चुपचाप बह गई जैसे किसी पुराने पत्थर पर बारिश की बूँद। उन्होंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा, और उनका हाथ अब भी काँप रहा था, पर अब शायद किसी और वजह से।

"मीठी है," उन्होंने कहा, आवाज़ भर्राई हुई। "बहुत मीठी।"

टिंकू मुस्कुराया। ऐसी मुस्कान जो बच्चों के चेहरे पर आती है जब उन्हें पता चलता है कि उनकी छोटी-सी चीज़ किसी बड़े काम आ गई।

तहखाने का दरवाज़ा खुला। अंदर तेल के दीयों की पीली रोशनी थी और हवा में गीली मिट्टी और सूखी जड़ी-बूटियों की गंध। बाबा हरिदास एक तिपाई के पास बैठे थे, और जैसे ही उन्होंने शेर सिंह को देखा, उनके हाथ से एक कटोरी छूट गई। कटोरी ज़मीन पर गिरी और चटक गई।

वो उठे, उनकी टाँगें लड़खड़ाईं। उन्होंने शेर सिंह का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा और उनकी आँखों में झाँका, फिर उनकी बाँहें, फिर उनकी नसें। उनके हाथ रुके नहीं, वो बस चलते रहे, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा हो।

"यह कब से है?" हरिदास की आवाज़ फूटी हुई थी।

"बीस साल," शेर सिंह ने कहा।

हरिदास ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले, जैसे कोई गिनती कर रहे हों। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा।

"इसे ठीक होने में महीने लगेंगे," उन्होंने कहा। "और दवा के लिए मुझे एक चीज़ चाहिए। इस तहखाने की सबसे नीचे की मिट्टी। वो काली परत, जो पुराने कुएँ के नीचे है। उस मिट्टी में जो है, वो कहीं और नहीं मिलेगा। और उसे निकालने का तरीका सिर्फ़ एक आदमी जानता है।"

"भैरव," मैंने कहा। "पर वो जेल में है।"

हरिदास ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे ठंडा कर गया।

"भैरव ही नहीं," उन्होंने कहा। "एक और आदमी जानता है। और वो है — रघुवीर।"

नाम सुनते ही शेर सिंह की साँस रुक गई। मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर सफ़ेद हो गईं।

तभी बाहर से ज़ोर की आवाज़ आई। किसी ने कुछ ऐसा कहा जो दीवारों से टकराकर तहखाने तक आया — कुछ गिरने की आवाज़, फिर भीड़ का शोर।

हम सब सीढ़ियों की तरफ़ भागे। मैं पहले निकला, और जो देखा, उस पर मेरे पैर जम गए।

मैदान में रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर बैठे थे। उनके पीछे भीड़ खड़ी थी, और उनके सामने — बीच में — मुंशीजी खड़े थे। वो लौट आए थे। और उनके हाथ में एक काग़ज़ था, जिस पर लाल मुहर चमक रही थी।

रणवीर सिंह ने अपनी गर्दन घुमाई और मुंशीजी को देखा।

"आप लौट आए," उन्होंने कहा।

"मुझे रास्ते में रोका गया," मुंशीजी ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार साफ़ थी, बिना काँपे।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho