Spirit of a Fighter – Chapter 632
"आ गया," मुंशीजी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो घुमाव था जो हमेशा होता था जब वो अखाड़े का हिसाब बोलते थे। "अच्छा हुआ। सब सुन लेंगे।"
"क्या सुनेंगे?" मैंने कहा।
मुंशीजी ने अपना चश्मा ठीक किया। उनके हाथ में काग़ज़ था, और उनकी उँगलियाँ उस पर काँप रही थीं — शायद उम्र से, शायद डर से।
"ये काग़ज़," उन्होंने कहा, "आज सुबह जेल से आया है। भैरव सिंह ने खुद लिखवाया है। इकरारनामा है।"
भीड़ में सरसराहट हुई। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा मुँह से निकालकर हाथ में लिया, जैसे अब उसकी ज़रूरत नहीं।
"भैरव ने पहले वो सब कबूल किया जो उसने पंचायत के सामने कहा था," मुंशीजी बोले। "ज़हर, बोतलें, पैसा — सब। पर उसने एक और बात लिखी है।" उन्होंने काग़ज़ को थोड़ा ऊपर उठाया, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "उसने लिखा है कि ज़हर बनाने वाला वो नहीं है। वो सिर्फ़ बेचने वाला था। ज़हर बनाने वाला कोई और है।"
मेरी छाती में धक्का लगा। मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर था।
"कौन?" भीड़ से किसी ने पूछा। "कौन बनाता है?"
मुंशीजी ने काग़ज़ पर नज़र डाली। उनके होंठ हिले, फिर रुके। उन्होंने एक बार रणवीर सिंह की तरफ़ देखा — जैसे इजाज़त माँग रहे हों। रणवीर सिंह ने कोई इशारा नहीं किया। उनकी आँखें सामने थीं, दूर कहीं।
"भैरव ने लिखा है," मुंशीजी ने धीरे से कहा, "कि असली ज़हर बनाने वाला वीर सिंह के पिता हैं। शेर सिंह। और उसने ये भी लिखा है कि शेर सिंह मरे नहीं हैं। वो ज़िंदा हैं।"
भीड़ फट पड़ी।
एक आवाज़ उठी — किसी औरत की, जिसका बेटा अखाड़े से लौटा ही नहीं था। फिर दूसरी। फिर तीसरी। "जला दो उसे!" किसी ने चिल्लाया। "ज़हर बनाने वाले का बेटा हमारे बीच क्या कर रहा है!" किसी ने मेरी तरफ़ उँगली उठाई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैर ज़मीन पर जमे थे और मेरी रीढ़ में एक ठंडी लकीर सी चली गई थी। मैंने महसूस किया कि सबकी नज़रें मुझ पर हैं, और उनमें वो सवाल है जो हर कोई पूछ रहा है — क्या वो जानता था?
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो अब भी व्हीलचेयर पर बैठे थे, पर उनकी मुट्ठियाँ खुल गई थीं और उनके होंठ काँप रहे थे। मैंने उन्हें कभी काँपते नहीं देखा था। मुझे लगा कि अब मुझे कुछ बोलना चाहिए, पर मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई — मीरा की, साफ़ और ऊँची।
"रुको!"
वो मेरे बगल में आकर खड़ी हो गई। उसके हाथ में फटी कॉपी थी, वो ही जिसे उसने तहखाने में मेरी माँ को दिखाया था, और उसकी आँखों में वो आग थी जो मैंने पहली बार अखाड़े के फाटक पर देखी थी।
"मुंशीजी," उसने कहा, "आपने काग़ज़ पूरा पढ़ा या बीच में रुक गए?"
मुंशीजी एक कदम पीछे हटे। "मैं… पूरा पढ़ा है, बेटी।"
"तो आगे पढ़िए," मीरा ने कहा। "क्योंकि भैरव ने ये भी लिखा होगा कि ज़हर बनाने वाला अगर शेर सिंह है, तो उसने वो ज़हर किसके कहने पर बनाया। और उस ज़हर की पहली बोतल किसने मँगवाई। और उसके बदले में शेर सिंह को क्या मिला — अखाड़ा, ज़मीन, या सिर्फ़ ज़िंदगी भर का डर?"
मुंशीजी के हाथ काँपे। उन्होंने काग़ज़ को ऊपर उठाया, पर उनकी आँखें पन्ने पर नहीं थीं — वो रणवीर सिंह की तरफ़ थीं।
"बोलिए," मीरा ने कहा। "क्योंकि अगर भैरव ने ये नहीं लिखा, तो ये काग़ज़ अधूरा है। और अधूरा काग़ज़ अदालत में कुछ नहीं होता।"
मुंशीजी ने काग़ज़ को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा खिलौना छुपा रहा हो।
"ये… ये सिर्फ़ इकरारनामा है," उन्होंने कहा। "इसमें वो सब नहीं है जो तुम कह रही हो। भैरव ने सिर्फ़ ये लिखा है कि ज़हर शेर सिंह ने बनाया। यही सब।"
"और शेर सिंह ज़िंदा हैं," मीरा ने कहा। "ये भी लिखा है न?"
"हाँ। पर—"
"तो फिर ये काग़ज़ झूठ बोल रहा है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, सिर्फ़ साफ़ हिसाब। "क्योंकि शेर सिंह ज़िंदा हैं, और वो मेरे सामने खड़े हैं। और वो ज़हर बनाने वाले नहीं हैं। वो ज़हर का सबसे बड़ा शिकार हैं। उनका पूरा शरीर जल चुका है, उनकी ज़ुबान जल चुकी है, और उन्हें बीस साल तक एक अंधेरे कमरे में बंद रखा गया। ये किसी ज़हर बनाने वाले का हाल नहीं होता। ये किसी को ज़हर देकर मारने वाले का सबूत होता है।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। सुक्खी बुआ ने अपना पान वापस मुँह में रखा और ज़ोर से चबाया, जैसे सोच रही हों कि अब क्या बोलें।
मुंशीजी ने अपना चश्मा उतारा और आँखें मलीं। जब उन्होंने दोबारा चश्मा पहना, तो उनके चेहरे पर कुछ बदल गया था — जैसे कोई आदमी बहुत देर तक झूठ बोलकर थक गया हो।
"बेटी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब धीमी थी, "मैं सिर्फ़ हिसाब रखता हूँ। काग़ज़ जो आता है, मैं वो पढ़ता हूँ। मैं ये नहीं पूछता कि काग़ज़ के पीछे कौन है।"
"तो अब पूछिए," मीरा ने कहा। "क्योंकि आज आपके हाथ में जो काग़ज़ है, उसके पीछे कोई एक आदमी नहीं, बीस साल का खून है। और अगर आपने ये काग़ज़ ऐसे ही पढ़कर सुना दिया, तो कल आप भी उसी खून के हिस्सेदार होंगे।"
मुंशीजी ने काग़ज़ को नीचे किया। उनकी आँखें रणवीर सिंह पर टिकी थीं, और उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
तभी रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया।
वो हाथ हवा में रुका — काँपता हुआ, बूढ़ा, पर उठा हुआ। भीड़ का शोर एक झटके में रुक गया।
"मुंशीजी," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो अब भी बची थी, जो साठ साल की उम्र और सून्न पैरों में भी ज़िंदा थी। "ये काग़ज़ मेरे सामने पढ़ो। पूरा। और अगर इसमें एक भी लाइन ऐसी है जो शेर सिंह को ज़हर बनाने वाला कहती है, तो मैं खुद, अपने हाथ से, इस अखाड़े की मिट्टी में उनका नाम लिख दूँगा।"
उन्होंने रुककर साँस ली। उनकी छाती ऊपर-नीचे हुई, धीरे, भारी।
"पर अगर एक भी लाइन ऐसी है जो मुझे ज़हर देने वाले का नाम लेती है," उन्होंने कहा, "तो मैं उस नाम को इस पूरे गाँव के सामने बोलूँगा — चाहे वो नाम मेरा अपना हो, या मेरे खून का।"
मैदान में हवा भी रुक गई। मैंने मुंशीजी की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था, और उनकी उँगलियों में काग़ज़ इतनी ज़ोर से दबा था कि उस पर सिलवटें पड़ गई थीं।
"पढ़ो," रणवीर सिंह ने कहा।
मुंशीजी ने काग़ज़ खोला। उन्होंने एक बार गला साफ़ किया, और फिर पढ़ना शुरू किया — धीरे, हकलाते हुए, जैसे हर शब्द उनके मुँह से निकलने से पहले उनका हाथ पकड़ रहा हो।
काग़ज़ पर भैरव की लिखाई थी — मोटी, टेढ़ी-मेढ़ी, जैसे किसी ने गुस्से में लिखी हो। और जैसे-जैसे मुंशीजी पढ़ते गए, मेरी छाती की गाँठ कसती गई।
काग़ज़ में लिखा था कि बीस साल पहले, जब शेर सिंह अखाड़े के मालिक थे, तब माधव सिंह ने उनके पास एक आदमी भेजा — रघुवीर। और रघुवीर ने शेर सिंह को एक दवा दी, ये कहकर कि ये पहलवानों की ताकत बढ़ाएगी। शेर सिंह ने उसे पहले खुद पिया — क्योंकि वो अपने पहलवानों को कभी वो चीज़ नहीं देते थे जो उन्होंने खुद न पी हो। और वो पहला घूँट उनके लिए ज़हर बन गया।
मुंशीजी रुके। उन्होंने काग़ज़ से आँखें उठाईं और रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। रणवीर सिंह का चेहरा नहीं बदला। वो बस बैठे रहे, अपनी व्हीलचेयर पर, और उनकी आँखों में कुछ जम रहा था, जैसे बीस साल की बर्फ पिघल रही हो।
"आगे," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी नहीं।
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