Spirit of a Fighter – Chapter 631
"ये खीर वाली बर्फी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी शरारत नहीं थी, कुछ नरम था, कुछ डरा हुआ पर साफ़। "भाई को रोज़ खिलाता हूँ। आज आपको खिला रहा हूँ।"
शेर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उनके जले हुए होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई। उन्होंने हाथ बढ़ाया और वो बर्फी ली। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर उन्होंने उसे मुँह में रखा और धीरे-धीरे चबाया। उनकी आँखों से आँसू नहीं आए — बीस साल में शायद उनकी आँखों का पानी भी सूख गया था — पर उनके गले में एक आवाज़ बनी, एक टूटी हुई खरखराहट, और उन्होंने टिंकू का हाथ पकड़ लिया। उन्होंने उसकी हथेली को अपनी हथेली में लिया, और उसे अपने माथे पर रखा।
टिंकू का चेहरा टूट गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर सिर्फ़ "काका—" निकला, और फिर वो चुप हो गया, अपनी जेब से दूसरी बर्फी निकाली और उनके हाथ में रख दी।
मैंने अपनी नज़र हटा ली। मेरे गले में कुछ फँसा हुआ था जो बाहर नहीं आ रहा था।
तहखाने में हरिदास बाबा अपनी जगह पर बैठे थे। उनके सामने मिट्टी का दीया जल रहा था। जैसे ही हम अंदर आए, उन्होंने सिर उठाया, और उनकी आँखें पहले मुझ पर पड़ीं, फिर मेरे बगल में खड़े आदमी पर।
उनका शरीर झटके से हिला। वो उठने की कोशिश में अपना हाथ ज़मीन पर टेकने लगे, पर हाथ फिसल गया और वो वापस बैठ गए।
"शेर सिंह," उन्होंने फुसफुसाया। "तू… तू ज़िंदा है।"
शेर सिंह ने सिर हिलाया। एक बार। बस एक बार।
हरिदास बाबा काँप रहे थे। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और शेर सिंह के चेहरे को छुआ — उनके गाल पर, उनके जले हुए होंठों के पास, उनकी आँखों के नीचे। बूढ़े आदमी के हाथ रुके नहीं, वो बस धीरे-धीरे सरकते रहे, जैसे कोई पुरानी दीवार टटोल रहा हो, ये देखने के लिए कि कितनी जगह बची है।
"बाबा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कर्कश निकली। "इन्हें ठीक करना है। आप बताइए, हो सकता है या नहीं?"
हरिदास ने अपना हाथ वापस खींचा। उन्होंने अपनी आँखें मींची। उनके होंठ हिले, जैसे वो अंदर ही अंदर कुछ गिन रहे हों।
"महीने लगेंगे," उन्होंने कहा। "कम से कम तीन महीने। शरीर का ज़हर बाहर निकलना है, और ये ज़हर बीस साल का है, वीर। ये एक दिन की बीमारी नहीं है। और ज़ुबान… ज़ुबान नहीं लौटेगी। जो जल गया है, वो मर गया है। पर बाकी शरीर — हाँ। बाकी शरीर वापस आ सकता है। अगर दवा मिल जाए।"
"कौन सी दवा?"
हरिदास ने अपनी उँगली उठाई और नीचे की तरफ़ इशारा किया — ज़मीन की तरफ़, हमारे पैरों के नीचे।
"तहखाने की सबसे नीचे की मिट्टी," उन्होंने कहा। "इस ज़मीन के नीचे एक और तह है, जिसे किसी ने छुआ नहीं है। वो मिट्टी काली है — बिल्कुल काली, जैसे राख। उसमें जो ताकत है, वो ऊपर की लाल मिट्टी में नहीं है। उस काली मिट्टी को पानी में घोलकर मालिश करनी है, रोज़, और ज़हर धीरे-धीरे पसीने के रास्ते बाहर आएगा। तीन महीने, हर रोज़, और फिर शरीर वो नहीं होगा जो आज है।"
मेरी छाती में कुछ और गर्म हो गया। "तो फिर देर किस बात की? काली मिट्टी कहाँ है? हम ले आएँगे।"
हरिदास ने सिर हिलाया। "काली परत को कोई नहीं खोद सकता, वीर। वो परत अपनी जगह पर ऐसे ही रहती है। उसे खोदने का तरीका सिर्फ़ दो आदमी जानते हैं। एक मैं। और दूसरा जिसने उसे मुझसे सीखा।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। "भैरव।"
"हाँ," हरिदास ने कहा। "भैरव।"
"भैरव जेल में है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो झुँझलाहट थी जो हमेशा होती थी जब कोई बात आसान नहीं होती थी। "क्या हम जेल में उससे मिट्टी खोदने का तरीका पूछेंगे?"
"नहीं," हरिदास ने धीरे से कहा। "भैरव अकेला नहीं है जो जानता है। एक और है। उसने भी यही सीखा था — बीस साल पहले, मुझसे, इसी तहखाने में।"
कमरा शांत हो गया। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पहले से मुझे देख रही थी। उसकी आँखों में वो नाम था जो हम दोनों के मुँह से अभी निकला था।
"रघुवीर," हमने एक साथ कहा।
हरिदास ने सिर हिलाया। "रघुवीर। उसने भी काली मिट्टी पहचानी थी। उसने भी उसे हाथ लगाया था। पर उसने उस मिट्टी से दवा नहीं बनाई। उसने उस मिट्टी को ज़हर में मिलाया, ताकि ज़हर जल्दी चढ़े और जल्दी उतरे नहीं। तुम्हारे पापा के शरीर में जो ज़हर है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा उसी काली मिट्टी का है।"
मैंने अपनी मुट्ठी भींची। नाखून हथेली में धँसे। "तो इलाज का तरीका उसी के पास है।"
"हाँ," हरिदास ने कहा। "और वो तरीका वो किसी को नहीं देगा, वीर। वो तुम्हें इसलिए नहीं देगा कि तुम जीत जाओ। वो तुम्हें इसलिए नहीं देगा कि वो बदला लेना भूल जाए। उसका पूरा खेल इसी पर टिका है — जब तक तुम्हारे पापा टूटे हुए हैं, तब तक उसका डर ज़िंदा है। और जब उसका डर ज़िंदा है, तब तक उसका राज़ ज़िंदा है।"
"तो हम उससे कैसे लेंगे?" मैंने कहा। "उसका राज़ ज़िंदा रहे, तो इलाज नहीं मिलेगा। और हम चुप बैठें, तो वो हमें कुचल देगा।"
कमरे में बातें रुक गईं। मैंने सुना — बाहर कहीं दूर, ऊपर, दीवारों के पार, ज़मीन के ऊपर, कुछ आवाज़ें आ रही थीं। जल्दी-जल्दी पैरों की आवाज़ें, और किसी के चिल्लाने की आवाज़, और फिर एक आवाज़ जो सबसे ऊपर उठी — एक आदमी की आवाज़, भारी, जैसे कोई बहुत ज़ोर से हुक्म दे रहा हो।
हम सबने एक दूसरे को देखा। टिंकू ने लालटेन ऊपर उठाई। माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली।
"मैदान की आवाज़ है," दीनू ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर आ गया था। "कोई बहुत बड़ा हंगामा है।"
मैं पलटा। सीढ़ियाँ। मुझे ऊपर जाना था।
"वीर," मीरा ने कहा, "हमें सोचना चाहिए। अगर ये रघुवीर की चाल है, तो—"
"तो वो मुझे बाहर बुला रहा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजीब लगी, ठंडी और साफ़। "और मैं अंदर छुपकर नहीं बैठूँगा।"
मैंने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं। मेरे पीछे-पीछे टिंकू आ रहा था। मैंने पीछे मुड़कर देखा — मीरा माँ को सहारा दे रही थी, और दीनू शेर सिंह को बाँहों में उठाने की कोशिश कर रहा था।
"बाबा," मैंने कहा, "आप यहीं रहिए। और इन्हें संभालिए।"
हरिदास ने सिर हिलाया। उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं। "वीर।"
"हाँ?"
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती। पर आदमी बोलता है। आज तू जो सुनेगा, वो मिट्टी से नहीं, आदमी से आएगा। इसलिए ध्यान से सुन।"
मैं बाहर निकला।
मैदान में सूरज सिर पर आ चुका था। मिट्टी सूखी थी और उस पर कई पैरों के निश थे। अखाड़े का फाटक खुला था, और उसी के अंदर, बीच में, रणवीर सिंह की व्हीलचेयर खड़ी थी।
वो सीधे बैठे थे। उनके सफ़ेद बाल सूरज में चाँदी जैसे लग रहे थे। उनकी बड़ी मूँछें हिल नहीं रही थीं। उनके दोनों हाथ कुर्सी के हत्थों पर थे — और वो हत्थे इतनी ज़ोर से पकड़े हुए थे कि उनकी उँगलियों की नसें उभर आई थीं।
उनके सामने खड़ा था मुंशीजी। हाथ में काग़ज़। उस काग़ज़ पर लाल मुहर लगी थी, और मैंने दूर से ही देख लिया कि वो मुहर गोल है, और उस पर कुछ लिखा है।
और उसके पीछे, थोड़ी दूर पर, भीड़ खड़ी थी। सुक्खी बुआ अपने पान के बीड़े के साथ सबसे आगे थीं। उनके पीछे कालू काका झुके हुए खड़े थे, अपनी लाठी पर टेक लगाए। और उनके पीछे — गाँव वाले, औरतें, बूढ़े, बच्चे, और कुछ पहलवान जो अभी भी अपनी कमर में तौलिया बाँधे थे।
मैं मैदान में चला आया। मेरी चप्पलें मिट्टी पर चटकीं। रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ चमका — फिर बुझ गया।
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