Spirit of a Fighter – Chapter 630
"मेरा मतलब है," मैंने धीरे से कहा, "कि पंचायत में मुझे किसी से लड़ना होगा?"
शेर सिंह ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी उँगली से हवा में एक नाम लिखना शुरू किया। "र"। "घ"। "ु"। "व"। "ी"। "र"।
"रघुवीर," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे किसी ने उसके हाथ से कोई चीज़ छीन ली हो।
शेर सिंह ने सिर हिलाया और अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके जले हुए होंठों से एक लंबी साँस निकली, ऐसी आवाज़ जैसे कोई पुरानी हवा भरी हुई मशीन चल रही हो।
"पर वो तो अखाड़े का मालिक है," टिंकू बोला। "वो खुद कुश्ती नहीं लड़ता। वो बैठकर देखता है।"
"वो अब तक नहीं लड़ता था," मीरा ने कहा। उसने अपने बाल पीछे किए और मेरी तरफ़ देखा। "पर अगर उसे पता चल गया कि उसका पूरा खेल खुल गया है — कि उसके अपने आदमी भैरव ने कबूल कर लिया — तो वो अपनी असली ताकत दिखाएगा। और उसकी असली ताकत यही है। कुश्ती। अखाड़ा। वो पंचायत में कहेगा कि ये सब झूठ है, और जो सच बोलेगा उसे मिट्टी में मिला दूँगा। और तब सबसे आगे मैं खड़ी हूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू नहीं। मैं खड़ा हूँगा।"
"वीर—"
"तूने मेरे लिए बहुत किया, मीरा। तेरी शीशी, तेरी किताबें, तेरे सवाल। अब ये मेरा अखाड़ा है। और अगर रघुवीर को किसी से लड़ना है, तो वो मुझसे लड़ेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी ज़ुबान से नहीं कहती — कि वो डर रही थी। और वो डर मेरे लिए था। उसने कुछ कहना चाहा, पर होंठ सिर्फ़ हिले और फिर बंद हो गए।
शेर सिंह ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उनकी हथेली पर पुराने ज़ख्मों की उभरी हुई लकीरें थीं। उन्होंने मेरी हथेली को अपनी हथेली में दबाया — ज़ोर से। इतनी ताकत उनके शरीर में कहाँ से आई, मुझे नहीं पता। पर उस दबाव में एक बात थी जो बिना शब्द के साफ़ थी।
मैंने उनकी आँखों में देखा। उन्होंने अपनी आँखों से मेरी तरफ़ इशारा किया, फिर अपने सीने पर हाथ रखा, फिर मुट्ठी बनाई और उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया। मुट्ठी खोली तो उसमें कुछ नहीं था। पर उन्होंने फिर मुट्ठी बनाई और मेरी हथेली पर रख दी।
जैसे कह रहे हों — ये ले। ये मेरी ताकत है। अब तेरी है।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने अपना हाथ नहीं खींचा।
"पर एक बात," मीरा ने अचानक कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी, वो सोचने वाली आवाज़ थी, वही जो शीशी और किताबों के वक़्त आती थी। "अगर रघुवीर खुद अखाड़े में उतरेगा, तो वो बिना तैयारी नहीं आएगा। वो अपने साथ वही दवा लाएगा।"
मेरे पेट में ठंडी सी चीज़ फैल गई।
"तो?" मैंने कहा।
"तो तुझे भी तैयारी करनी होगी," उसने कहा। "और तेरी तैयारी का एक ही रास्ता है।" उसने शेर सिंह की तरफ़ देखा। "इन्हें ठीक करना होगा। इनका शरीर जो ज़हर बीस साल से पी रहा है, वो अगर रुक जाए, तो ये फिर से खड़े हो सकते हैं। और अगर ये खड़े हो गए, तो रघुवीर का आधा डर खत्म।"
मैंने शेर सिंह की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरा हाथ अभी भी पकड़ा हुआ था।
"इसका इलाज हो सकता है?" मैंने पूछा। "इनका शरीर? इनकी ज़ुबान?"
मीरा ने एक लंबी साँस ली। उसने शेर सिंह को देखा, और उसकी आँखों में वो पुरानी, किताबों वाली चमक लौट आई — पर इस बार उसमें कुछ और भी था। डर।
"ज़ुबान नहीं," उसने धीरे से कहा। "जो जल गया, वो जल गया। पर जो इसके साथ हुआ है, वो ज़हर का सबसे बड़ा सबूत है — और इसका इलाज सिर्फ़ एक आदमी जानता है।"
कमरे में बारिश की आवाज़ भी रुक गई थी। जैसे बाहर का तूफ़ान भी सुनना चाहता हो कि वो आगे क्या कहेगी।
"कौन?" मैंने कहा। "कौन जानता है?"
मीरा ने धीरे से अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
"जिसने ये ज़हर बनाया," उसने कहा। "रघुवीर।"
॥
"रघुवीर।"
नाम कमरे में गिरा और ऐसे फैल गया जैसे तेल पानी पर फैलता है — धीरे, चुपचाप, पर पूरा फर्श ढक लेता है। मैंने शेर सिंह की तरफ़ देखा। उनका शरीर वैसे ही बैठा था, पर उनकी आँखें — जो अब तक मेरे हाथ पर टिकी थीं — ऊपर उठीं और मीरा पर जम गईं।
मैंने उनकी हथेली में हथेली रखी। उनकी उँगलियों ने मेरी उँगलियाँ दबाईं, और मुझे लगा कि वो कह रहे हैं — हाँ। वही।
"पर रघुवीर तो खुद ज़हर बनाता है," मैंने कहा। "वो इलाज क्यों करेगा?"
"क्योंकि हर ज़हर बनाने वाला अपने ज़हर का तोड़ भी जानता है," मीरा ने कहा। "ये किताबों का सबसे पुराना नियम है, वीर। ज़हर बनाने वाला खुद मरने से डरता है। इसलिए वो तोड़ भी बनाता है — किसी और से नहीं, अपने लिए। और जो उसका तोड़ बना सकता है, वही किसी और का इलाज भी कर सकता है। अगर वो चाहे तो।"
"और वो चाहेगा क्यों?"
मीरा ने अपनी किताबों का बैग खोला। उसमें से एक छोटी सी फटी कॉपी निकाली, जिसके पन्ने उम्र से पीले पड़ गए थे, कोने मुड़े हुए थे, और हर पन्ने पर उसकी माँ के हाथ की स्याही में कुछ लिखा था।
"ये मेरी माँ की कॉपी है," उसने कहा। "मेरी माँ आयुर्वेद की डॉक्टर थीं, गाँव से दूर, शहर में। जब मैं छोटी थी, तब वो इस कॉपी में हर मरीज़ का हाल लिखती थीं — क्या दिया, कैसे दिया, फिर क्या हुआ। बीस साल पहले की बात है, वो एक बार यहाँ आई थीं। रणवीर सिंह को देखने। उनके पैर सून्न हो रहे थे, कोई समझ नहीं पा रहा था। मेरी माँ ने उनका खून देखा, हाथ की नसें देखीं, और फिर कोई और नहीं, रघुवीर के पास गईं। उन्होंने मेरी माँ से कहा — 'तुम इसे ठीक नहीं कर सकती, क्योंकि तुम्हारे पास वो चीज़ नहीं है जो मेरे पास है।' और मेरी माँ ने उस दिन अपनी कॉपी में लिखा — 'इस आदमी के पास ज़हर का पूरा ज्ञान है। यही इसका इलाज भी जानता है। इसे हराना है तो इसकी अपनी दवा से हराओ।'"
कमरे में सन्नाटा था। मैंने महसूस किया कि मेरी साँस कब रुक गई थी।
"तो वो इलाज करेगा?" मैंने पूछा। "कैसे?"
"मैं उससे ये कहूँगी," मीरा ने कहा, "कि उसका बेटा भैरव जेल में बैठा है और उसने पूरी कहानी बोल दी है। अब उसके पास दो ही रास्ते हैं — या तो वो शेर सिंह को ठीक करे और अपने बेटे का पाप थोड़ा कम करे, या हम उसे अदालत में सबके सामने खींच लें। और एक और बात — वो शेर सिंह को ज़िंदा रखना चाहता था। बीस साल से ज़िंदा रखा, शांति से छुपाकर रखा। अगर वो मर जाते, तो उसके पास ये ज़िंदा सबूत नहीं रहता। तो वो इलाज करेगा। पर वो जानता है कि उसका इलाज एक तलवार भी है। और वो उस तलवार को हाथ में लेना नहीं चाहेगा।"
मैंने शेर सिंह की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था — न डर, न दर्द। कुछ और। जैसे कोई पुराना हिसाब चुकाने का इंतज़ार कर रहा हो।
"पहले बाबा हरिदास से मिलते हैं," मैंने कहा। "वो सबसे पहले बताएँगे कि कितना बड़ा खेल है।"
तहखाने का रास्ता मुझे अब ज़ुबानी याद था। लेकिन इस बार रास्ता लंबा लग रहा था, क्योंकि इस बार मेरे साथ एक आदमी था जो चल नहीं सकता था। मैं और टिंकू उन्हें बीच में लेकर चले। टिंकू की बाँह में शेर सिंह का एक हाथ था और मेरी बाँह में दूसरा। दीनू पीछे चल रहा था, हाथ में लालटेन लिए। मीरा आगे थी, और माँ सबसे पीछे, कुछ सोचती हुई।
रास्ते में शेर सिंह की साँस भारी होने लगी। मैंने रुकना चाहा, पर टिंकू ने मुझे रोक दिया। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — टीन की पोटली, जो हमेशा उसकी जेब में रहती थी — और उसमें से एक चौकोर टुकड़ा निकाला।
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