Spirit of a Fighter – Chapter 636
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अब भी दूर खड़ी थी। मैं उसकी तरफ़ बढ़ा, और मेरे पैर मिट्टी में धँसते रहे, और मैंने कुछ नहीं सोचा — बस चला।
वो मेरे पास आई। दो कदम। और फिर रुक गई।
"तुमने सच बोला," मैंने कहा। "थाने में जो काग़ज़ जमा हो रहा था — तुमने उसे रोका नहीं, तुमने उसे आने दिया, और फिर मुझे बताया। अगर तुमने मुझे नहीं बताया होता, तो आज शाम मैं अदालत में जाकर सबके सामने सिर झुका लेता।"
"इसीलिए बताया," उसने कहा। "क्योंकि तुम्हें सच का सामना करना था, झूठ का नहीं।"
उसकी आँखों में पानी था। मैंने पहली बार देखा कि मीरा भी रो सकती है।
"मेरे पिता के बारे में जो भैरव ने लिखा," मैंने कहा, "कि मैं उनका बेटा नहीं —"
"वो सबसे बड़ा झूठ है," उसने कहा। "मैंने तुम्हारे पिता की आँखें देखी हैं। और तुम्हारी आँखें देखी हैं। एक ही हैं।"
मैंने अपना हाथ बढ़ाया। उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। उसकी हथेली ठंडी थी, और उसमें काग़ज़ की स्याही की गंध थी।
"आज शाम," मैंने कहा। "पंचायत में। तुम मेरे साथ खड़ी रहोगी?"
वो हँसी। वो हँसी जो पहली बार उसके चेहरे पर मैंने देखी थी — कोर्ट की नहीं, कोई और हँसी।
"मैं तो खड़ी हूँ," उसने कहा। "तुमने देखा नहीं?"
तभी टिंकू फिर दौड़ता हुआ आया। इस बार उसके हाथ में डिब्बी नहीं थी। उसके हाथ में एक चिट्ठी थी, जो उसने मुड़ी हुई पकड़ी थी।
"भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो खतरे के वक़्त आती है। "बाहर वो भीड़ अब भी खड़ी है। पर अब वो और बढ़ गई है। और उनके बीच एक आदमी खड़ा है जो सबसे ऊँची आवाज़ में बोल रहा है।"
"कौन?" मैंने पूछा।
टिंकू ने चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "वो खुद नहीं आया। उसने ये भेजी है।"
मैंने चिट्ठी खोली। उसमें सिर्फ़ तीन लाइनें थीं, और वो लिखाई मैंने पहले कहीं देखी थी — पतली, झुकी हुई, जैसे किसी ने बहुत जल्दी में लिखी हो।
"तूने मेरे बाप को जेल में डाला। मैं तेरे बाप को दोबारा जलाऊँगा। और इस बार आधा नहीं, पूरा जलाऊँगा। — रघुवीर"
मेरे हाथ रुक गए। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"रघुवीर," उसने धीरे से कहा। "वो तो चला गया था।"
"वो नहीं गया," माँ ने कहा, और हम सबने उनकी तरफ़ देखा। "वो कभी गया ही नहीं। वो बीस साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था।"
मैंने चिट्ठी भींच ली। मेरी मुट्ठी में काग़ज़ चरमराया, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने हड्डी तोड़ दी हो।
"तो आज शाम सिर्फ़ पंचायत नहीं होगी," मैंने कहा। "आज शाम रघुवीर भी आएगा। और उसे भी सबके सामने खड़ा होना पड़ेगा।"
माँ ने मेरा कंधा पकड़ा। "वीर, सोच-समझकर।"
"माँ," मैंने कहा, "बीस साल से सोच ही रहा हूँ। अब बोलने का वक़्त है।"
और मैंने चिट्ठी अपनी जेब में रखी। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे।
॥
चिट्ठी मेरी जेब में थी, और उसका काग़ज़ मेरी जाँघ से चिपका हुआ गरम लग रहा था। मैं मैदान की तरफ़ बढ़ा, और मेरे पीछे माँ, मीरा, टिंकू — सब चले। भीड़ का शोर दूर से सुनाई दे रहा था, पर वो शोर अब पहले जैसा नहीं था। उसमें कुछ फट रहा था, कुछ बिखर रहा था — जैसे किसी ने भरी हुई थैली सी दी हो।
मैदान के कोने पर सरपंच का चबूतरा था, और उस पर मुंशीजी खड़े थे। उनके हाथ में लाल मुहर वाला काग़ज़ अब भी था, और उनकी आवाज़ पहली बार बिना काँपे आ रही थी। पर जब मैं पास पहुँचा, तो देखा कि भीड़ के बीच एक नया चेहरा था — एक आदमी, काले कोट में, हाथ में बैग, और उसके पीछे दो और आदमी। वो कोई गाँव वाला नहीं था। उसके जूते साफ़ थे। हमारे यहाँ मिट्टी में कोई साफ़ जूते पहनकर नहीं आता।
"रुको," उस आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो कचहरी में होती है। "मैं वकील हूँ। भैरव सिंह का वकील। और मेरे पास अदालत का आदेश है।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। मुंशीजी का हाथ हवा में रुक गया।
वकील ने अपना बैग खोला और उसमें से एक काग़ज़ निकाला, जिस पर नीली मुहर थी। "ये काग़ज़ कहता है कि वीर सिंह नाम का ये नौजवान असामान्य मानसिक हालत में है। इसकी सूंघने की शक्ति कोई ताकत नहीं, एक बीमारी है। इसे लोगों के बीच नहीं छोड़ा जा सकता। इससे अखाड़े की मिट्टी और यहाँ आने वाले पहलवानों को ख़तरा है।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी खिसक गई। मैंने सुना — साफ़ सुना — कि भीड़ में कुछ लोग हल्के से पीछे हटे। वो लोग जो अभी आधे घंटे पहले मेरे पैर छू रहे थे, जिनकी औरतें रो रही थीं, जिनके बूढ़े मेरे कंधे थपथपा रहे थे — वही लोग अब एक-एक कदम पीछे सरक रहे थे। मिट्टी में उनके पैरों की खिसकन मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी।
वकील ने काग़ज़ पढ़ना शुरू किया। उसकी आवाज़ ऊँची थी, और हर शब्द जैसे मेरे सीने पर पत्थर रख रहा था।
"यह भी लिखा है कि इसने अखाड़े की मिट्टी में कुछ ऐसा किया है जिससे पहलवानों की ताकत कम हो रही है। इसके हाथ में एक पीली शीशी देखी गई है, जिसमें ज़हर था। और यह भी — कि इसने खुद कबूल किया है कि इसके दो पिता हैं, जो किसी भी स्वस्थ दिमाग़ वाले आदमी की बात नहीं हो सकती।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी। सुक्खी बुआ। "अरे मैंने तो सुना है कि…"
वो रुक गई। पहली बार। उसका मुँह खुला रह गया, पान का बीड़ा होंठों से चिपका रह गया, और वो कुछ नहीं बोली। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो चुगलखोर बुआ की आँखों में भी आ जाता है जब उसे लगे कि अब उसकी बात किसी काम की नहीं।
टिंकू आगे बढ़ा। उसका चेहरा लाल था, और उसके हाथ काँप रहे थे। "ये झूठ है!" वो चिल्लाया। "ये सब झूठ है! भाई ने कुछ नहीं किया!" और वो वकील के हाथ से काग़ज़ छीनने के लिए लपका।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। "टिंकू। रुक।"
"मीरा मैडम, ये —"
"ये काग़ज़ हमारा सबूत है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ ठंडी थी, पर उसमें वो कंपन था जो सिर्फ़ मैं सुन सकता था। "जो काग़ज़ हमारे ख़िलाफ़ लिखा गया है, वही हमारा हथियार है। अगर हम इसे फाड़ेंगे, तो हम वही करेंगे जो वो चाहता है।"
टिंकू का हाथ ढीला पड़ा। वो पीछे हटा, और उसकी साँस तेज़ चल रही थी।
मैं चुप खड़ा रहा। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सब सुना — वकील की हर बात, भीड़ की हर खिसकन, सुक्खी बुआ की रुकी हुई आवाज़। और मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो आवाज़ नहीं करता।
मुझे याद आया — बचपन में, जब मैंने पहली बार किसी को बताया था कि मुझे गंध से पता चल जाता है कि किसने क्या खाया है, तो गाँव के बच्चे मेरे पीछे भागे थे और चिल्लाए थे — "कुत्ता! कुत्ता!" मैं सात साल का था। मैंने उस दिन के बाद कभी किसी को नहीं बताया। माँ को भी नहीं। माँ को सिर्फ़ इतना पता था कि मेरी नाक तेज़ है, बस।
और आज, पूरे गाँव के सामने, वही बात फिर कही जा रही थी — पर इस बार "कुत्ता" नहीं, "बीमारी"।
मैं उठा। मैंने मुंशीजी की तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़, फिर मीरा की तरफ़। मैं धीरे-धीरे मैदान के बीच में गया। मेरे पैर मिट्टी में धँस रहे थे, और मैं हर कदम पर सुन रहा था कि मेरे पीछे भीड़ कैसे हिल रही है।
मैं रुका। मैंने चारों तरफ़ देखा।
"जिसे मेरी नाक से डर लगता है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी, "वो एक कदम पीछे हट जाए।"
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