Spirit of a Fighter – Chapter 622
"बाबा," उसने कहा, "आप हमें ये बता रहे हैं कि गाँव में कोई ऐसा आदमी है जो बीस साल से शेर सिंह को छुपाकर रखे है? और वो आदमी हम सबके बीच घूमता है? रोज़?"
"हाँ।"
"और वो माधव सिंह का आदमी नहीं है?" मीरा ने पूछा। "वो माधव सिंह से भी बड़ा है?"
बाबा हरिदास ने कुछ देर सोचा। उनके होंठ हिले, फिर रुके।
"माधव सिंह को लगता है कि वो सब जानता है," उन्होंने कहा। "पर वो नहीं जानता कि शेर सिंह ज़िंदा है। माधव को लगता है कि उसने शेर सिंह को मरवा दिया और सब ख़त्म। पर उस रात जिस आदमी ने शेर सिंह को कब्र से निकाला, उसने माधव से भी ज़्यादा अपना फ़ायदा देखा।"
"क्या फ़ायदा?" मैंने पूछा।
"शेर सिंह जानता था," बाबा ने कहा, "कि ज़हर कैसे बनता है। और उससे भी ज़्यादा — वो जानता था कि उसे कैसे रोका जा सकता है। वो ज़िंदा रहा, तो ज़हर का खेल ज़िंदा रहा। और ज़हर का खेल ज़िंदा रहा, तो पैसा ज़िंदा रहा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपने होंठ काट रही थी। ये उसकी आदत थी — जब वो किसी बात को समझने की कोशिश करती, तो होंठ काटती।
"तो वो आदमी शेर सिंह को ज़िंदा रखकर उससे ज़हर बनवाता रहा," मीरा ने कहा। "बीस साल। जैसे किसी जानवर को पिंजरे में रखकर उसका दूध निकालते हैं।"
बाबा हरिदास ने अपना सिर हिलाया, और उनके चेहरे पर एक लाइन ऐसी दिखी जो पहले नहीं थी।
"वो जानवर नहीं था," उन्होंने कहा। "वो एक औरत थी।"
मैं सन्न रह गया।
"औरत?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ ऊँची हो गई थी। "मतलब… कौन?"
बाबा हरिदास ने अपनी लाठी उठाई और आँगन के फाटक की तरफ़ चलने लगे। उनके पैर धीमे थे, पर हर कदम ठोस था।
"मैंने बहुत बोल दिया," उन्होंने कहा। "अब तुम लोग जाओ। सो जाओ। कल तुम्हारे सामने एक पंचायत है, और उस पंचायत में एक काग़ज़ है। उस काग़ज़ पर वो नाम लिखा होगा जिसने बीस साल पहले मेरा घर जलाया था।"
"पर बाबा —" मैंने कहा।
वो रुके। उन्होंने अपना सिर थोड़ा पलटा।
"वीर," उन्होंने कहा, "तेरे पापा आज भी वहीं हैं जहाँ मैंने उन्हें बीस साल पहले छोड़ा था। और वो तुझे रोज़ देखते हैं। जब तू सुबह उठता है और अपने हाथ मुँह धोता है — वो देखते हैं। जब तू अखाड़े की मिट्टी में खड़ा होता है — वो देखते हैं। जब तू रात को माँ की चक्की की आवाज़ सुनकर सोता है — वो भी सुनते हैं।"
मेरी आँखें जल रही थीं। मैंने उन्हें पोंछा नहीं।
"तो मैं उन्हें कैसे ढूँढूँ?" मैंने पूछा। "मैं कैसे जानूँ कि वो कौन है? कहाँ है?"
बाबा हरिदास ने अपना हाथ अपने सीने पर रखा, फिर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। उनकी उँगलियाँ हवा में थीं, मुझे छू नहीं रही थीं।
"तेरी नाक," उन्होंने कहा। "तेरे पापा की गंध तुझे पता है। बचपन से पता है। जब तू उनके पास से गुज़रेगा, तो तेरी नाक तुझे बता देगी। तेरा दिमाग़ चिल्लाएगा कि ये कोई और है — पर तेरी नाक झूठ नहीं बोलेगी।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। मैंने सोचने की कोशिश की — पापा की गंध कैसी थी? पर मुझे कुछ याद नहीं आया। मैं बहुत छोटा था जब वो गए।
"मुझे याद नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। "बाबा, मुझे उनकी गंध याद नहीं है।"
बाबा हरिदास कुछ देर चुप रहे। फिर उनके होंठ हिले, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
"तो फिर तू उन्हें उनकी गंध से नहीं पहचानेगा," उन्होंने कहा। "तू उन्हें उनकी आँखों से पहचानेगा। बीस साल पहले जो आदमी नीम के पेड़ के नीचे बैठा था और तुझे देखकर रोया था — वो आज भी तुझे देखकर रोता है। बस अब उसके पास आँसू नहीं बचे।"
वो फाटक की तरफ़ बढ़ गए। उनकी लाठी ज़मीन पर टकरा रही थी — टक, टक, टक।
"बाबा," मीरा ने कहा, और वो उनके पीछे दो कदम गई। "आपने कहा था कि गाँव में कोई औरत है जो उन्हें छुपाकर रखे है। वो कौन है?"
बाबा हरिदास फाटक पर रुके। उन्होंने अपना हाथ फाटक की लकड़ी पर रखा। लकड़ी चरमराई।
"कल मैं पंचायत में आऊँगा," उन्होंने कहा। "और अगर मैं वहाँ तक पहुँचा, तो सब बता दूँगा।"
"अगर पहुँचे?" मैंने कहा। "मतलब?"
बाबा हरिदास ने अपना सिर घुमाया। उनकी सफ़ेद आँखों पर बँधा कपड़ा अब भी वैसा ही था, पर मुझे लगा वो मुझे देख रहे हैं।
"बीस साल से मैं इस गाँव में हूँ," उन्होंने कहा, "और बीस साल से कोई मुझे नहीं ढूँढ पाया। पर आज रात मैं तुम्हें सब बता रहा हूँ। और जो आदमी तुम्हारे पीछे है, वो आज रात जान जाएगा कि मैं तुम्हारे पास आया हूँ।"
मेरे पेट में ठंडी सुई-सी चुभी।
"तो आप मेरे पास क्यों आए?" मैंने पूछा। "आप जानते थे कि ख़तरा है।"
बाबा हरिदास ने अपना हाथ फाटक से हटाया। वो पलटे और मेरी तरफ़ आए। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उसमें एक अजीब-सी गर्मी थी — जैसे कोई बुझता हुआ अंगारा छू लिया हो।
"क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं बीस साल से इस डर के साथ जी रहा हूँ कि मैं मरूँगा और सच मेरे साथ चला जाएगा। मुझे नहीं पता कि कल पंचायत में क्या होगा। पर अगर मैं आज रात मर गया, तो मरने से पहले मुझे ये बताना था।"
उन्होंने मेरा कंधा छोड़ा।
"अब जाओ," उन्होंने कहा। "और हाँ — वीर।"
"हाँ?"
"कल पंचायत में जब तेरे पापा का काग़ज़ खुलेगा, तो उस पर जो नाम होगा, वो नाम किसी आदमी का नहीं होगा। वो नाम एक औरत का होगा। और वो औरत इस गाँव में ऐसी जगह रहती है जहाँ तू रोज़ जाता है।"
मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
बाबा हरिदास फाटक से बाहर निकल गए। उनकी लाठी की आवाज़ दूर होती गई — टक, टक, टक — और फिर अंधेरे में घुल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैरों के नीचे आँगन की मिट्टी ठंडी थी।
टिंकू ने धीरे से कहा, "वीर, तू ठीक है?"
मैंने अपना सिर हिलाया। पर असल में मैं ठीक नहीं था। मेरे अंदर कुछ ऐसा हो रहा था जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था।
वो आदमी आज भी तेरे गाँव में है, और वो तुझे रोज़ देखता है।
मैंने आँगन की दीवार पर हाथ रखा और पूरी ताकत से दबाया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी। "ये गाँव में कोई औरत है जो बीस साल से किसी को छुपा सकती है? ऐसी औरत?"
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, "एक नहीं, चार हैं। सुक्खी बुआ, कमला, रामदीन की विधवा… और शांति।"
"शांति," मैंने कहा। शांति का नाम मेरे मुँह से निकला, और मुझे ठाकुर महेंद्र सिंह की वो दूसरी पत्नी याद आई जिसने मुझे टिंकू की दुकान की ज़मीन का लालच दिया था। और जिसका इत्र चमेली का था।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"वीर, शांति शहर में है। वो गाँव में नहीं रहती।"
"तो फिर कौन?" मैंने पूछा। "कौन है जो मेरे रोज़ जाने वाली जगह पर रहती है?"
टिंकू ने अचानक अपना मुँह खोला। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।
"वीर," उसने कहा, "तू रोज़ कहाँ जाता है? सुबह उठकर, सबसे पहले?"
मैंने सोचा। मैं रोज़ सुबह उठकर पहले नहर की तरफ़ जाता हूँ। फिर अखाड़े के बाहर खड़ा होता हूँ। और फिर…
और फिर मेरे दिमाग़ में एक चेहरा आया। एक चेहरा जिसे मैं रोज़ देखता हूँ, जिससे मैं रोज़ बात करता हूँ, जो मुझे रोज़ चाय पिलाता है।
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"नहीं," मैंने धीरे से कहा। "नहीं, ये नहीं हो सकता।"
"कौन?" मीरा ने पूछा। "वीर, कौन?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखों में पानी भर आया था, और मुझे पता नहीं था कि गुस्से से या डर से या किसी और चीज़ से।
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