Spirit of a Fighter621 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 621

7 min read November 5, 2026

"शेर सिंह," बाबा ने दोहराया। "मैं उसके पास गया। मैंने उसे छुआ। वो काँप रहा था। वो मुझे देखकर रोने लगा — आवाज़ नहीं, बस आँसू। उसके गालों पर जले हुए हिस्से से पानी बह रहा था, और वो पानी भी लाल था।"

मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने बार-बार निगलने की कोशिश की, पर वो चीज़ वहीं फँसी रही।

"वो बोल क्यों नहीं रहा था?" मैंने पूछा। "अगर वो ज़िंदा था, तो बोल क्यों नहीं रहा था?"

बाबा हरिदास ने अपना मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। जैसे जवाब उनके मुँह में ही काँटा बन गया हो।

"ज़हर," उन्होंने कहा। "उस ज़हर ने उसकी ज़ुबान जला दी थी। आधा उसका गला अंदर से ऐसा जल गया था कि जब वो बोलने की कोशिश करता था, तो सिर्फ़ एक कर्कश आवाज़ निकलती थी। जैसे कोई कौआ मर रहा हो। वो आवाज़ नहीं थी, दर्द था।"

मुझे अपनी माँ की बात याद आई — शेर सिंह की लाश देखी थी, पर आँखें बंद थीं। माँ ने कभी उनका चेहरा नहीं देखा था। उस रात अंधेरा था, सिर्फ़ एक दीया था, और माधव के आदमी माँ को खींचकर बाहर ले गए थे।

"तो जो लाश दफ़नाई गई," मैंने धीरे से कहा, "वो पापा की नहीं थी।"

"वो किसी और की थी," बाबा ने कहा। "या शायद कुछ भी नहीं थी — सिर्फ़ कपड़े में लिपटा ईंट-पत्थर। माधव ने जल्दबाज़ी में दफ़न करवा दिया, और बाद में उसी रात शेर सिंह को कब्र से निकलवाकर जंगल में भेज दिया।"

"पर वो मरा नहीं था," मीरा ने कहा। "ज़हर उसे मार नहीं पाया।"

"ज़हर उसे मारना चाहता था," बाबा ने कहा। "पर मैंने उसे कुछ दिया था — बरसों पहले। एक जड़, जो ज़हर को धीमा कर देती है। शेर सिंह ने उसे कभी नहीं पिया था। पर उस रात… उस रात उसने पी लिया। जैसे उसे पता था।"

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरे सामने आग जल रही थी — जंगल की आग, और उसके सामने एक आदमी बैठा था जिसका चेहरा पिघला हुआ था, और जिसकी आँखों से लाल पानी बह रहा था।

"बाबा," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी। "ये तो भूत की कहानी लग रही है।"

बाबा हरिदास ने अपना सिर टिंकू की तरफ़ घुमाया। उनके सफ़ेद होंठ हिले।

"भूत की कहानी वो होती है जिसमें मरा हुआ आदमी लौटता है," उन्होंने कहा। "यहाँ मरा हुआ आदमी लौटा नहीं। यहाँ ज़िंदा आदमी को मार दिया गया था — उसका नाम, उसका चेहरा, उसकी आवाज़, सब। जो बचा, वो सिर्फ़ एक साँस थी। बीस साल की अकेली साँस।"

टिंकू ने अपना मुँह बंद कर लिया।

मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैर ऐसे लड़खड़ा रहे थे जैसे मैं घंटों से बैठा हूँ। मैं आँगन के उस कोने तक गया जहाँ दीया रखा था, और उसकी लौ को देखने लगा।

और तभी — अचानक — कुछ याद आया।

मैं छोटा था। शायद सात या आठ साल का। स्कूल से लौट रहा था, गुड़िया से हाथ पकड़े हुए। बरसात का दिन था। बाज़ार के पास, नीम के पेड़ के नीचे, एक आदमी बैठा था।

फटे कपड़े। सिर पर मैला कपड़ा लपेटा हुआ। चेहरा ऐसा जैसे किसी ने मिट्टी से पोत दिया हो। और वो बोल नहीं रहा था — सिर्फ़ हाथ हिला रहा था, और जब कोई उसके पास से गुज़रता, तो वो अपना हाथ आगे बढ़ा देता था।

गाँव के बच्चे उसे देखकर भागते थे। कोई पत्थर मारता, कोई "पागल, पागल" चिल्लाता।

गुड़िया ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया था और कहा था — "भैया, चलो जल्दी।"

पर मैं रुक गया था। मैंने उस आदमी की तरफ़ देखा था। वो मेरी तरफ़ देख रहा था। और उसकी आँखों से पानी बह रहा था। चुपचाप, बिना आवाज़।

और मैंने तब सोचा था — ये आदमी क्यों रो रहा है? मैंने तो कुछ किया भी नहीं।

गुड़िया ने मुझे खींच लिया था। मैं चला गया था। और उसके बाद मैंने उस आदमी को कभी नहीं सोचा। कभी नहीं।

मेरे हाथ से दीया गिरने ही वाला था। मैंने उसे थाम लिया, पर मेरी उँगलियाँ जल गईं। मुझे दर्द महसूस नहीं हुआ।

"वीर?" मीरा ने कहा। वो मेरे पास आ गई थी। उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "तेरे हाथ जल गए हैं।"

"मैंने उसे देखा था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "मैंने उसे देखा था, मीरा। बाज़ार में। नीम के पेड़ के नीचे। फटे कपड़ों में। वो मेरी तरफ़ देखकर रो रहा था, और मैंने सोचा उसका दिमाग़ खराब है।"

मीरा की पकड़ ढीली नहीं हुई। उसने मेरी हथेली खोली और उसमें फूँक मारी। उसकी साँस ठंडी थी।

"तू तब छोटा था," उसने कहा। "तू क्या करता?"

"मैं उससे बात कर सकता था," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "मैं रुक सकता था। मैं उसे पानी दे सकता था। मैं कुछ भी कर सकता था। पर मैं भाग गया। अपने पापा को देखकर मैं भाग गया।"

बाबा हरिदास ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। एक ठोस आवाज़ आई।

"वो तेरे पापा थे," उन्होंने कहा। "और वो तुझे रोज़ देखते थे।"

मैं पलटा। मेरे पैर जैसे जम गए थे।

"रोज़?" मैंने कहा।

"रोज़," बाबा ने कहा। "वो आज भी तेरे गाँव में है, वीर। वो वहीं है। वो तुझे रोज़ देखता है — जब तू सुबह पानी भरने जाता है, जब तू अखाड़े की तरफ़ जाता है, जब तू माँ के लिए दवा लाता है।"

मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकने लगी। मैंने आँगन की दीवार को हाथ से पकड़ लिया।

"कहाँ?" मैंने पूछा। "कहाँ है वो?"

"मैं नहीं बता सकता," बाबा ने कहा। "क्योंकि अगर मैंने बता दिया और तू गया, तो जो आदमी उसे बीस साल से छुपा रहा है, उसे पता चल जाएगा। और अगर उसे पता चल गया, तो शेर सिंह की वो एक बची हुई साँस भी नहीं रहेगी।"

"कौन छुपा रहा है?" मैंने पूछा। "कौन?"

बाबा हरिदास ने अपनी लाठी उठाई और उसकी नोक मेरी तरफ़ की। मेरी छाती पर, ठीक दिल के ऊपर।

"तू कल पंचायत में जाएगा," उन्होंने कहा। "और वहाँ जो आदमी सबसे ज़्यादा सच बोलेगा, वही सबसे ज़्यादा झूठ बोल रहा होगा। यही याद रखना।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो किसी काग़ज़ पर लिखी बात को पढ़ते वक़्त होती है।

"बाबा," उसने कहा, "माधव सिंह के पास जो काग़ज़ है — उस पर किसका नाम लिखा होगा?"

बाबा हरिदास ने अपना सिर झुकाया। कुछ देर चुप रहे। फिर बोले।

"बीस साल पहले जब मैं जंगल से लौटा," उन्होंने कहा, "तो मैंने उस झोपड़ी में एक और आदमी को देखा था। दूर से। वो शेर सिंह के पास बैठा था, और उसके हाथ में एक प्याली थी। वो उसे पानी पिला रहा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी, पर मैंने उसकी आवाज़ सुनी।"

"क्या बोला था उसने?" मैंने पूछा।

"उसने कहा था — 'तू मर नहीं, तुझे मरना नहीं है। तुझे देखना है कि तेरा बेटा क्या बनेगा।'"

मेरा गला सूख गया।

"और फिर वो पलटा," बाबा ने कहा। "मैंने उसका चेहरा देखा। और मैं उसे पहचानता था।"

"कौन था?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब वो करारापन आ गया था जो अदालत की होती है।

बाबा हरिदास ने अपना सिर हिलाया, बहुत धीरे, जैसे वो चेहरा उनकी आँखों के सामने अभी भी तैर रहा हो।

"वो चेहरा मैंने बहुत बाद में पहचाना," उन्होंने कहा। "बरसों बाद। जब एक दिन वो आदमी मेरे सामने से गुज़रा और मुझे ऐसे देखा जैसे मुझे नहीं जानता।"

"नाम, बाबा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "नाम क्या था?"

बाबा हरिदास ने अपनी लाठी वापस अपने पास खींची और उसे अपने कंधे पर टिका लिया। उनकी सफ़ेद दाढ़ी अंधेरे में चमक रही थी।

"वो नाम मैं नहीं लूँगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो नाम मैं आज रात लूँगा, वो कल पंचायत में मेरे सामने से गुज़रेगा और मुझे देखकर मुस्कुराएगा। और अगर मैंने उस आदमी की आँखों में देखा, तो मेरा बूढ़ा दिल रुक जाएगा।"

टिंकू ने अचानक अपनी टोपी उतार दी। उसके बाल पसीने से चिपके हुए थे।

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