Spirit of a Fighter – Chapter 623
"कालू काका," मैंने कहा। "कालू काका रोज़ सुबह अखाड़े की मिट्टी सींचते हैं। और वो मुझे रोज़ देखते हैं।"
टिंकू ने अपनी डिब्बी गिरा दी। टिन की आवाज़ आँगन में गूँज गई, और मिठाई की गंध हवा में फैल गई।
"नहीं," टिंकू ने कहा। "कालू काका नहीं। वो तो… वो तो हमारे साथ थे। वो तहखाने में थे। वो…"
"वो बीस साल पहले भैरव को कुएँ के पास देखने वाले आदमी हैं," मीरा ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था। "और वो अकेले आदमी हैं जिसने तब कुछ नहीं कहा।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरी हथेली में दीये की जली हुई उँगली अब भी दर्द कर रही थी — पर मुझे वो दर्द अच्छा लग रहा था। वो मुझे ज़मीन से बाँधे हुए था।
"मीरा," मैंने कहा। "कल पंचायत से पहले मुझे कालू काका से मिलना है। अकेले।"
"वीर —"
"अगर वो सच बोलेंगे, तो सब ठीक।" मैंने मिट्टी में गिरी मिठाई की तरफ़ देखा। "और अगर वो झूठ बोलेंगे…"
मैंने वाक्य पूरा नहीं किया। ज़रूरत नहीं थी।
हवा में अचानक चमेली की गंध आई। बहुत हल्की। इतनी हल्की कि मुझे लगा मेरी नाक मुझसे शरारत कर रही है। मैंने पलटकर आँगन के कोने में देखा — कुछ नहीं था। सिर्फ़ अंधेरा।
पर मेरी नाक ने मुझसे कहा — यहाँ कोई था। अभी। कुछ पल पहले।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी हवा सूँघ रही थी। उसका चेहरा कठोर हो गया था।
"वीर," उसने कहा, "ये गंध…"
"हाँ," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ।"
और मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया। क्योंकि चमेली का इत्र शांति का था — और शांति शहर में थी। फिर ये गंध यहाँ क्यों थी?
मैंने फाटक की तरफ़ देखा। बाबा हरिदास अंधेरे में गायब हो चुके थे।
पर उनकी जगह, अंधेरे में, दूर, नीम के पेड़ के नीचे, एक परछाई खड़ी थी। छोटी। झुकी हुई। जैसे कोई बूढ़ा आदमी हो। और उसके हाथ में कुछ था — एक लालटेन। जो बुझी हुई थी।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। परछाई हिली।
और तभी मेरी नाक में एक और गंध आई। बहुत पुरानी। बहुत जानी-पहचानी। मिट्टी और पसीने की गंध, जिसमें हल्की-सी हल्दी मिली थी।
वो गंध मेरे पापा की थी।
मेरे पैर रुक गए। मेरा दिल धड़कना बंद हो गया, जैसे किसी ने उसे हाथ में पकड़ लिया हो।
और अंधेरे में खड़ी परछाई ने धीरे से अपना हाथ उठाया। एक उँगली। सिर्फ़ एक उँगली। जैसे कोई बच्चे को चुप रहने का इशारा करता हो।
फिर वो परछाई पलटी और पेड़ों के पीछे गायब हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"वीर?" मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "क्या हुआ? तू क्या देख रहा है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखों में पानी था, और इस बार मैंने उसे पोंछा नहीं।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और की हो। "मुझे लगा… मुझे अभी लगा कि मैंने अपने पापा को देखा।"
मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
और उस रात, सोते वक़्त, मेरी आँखों के सामने बार-बार वही एक उँगली उठी रही। वही इशारा। जैसे कोई कह रहा हो — चुप रह, बेटा। अभी वक़्त नहीं है।
पर सवाल मेरे सीने में धड़क रहा था, और वो सवाल था — अगर वो पापा थे, तो उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया क्यों नहीं? वो भागे क्यों?
और सबसे डरावना सवाल — जो आदमी उन्हें बीस साल से छुपाकर रखे है, वो कल पंचायत में मेरे सामने बैठा होगा। और मुझे उसका नाम तब तक नहीं पता चलेगा, जब तक काग़ज़ नहीं खुलता।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई।
क्योंकि मेरे कान में एक आवाज़ गूँज रही थी — बाबा हरिदास की आवाज़, जो कह रही थी कि जिस आदमी पर सबसे ज़्यादा भरोसा हो, उसी से पहला सवाल पूछना।
और मुझे पता था — कल पंचायत में मेरे सबसे ज़्यादा भरोसे वाला आदमी कौन होगा।
कालू काका।
॥
कालू काका।
नाम मेरे दिमाग़ में चुभ रहा था, जैसे जूते के अंदर फँसा कंकड़। मैं आँगन में खड़ा था, आँखें नीम के पेड़ की तरफ़, पर वहाँ अब सिर्फ़ अंधेरा था। बुझी लालटेन वाली परछाई जा चुकी थी। हवा में हल्दी और मिट्टी की वो पुरानी गंध भी अब सिर्फ़ याद बनकर रह गई थी, जैसे किसी ने खिड़की खोलकर बंद कर दी हो।
"वीर।" मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "तेरे हाथ काँप रहे हैं।"
"मुझे पता है।"
"तो अंदर चल।"
"मीरा —"
"अंदर चल," उसने दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो डॉक्टर की होती है जब वो मरीज़ को हुक्म देता है, न कि जब वो उससे दुआ करता है।
मैं अंदर चला। टिंकू घर के कोने में चूल्हे के पास बैठा था, उसके हाथ में लोहे का चिमटा था और वो उसे बिना वजह घुमा रहा था। उसने मुझे देखा और चिमटा रख दिया।
"भाई," वो बोला, "मैं चाय बना दूँ?"
"नहीं।"
"मैं गुड़ वाली चाय बना दूँ? तेरी माँ के हाथ की — मतलब जैसी वो बनाती हैं। मुझे आती है। मैंने एक बार उन्हें देखकर सीखी थी।" उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।
"टिंकू।"
"हाँ?"
"बना दे।"
वो उठा, और मुझे लगा उसने राहत की साँस ली। कुछ लोगों को सबसे ज़्यादा तब सुकून मिलता है जब उनके हाथ व्यस्त हों। टिंकू उन्हीं में से था।
मैं माँ के कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर पहुँचकर मेरे पैर अपने आप रुक गए। अंदर दीया जल रहा था। उसकी पीली रोशनी में माँ चारपाई के किनारे बैठी थीं, कमर सीधी, हाथ गोद में। ऐसे बैठी थीं जैसे कोई मूर्ति हो — जिसे किसी ने बनाया हो और फिर भूल गया हो।
"माँ।"
वो हिली नहीं।
"माँ," मैंने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखकर कहा, "मुझे कुछ पूछना है।"
"पूछ।" उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कई दिन से चूल्हा न जला हो।
मैं अंदर गया। मैं उनके सामने बैठ गया, फ़र्श पर, घुटनों के बल। मेरी आवाज़ काँप रही थी और मुझे उस पर शर्म आ रही थी, पर मैं रोक नहीं पाया।
"माँ, पिताजी ज़िंदा हैं?"
कमरे में हवा रुक गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। बस देखा। कुछ पल। फिर उनका चेहरा टूटा। मैंने अपनी माँ को पहली बार ऐसे टूटते देखा। उन्होंने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया और एक ऐसी आवाज़ निकली जो मैंने उनसे पहले कभी नहीं सुनी थी। रोना नहीं था वो। रोने से पहले जो आवाज़ आती है, जब सब कुछ अंदर से खिसकने लगता है — वो आवाज़।
"माँ —"
वो चारपाई से नीचे फ़र्श पर बैठ गईं, और उनका शरीर ऐसे झुक गया जैसे किसी ने उनकी रीढ़ की हड्डी खींच ली हो। मैंने उन्हें पकड़ा। उनका शरीर गरम था, पर जैसे बुख़ार वाली गरमी, काँपती हुई।
"माँ, प्लीज —"
"मुझे शक था," वो बोलीं, और उनकी आवाज़ दाँतों के बीच से आ रही थी। "बीस साल से शक था। रोज़ रात। हर बार जब मैं चक्की चलाती, हर बार जब मैं आटा छानती, मेरे अंदर एक आवाज़ उठती — 'सरस्वती, वो मरा नहीं है।' और मैं उस आवाज़ को दबा देती थी।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैं उसे ज़िंदा मान लेती," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, उनकी आँखें सूजी हुई थीं और उनमें पानी था, "तो मुझे ये भी मानना पड़ता कि मैंने तुझे बीस साल उसके पास नहीं जाने दिया। बीस साल, वीर। मैंने तेरे बाप को तुझसे दूर रखा — और मैंने खुद को ये समझाया कि वो मर चुका है, क्योंकि तभी मैं सो पाती थी।"
वो मेरे सीने पर सिर रखकर रोईं। उनका रोना सिर्फ़ आँसू नहीं था — उसमें बीस साल की चक्की थी, बीस साल की रोटियाँ थीं जो उन्होंने चूल्हे पर जलाईं, बीस साल की वो रातें थीं जब वो आधी जली रोटी छोड़कर सो गईं ताकि मैं समझ जाऊँ कि घर में कुछ ठीक नहीं है।
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