Spirit of a Fighter – Chapter 61
उनकी आँखें भर आईं।
मैं उठा। मैंने उन्हें चारपाई पर लेटाया। लालटेन उनके पास रखी।
"माँ, मैं कल सुबह लौटूँगा। और उसके बाद मैं आपको यहाँ से निकालूँगा।"
"बेटा—"
"माँ, एक बात।" मैंने कहा। "जब मैं लौटूँ, तो कोई मुझसे पूछे कि मेरी माँ कौन है। मैं दो नाम बताऊँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"जो माँ ने मुझे जन्म दिया," मैंने कहा, "और जो माँ ने मुझे पाला। दोनों मेरी हैं।"
वो सिसकीं। पर इस बार रोना अलग था। जैसे बीस साल का बोझ हल्का हुआ हो।
मैं बाहर निकला। कालू काका दरवाज़े पर खड़े थे, आँखें डबडबाई हुईं।
"काका," मैंने कहा, "आप यहीं रहिए। उनके पास। कल सुबह तक।"
"क्या करूँगा?"
"उन्हें बताइए कि मैं लड़ने गया हूँ। और अगर मैं न लौटूँ—"
"मत बोल ऐसा।"
"तो मैं उन्हें बताऊँगा कि तेरा बेटा लड़ने गया है," कालू काके ने मेरा वाक्य पूरा किया, आवाज़ भारी। "और वो लौटेगा। बस इतना। बाकी बात मेरे मुँह से नहीं निकलेगी।"
उन्होंने मेरा कंधा थामा। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर पकड़ मज़बूत थी।
"जा," वो बोले। "और सुन — तेरे पापा भी ऐसे ही निकले थे, सीना तानकर। मैंने तब भी दरवाज़े पर खड़े होकर देखा था। आज भी देख रहा हूँ। फ़र्क़ बस इतना है — आज मेरे हाथ जुड़े हुए हैं।"
वो जुड़े हाथ मेरी तरफ़ उठा दिए। मैंने सिर झुकाया और बाहर निकल आया।
रास्ते में हवा ठंडी थी। मेरे कानों में अभी भी माँ की आवाज़ गूँज रही थी — "तेरी नाक वैसी है।" मैंने अपनी नाक छुई। जैसे कोई चीज़ पहली बार मिली हो।
घर पहुँचा तो आँगन में लालटेन जल रही थी। और लालटेन के नीचे खड़ी थीं सरस्वती माँ — दरवाज़े की चौखट पर, दोनों हाथ जोड़े।
सामने भैरव खड़ा था। उसके पीछे आठ-दस आदमी, हाथों में लाठियाँ। गाँव के लोग दूर-दूर खड़े, साँस रोके।
"बेटा बीमार है, सर," सरस्वती माँ की आवाज़ काँप रही थी, पर वो पीछे नहीं हटीं। "आप जाइए। प्लीज।"
भैरव मुस्कुराया। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने दूध में ज़हर घोल दिया हो।
"मैं तो दवा लाया हूँ, माँ," उसने मीठी आवाज़ में कहा, और एक गिलास आगे बढ़ाया। "ये पानी पिला दो उसे। बुख़ार उतर जाएगा।"
सरस्वती माँ ने गिलास की तरफ़ देखा। उनके हाथ जुड़े ही रहे। वो नहीं बढ़ीं।
मैंने दरवाज़े से आवाज़ दी।
"रुकिए।"
सबने पलटकर देखा। मैं चौखट पर आ खड़ा हुआ। सरस्वती माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो डर आ गया जो माँ को होता है — बेटा आगे आ रहा है, और आगे आग ही है।
"अंदर जाओ, माँ," मैंने धीरे से कहा।
"बेटा—"
"माँ।" मैंने उनका हाथ पकड़ा और पीछे किया। "आप अंदर जाइए। ये मेरा काम है।"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। मैंने अपनी आँखें नहीं हटाईं। फिर वो पीछे हटीं, पर दरवाज़े से दूर नहीं गईं।
मैंने भैरव के हाथ से गिलास लिया। सूँघा।
वही कड़वी गंध। वही जो अखाड़े के पानी में थी। जो उन ग्यारह पहलवानों के पसीने में आ गई थी।
मैंने गिलास ऊपर उठाया, ताकि सब देख सकें।
"ये पानी नहीं है," मैंने कहा, आवाज़ ऊँची, साफ़। "ये ज़हर है।"
गाँव में सन्नाटा छा गया। फिर धीरे-धीरे फुसफुसाहटें उठीं।
भैरव ठहाका लगाकर हँसा। उसने मेरे हाथ से गिलास छीना और एक साँस में पूरा पी गया।
"देखो," उसने गिलास उलटकर दिखाया। "मैं तो ज़िंदा हूँ। तेरा ज़हर का सपना टूट गया, बेटा।"
गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली। कोई बोला, "वीर, तू ग़लत समझा।"
पर मैंने भैरव की आँखों में देखा। उसकी आँखों के नीचे हल्की पीलापन थी। उसके होंठ सूखे थे।
"आप रोज़ थोड़ा-थोड़ा पीते हो," मैंने धीरे से कहा, पर इतना धीरे कि सिर्फ़ वही सुने। "इसलिए आप अंदर से सड़ रहे हो। बाहर से मज़बूत दिखते हो, पर अंदर से खोखले हो चुके हो। सही कहा ना?"
भैरव की हँसी एकदम रुक गई। उसकी आँखें ठंडी हो गईं। जैसे किसी ने खिड़की बंद कर दी हो।
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर वो मुड़ा और अपने आदमियों को इशारा किया।
वो चलने लगा। दो कदम गया। फिर रुका।
वो पलटा, मेरे पास आया, और मेरे कान के पास झुक गया। उसकी साँस में वही कड़वी गंध थी — पर इस बार उसमें कुछ और भी था। मौत की बू।
"तेरी माँ के हाथ की चक्की कल से नहीं चलेगी," वो फुसफुसाया। "देख लेना।"
और वो मुस्कुराकर अपने आदमियों के साथ अंधेरे में ग़ायब हो गया।
॥
मैं रात भर नहीं सोया। आँगन में बैठा रहा, पीठ दीवार से टिकाए, आँखें दरवाज़े पर। भैरव की आख़िरी बात कानों में घूमती रही — "तेरी माँ के हाथ की चक्की कल से नहीं चलेगी।" मैंने सोचा, बस धमकी है। बड़ी-बड़ी बातें करता है आदमी, करने को कुछ नहीं करता।
सुबह मैं ग़लत निकला।
चार बजे माँ उठीं, जैसे रोज़ उठती हैं। मैंने उनकी चप्पल की आवाज़ सुनी — आँगन पार करके चक्की की तरफ़। फिर वो आवाज़ आई जो रोज़ आती थी — पत्थर पर पत्थर, धीरे-धीरे, गेहूँ के दाने पिसते हुए। पर आज कुछ बदला था। आवाज़ में लय नहीं थी। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते हाँफ रहा हो।
मैं दौड़कर गया।
चक्की का ऊपर वाला पत्थर चिरा हुआ था। बीच से एक लंबी दरार, जैसे किसी ने हथौड़ा उठाकर पूरी ताकत से मारा हो। दरार से गेहूँ की धूल रिस रही थी, ज़मीन पर सफ़ेद ढेर बन गया था। नीचे का पत्थर भी हिल गया था, उसकी जगह से।
माँ पत्थर के सामने खड़ी थीं। हाथ में गेहूँ की मुट्ठी, जो अब किसी काम की नहीं थी। उन्होंने पत्थर देखा। दरार पर उँगली फेरी। फिर धीरे से बैठ गईं — वहीं ज़मीन पर, पत्थर के सामने, जैसे कोई थककर रास्ते में बैठ जाए।
मैं कुछ बोल नहीं पाया। क्या बोलता? कि मुझे पता था, कल रात वो आदमी यही कहकर गया था? कि मैंने सुना था और सिर्फ़ धमकी समझकर सो गया?
माँ ने पत्थर पर हाथ रखा। बोलीं, बहुत धीरे — "ये पत्थर तेरे पापा के हाथ से गढ़ा था। जगदीश ने। शादी के दूसरे साल।" उनकी आवाज़ में आँसू नहीं था। कुछ और था — जैसे कोई बरसों से चलती आ रही घड़ी अचानक रुक जाए और कमरे में सन्नाटा छा जाए।
तब मेरे अंदर कुछ टूटा। मैं बाहर भागा।
"वीर!" माँ ने पुकारा।
मैंने सुना नहीं। मैं सीधा अखाड़े की तरफ़ भागा, धोती संभालते हुए, चप्पल पैरों में नहीं थी। रास्ते में नीम के पेड़ पीछे छूटते गए। मेरे दिमाग़ में एक ही बात — उस आदमी का काला चेहरा, उसकी मुट्ठी, वो मुस्कान।
नहर के मोड़ पर कोई मेरे रास्ते में आ खड़ा हुआ।
मैं टकराने ही वाला था कि आवाज़ आई — "रुको।"
मीरा। सफ़ेद कुर्ते में, बाल हवा से बिखरे, हाथ फैलाए रास्ता रोके खड़ी थी।
"हटो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लगी। फटी हुई थी, जैसे किसी और गले से निकल रही हो।
"नहीं हटूँगी।"
"मीरा, हट जाओ।"
"क्यों? ताकि तुम अखाड़े जाकर भैरव का गला पकड़ो और उसके दस आदमी तुम्हें मज़े से पीटें?" उसकी आवाज़ तेज़ थी, पर आँखें शांत। "अंधे हो गए हो? भागकर क्या करोगे? सबूत दो।"
"सबूत?" मैं हँसा। वो हँसी मेरे कले से निकली, किसी और की लगी। "चक्की टूटी पड़ी है, मीरा। मेरी माँ के हाथ की चक्की। उसने कहा था, और कर दिया। और तुम कहती हो सबूत दो?"
"हाँ, सबूत दो।" वो आगे बढ़ी। "क्योंकि चक्की टूटने से भैरव जेल नहीं जाएगा। तुम्हारा गुस्सा उसे जेल नहीं पहुँचाएगा। तुम्हारा भागना उसे और मज़बूत करेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी छाती धक-धक कर रही थी। हाथ काँप रहे थे। और कहीं अंदर एक आवाज़ कह रही थी — ये सही कह रही है। पर गुस्सा सुनता कहाँ है?
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