Spirit of a Fighter60 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 60

7 min read November 5, 2026

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर। सच्चा डर।

"तो तेरे हाथ में क्या है?" उन्होंने पूछा।

"कुछ नहीं, काका। बस मैं।"

"नहीं," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे हाथ में वो है जो उसके पास नहीं है। उसके पास पैसा है, आदमी हैं, पुलिस है। पर उसके पास मिट्टी नहीं है।"

मैंने चारों तरफ़ देखा। कालू काका ने लालटेन जलाई। रोशनी गरम थी, पीली।

"कुछ तो है," मैंने कहा, "जो उसे अंधा बना रहा है। वो गाँव को खौफ में रखता है, पर खुद भी डरा हुआ है।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें जल रही थीं — लालटेन की वजह से नहीं।

"क्योंकि वो जानता है," उन्होंने धीरे से कहा, "कि एक दिन कोई आएगा जिसके पास वो होगा जो उसने बीस साल पहले मिट्टी में दबा दिया था। और वो कोई तू है, वीर। तू ही है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मेरा गला सूख गया।

"काका, आप क्या कह रहे हैं?"

"मैं वो कह रहा हूँ जो मैंने बीस साल पहले देखा था और बोलने की हिम्मत नहीं की।" उन्होंने लालटेन उठाई। "अब चल। वक़्त कम है। आज रात तू वो देखेगा जो किसी ने नहीं देखा।"

मैं उनके पीछे चला।

हम अखाड़े के पीछे से गए। ऊँची मिट्टी की दीवार थी, उसके पीछे पुराना नीम। कालू काका ने पेड़ के तने पर हाथ रखा, और फिर उसकी जड़ों के बीच से एक ईंट उठाई।

नीचे अँधेरा था। फिर एक पत्थर की सीढ़ी दिखी, नीचे जाती हुई।

"काका," मैंने धीरे से कहा, "ये वही रास्ता है?"

"हाँ।" उन्होंने लालटेन मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पहले तू। मैं पीछे।"

"क्यों पहले मैं?"

"क्योंकि तेरी नाक तेज़ है," उन्होंने कहा। "अगर नीचे कोई है, तो तुझे पहले पता चलेगा।"

मैंने लालटेन ली। सीढ़ियाँ उतरने लगा।

नीचे की हवा अलग थी। ठंडी, गीली, और मिट्टी की गंध से भरी। पर उस गंध में कुछ और था — जला हुआ तेल, पुराना काग़ज़, और… दालचीनी। कोई मसाला। जैसे किसी ने यहाँ खाना बनाया हो।

मैं चौथी सीढ़ी पर रुका।

"काका।"

"क्या?"

"नीचे कोई है।"

कालू काका मेरे पीछे रुक गए। उनकी साँस भारी थी।

"कैसे पता?"

मैंने गहरी साँस ली। मैंने आँखें बंद कीं। और फिर मैंने सुना — नीचे से किसी के सिसकने की आवाज़। कोई औरत थी। या शायद कोई बच्चा। रो रहा था। धीरे-धीरे।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

"काका," मैंने कहा, "नीचे कोई रो रहा है।"

कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ काँप रही थी।

"वीर," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने तुझे बीस साल पहले की एक बात नहीं बताई।"

मैं पलटा। लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा भूत जैसा लग रहा था।

"क्या?"

"उस रात जब भैरव ने रघुवीर को कुएँ में गिराया था," उनका गला भर आया, "तो रघुवीर अकेले नहीं थे। उसके साथ उसकी औरत थी। तेरी असली माँ।"

मेरे हाथ से लालटेन फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ा।

"क्या?"

"भैरव ने उसे भी नीचे गिरा दिया था। उसने सोचा दोनों मर गए। पर फिर उसे पता चला कि तेरी माँ ज़िंदा है। तो उसने उसे कुएँ से निकालकर तहखाने में बंद कर दिया।"

मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया।

"आप कह रहे हैं कि मेरी असली माँ…"

"वो अब भी यहाँ है," कालू काका ने कहा। "बीस साल से। अंधेरे में। भैरव उसे कभी-कभी खाना देता है। और वो रोती रहती है। मैंने उसे सुना है। रोज़ रात। मैंने भैरव से कभी नहीं कहा। मैं डर गया था। बीस साल से मैं डरा हुआ हूँ।"

मैं सीढ़ियों पर बैठ गया। मेरे पैर काँप रहे थे।

"तो वो… जो सरस्वती माँ हैं…"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।

"उसने तुझे पाला। उसने तुझे अपना बेटा बनाया। वो तेरी माँ है, वीर। सरस्वती तेरी माँ है। पर जो नीचे है… वो तुझे जन्म दिया है।"

नीचे से रोने की आवाज़ फिर आई। इस बार साफ़। किसी औरत का रोना। दबा हुआ। जैसे किसी ने हाथ मुँह पर रखा हो।

मैं उठ खड़ा हुआ।

"मैं नीचे जा रहा हूँ।"

"वीर—"

"काका," मैंने पलटकर कहा, "ये बात किसी को मत बताना। माँ को भी नहीं। अभी नहीं।"

"पर—"

"काका, प्लीज।" मेरी आवाज़ काँप रही थी। "अगर माँ को पता चला कि मैंने उनसे छुपाया, तो वो टूट जाएँगी। और कल सुबह मुझे लड़ना है। आज रात मैं और कुछ नहीं सोच सकता।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने सिर हिलाया।

"ठीक है। पर एक बात।"

"क्या?"

"जो नीचे है, वो तेरी माँ है। चाहे वो तुझे न पहचाने। चाहे वो बीस साल से अंधेरे में हो। उसके पास जाना। उससे बात करना। और वीर—"

"क्या?"

"उससे कहना कि तेरे पापा ने उसे भुलाया नहीं था। उसने आख़िरी साँस तक उसका नाम लिया था।"

मेरी आँखें भर आईं।

मैं सीढ़ियाँ उतरने लगा। लालटेन हाथ में थी, पर मेरे हाथ काँप रहे थे। मैं नीचे पहुँचा।

सामने एक भारी लोहे का दरवाज़ा था, जंग लगा। उस पर बड़ा सा ताला। पर ताला खुला था। कोई पहले से खोलकर गया था।

रोने की आवाज़ साफ़ आ रही थी। दरवाज़े के पीछे से।

मैंने दरवाज़ा धकेला। वो चरमराया और खुल गया।

अंदर एक छोटा कमरा था। दीवार पर एक मिट्टी का दीया जल रहा था। कोने में एक चारपाई थी, जिस पर एक औरत बैठी थी। उसके बाल सफ़ेद, बिखरे हुए। कपड़े पुराने, फटे। हाथ में एक टूटा हुआ कंगन।

वो रो रही थी। धीरे-धीरे।

मैंने लालटेन ऊपर उठाई।

"कौन?" वो बोली, और सिर उठाया।

उसकी आँखें मुझ पर टिकीं। वो सूनी थीं। जैसे किसी ने उनमें से सब कुछ निकाल लिया हो।

फिर वो जम गईं।

"रघुवीर?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे सालों से इस्तेमाल न हुई हो।

मेरा गला भर आया।

"नहीं," मैंने धीरे से कहा। "मैं… मैं उसका बेटा हूँ।"

वो एक पल चुप रही। फिर उसने हाथ आगे बढ़ाया।

"मेरे पास आ," वो बोली।

मैं उसके पास गया। घुटनों के बल बैठ गया।

उसने मेरा चेहरा छुआ। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, सूखी। वो मेरे माथे पर फिरीं, आँखों पर, होठों पर।

फिर उसकी आँखों में पानी आया।

"तेरी नाक," उसने धीरे से कहा, "तेरी नाक वैसी है।"

"कैसी?"

"तेज़।" उसने कहा, और पहली बार मुस्कुराई। "मैंने तुझे जन्म देते वक़्त सूँघा था। तू रो रहा था, और तेरी नाक हिल रही थी। मैंने सोचा — ये बड़ा होकर हमारे जैसा होगा।"

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने उन्हें रोका नहीं।

"माँ," मैंने कहा।

वो एक पल रुकी। फिर उसने मेरा सिर अपनी छाती से लगा लिया।

"बेटा," वो बोली। और उसकी आवाज़ में वो सब था जो बीस साल में कभी नहीं कहा गया था।

हम वैसे ही बैठे रहे। मुझे पता नहीं कितनी देर। लालटेन धीमी हो रही थी। दीये की लौ काँप रही थी।

फिर वो बोलीं, मेरे बालों में हाथ फिराते हुए, "तू बड़ा हो गया।"

"हाँ।"

"तेरे पापा?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो सवाल था जिसका जवाब मैं दे नहीं सकता था।

"वो नहीं हैं, माँ।"

उनका हाथ रुक गया।

"कब?"

"बीस साल पहले।"

वो चुप बैठी रहीं। फिर बोलीं, "मुझे पता था। मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी। उस रात। वो चिल्ला रहा था। मेरा नाम। फिर सब चुप हो गया।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ पतली थीं, हड्डियाँ उभरी हुईं।

"माँ, मुझे आज रात जाना है। कल सुबह मेरा मुकाबला है।"

"किससे?"

"भैरव से।"

वो जम गईं।

"नहीं," वो बोलीं, और उनकी आवाज़ में डर आ गया। "नहीं, बेटा, तू उससे मत लड़। वो… वो आदमी नहीं है। वो शैतान है। उसने मुझे बीस साल यहाँ रखा। उसने तेरे पापा को…"

"माँ," मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा। "मैं उससे लड़ूँगा। और मैं जीतूँगा।"

"कैसे?"

"क्योंकि मेरे पास वो है जो उसके पास नहीं है।" मैंने कहा। "मेरे पास आप हैं।"

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