Spirit of a Fighter606 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 606

7 min read November 5, 2026

माँ ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया। और इस बार उन्होंने अपना रोना नहीं रोका।

मैं वहीं, मिट्टी में, बैठ गया।

और मुझे लगा कि ये रात अभी ख़त्म नहीं हुई है।

॥

मैं मिट्टी में बैठा था। मेरे नीचे की ज़मीन ठंडी थी, और मेरे पैरों की उँगलियों में धूल भर रही थी।

माँ का रोना धीरे-धीरे बंद हुआ। उन्होंने हाथ मुँह से हटाए, और उनकी आँखें दीनू पर टिक गईं। दीनू ने अपनी लाठी मज़बूती से पकड़ी और मेरी तरफ़ देखा।

"तू पूछ," उसने कहा। "जो पूछना है, पूछ ले।"

मैं उठा। मेरे घुटनों में दर्द था, पर मैंने उसे महसूस नहीं किया। मैंने दीनू के सामने चटाई पर बैठकर अपने दोनों हाथ उसके घुटनों पर रखे।

"शेर सिंह," मैंने कहा। "मेरे पापा। वो कौन थे?"

दीनू ने एक लंबी साँस ली। दीये की लौ उसके चेहरे पर काँप रही थी। उसकी आँखों में वो पुरानी बात घूम रही थी जो बीस साल से उसके अंदर बंद थी।

"तेरे पापा," उसने कहा, "अखाड़े के मालिक थे।"

मैं चुप रहा। माँ ने दीवार का सहारा छोड़ दिया और वहीं ज़मीन पर बैठ गईं। गुड़िया दरवाज़े से अंदर आ गई और माँ के पास बैठ गई। टिंकू दरवाज़े पर ही खड़ा रहा, हिलता नहीं।

"रणवीर अखाड़े के मालिक नहीं थे?" मैंने पूछा।

"नहीं।" दीनू ने सिर हिलाया। "रणवीर उस वक़्त नौजवान पहलवान थे। बड़े पहलवान। अखाड़े के सबसे मज़बूत हाथ। पर अखाड़ा तेरे पापा का था। शेर सिंह का। वो आदमी जो मुझे अखाड़े में लाया था। जिसने मुझे पहली बार मिट्टी में उतारा था।"

उसकी आवाज़ भारी हो गई।

"पर शेर सिंह," उसने कहा, "पहलवान नहीं था। वो मालिक था। मालिक वो होता है जो पैसा गिनता है, मिट्टी से नहीं, तराज़ू से। तेरे पापा मिले हुए जीत के पैसे खाते थे। जो पहलवान जीतता, उसके इनाम का बड़ा हिस्सा उनकी जेब में जाता। और जो हारता, उसका हिसाब भी वही लिखते।"

मेरे हाथ दीनू के घुटनों पर से खिसक गए।

"पर गाँव में उनका नाम था," दीनू ने कहा। "लोग कहते — शेर सिंह का अखाड़ा। शेर सिंह की मिट्टी। कोई उनके सामने आवाज़ नहीं उठाता था।"

"और माधव सिंह?" मैंने पूछा।

दीनू ने अपने होंठ भींचे। उसके जबड़े की हड्डी बाहर उभर आई।

"माधव सिंह उस वक़्त ठेकेदार था। छोटा ठेकेदार। अखाड़े के बाहर के मुकाबले जुटाता था। बाहर के पहलवान लाता था — दूसरे गाँवों से, दूर के शहरों से। उनसे लड़वाता और उनके पैसे में से अपना हिस्सा रखता। वो तेरे पापा के साथ काम करता था, पर उसकी नज़र हमेशा अखाड़े पर थी।"

दीनू ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और उस पर दोनों हाथ रखकर झुक गया।

"और रघुवीर?"

"रघुवीर अखाड़े का मुंशी था। हिसाब रखता था। और भैरव…" वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा। "भैरव उस वक़्त सिर्फ़ एक लड़का था। पंद्रह साल का। अखाड़े में झाड़ू लगाता, पानी भरता, मिट्टी सींचता। सब उसे 'छोटा मोहन' कहते थे।"

"मोहन," मैंने धीरे से दोहराया।

"हाँ। माधव सिंह का बेटा। पर उसे अखाड़े में कोई नहीं जानता था। माधव ने उसे शेर सिंह के पास नौकरी पर रखवा दिया था — कहा कि ये अनाथ है, बेचारा, काम सीख लेगा।"

मैंने अपनी आँखें मींच लीं। मेरे पीछे माँ की साँस सुनाई दी। धीमी, भारी।

"तो भैरव बचपन से ही मेरे पापा के पास था," मैंने कहा। "मेरे पापा की रोटी खाता था।"

"और उसी रोटी का ज़हर बन गया," दीनू ने कहा।

कमरे में सन्नाटा गहरा हो गया। दीये की लौ स्थिर थी, पर हवा का झोंका आया और वो एक तरफ़ झुक गई। टिंकू ने दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया।

"पर वो बोतल," मैंने कहा। "पहली बोतल। जिसमें भैरव की उँगली थी।"

दीनू ने अपना सिर उठाया।

"वो बोतल शेर सिंह ने बनाई थी।"

मैं हिल गया।

"क्या?"

"तेरे पापा ने," दीनू ने कहा, और उसकी आवाज़ में ज़रा भी हिचक नहीं थी। "शेर सिंह ने। अखाड़े में पैसा कमाने का एक नया तरीका ढूँढा गया था। बाहर के पहलवान जो आते, वो हमारे पहलवानों से कमज़ोर होते। उन्हें जीतने का मौका नहीं मिलता। तो शेर सिंह ने सोचा — क्यों न ऐसा पानी बनाया जाए जिससे हमारा पहलवान एक दिन में दुगना ताकतवर लगे।"

"दुगना ताकतवर," मैंने दोहराया। मेरे मुँह में कड़वाहट आ गई।

"पर वो पानी," दीनू ने कहा, "सिर्फ़ एक दिन का था। दो दिन में आदमी की हड्डियाँ जवाब देने लगतीं। तीन दिन में बुखार। चार दिन में…" उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। "चार दिन में अखाड़े का पहलवान खाट पर।"

माँ ने अपना मुँह खोला। पहली बार उन्होंने कुछ कहा।

"तो तुम सब जानते थे," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कोई बहुत देर से बोल रहा हो। "तुम सब देख रहे थे और चुप थे।"

दीनू ने सिर झुका लिया।

"हाँ," उसने कहा। "मैं जानता था। मैं उस बोतल को बनते हुए देखता था। शेर सिंह रातों को रघुवीर के कमरे में बैठकर पत्ते पकाते थे, और मैं बाहर दरवाज़े पर पहरा देता था। मुझे बीस रुपये महीने मिलते थे।"

दीनू ने अपनी आँखें खोलीं। उनमें पानी था।

"और तेरे पापा के हाथ," उसने कहा, "उस पानी के असर से हिलने लगे थे। उनकी अपनी बोतल। उनका अपना ज़हर। वो खुद पीने लगे थे — एक घूँट, दो घूँट। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की। एक बार मैंने बोतल उनके हाथ से छीनकर फेंक दी। उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा। कहा — 'मैं अपने ही ज़हर से नहीं मरूँगा, मैं तो उसका मालिक हूँ।'"

दीनू की आवाज़ काँपी।

"और एक दिन," उसने कहा, "वो उसी ज़हर से मरे।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी नज़र उसके होंठों पर टिकी थी। वो कुछ कहने से डर रहा था।

"पर कैसे?" मैंने पूछा। "अगर वो खुद पी रहे थे, तो उन्हें पता था।"

दीनू ने अपना हाथ उठाया और अपना मुँह पोंछा। उसने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने उसकी नज़र पकड़ ली, और मैंने देखा कि माँ की आँखों में कुछ अलग था — डर नहीं, एक अजीब-सी शांति।

"माँ," मैंने कहा। "तुम जानती हो?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने अपना हाथ गुड़िया के सिर पर रखा और उसे अपने से चिपका लिया।

"दीनू," माँ ने कहा, पर उनकी आवाज़ दीनू से नहीं, मुझसे थी। "तू जो बोलने आया है, वो बोल दे। देर मत कर। ये लड़का बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"

दीनू ने गहरी साँस ली।

"तेरे पापा शेर सिंह," उसने शुरू किया, "उस वक़्त अखाड़े के सबसे बड़े आदमी थे। उनके पास सब कुछ था — अखाड़ा, पैसा, रौब। पर उनके पास एक चीज़ नहीं थी।"

"क्या?"

"एक ऐसा बेटा जो उनके नाम को आगे बढ़ा सके।"

मैं सन्न रह गया।

"उनकी कोई औलाद नहीं थी?" टिंकू ने दरवाज़े से पूछा। पहली बार उसने कुछ कहा।

दीनू ने सिर हिलाया।

"नहीं। दस साल शादी के बाद भी कोई बच्चा नहीं हुआ। तेरे पापा ये बात सबसे ज़्यादा परेशान करती थी। वो मंदिरों में जाते, साधुओं के पास जाते, हवन करवाते। पर कुछ नहीं हुआ। और माधव सिंह…"

वो रुका। उसने अपनी लाठी को ज़मीन पर थपथपाया।

"माधव सिंह उस वक़्त तक अखाड़े में जड़ें जमा चुका था। उसके पास अपने आदमी थे। उसके पास अपना पैसा था। और उसके पास भैरव था — एक बेटा जो शेर सिंह के ही अखाड़े में झाड़ू लगाता था। शेर सिंह को ये बात खाती थी। वो जानते थे कि माधव किस दिन उनके अखाड़े को अपने बेटे के नाम कर देगा।"

दीनू ने अपनी आँखें मेरी आँखों में गड़ा दीं।

"तो एक दिन," उसने कहा, "शेर सिंह ने माधव सिंह को अखाड़े से बाहर कर दिया।"

"क्या?" मैंने कहा। "उन्होंने निकाल दिया?"

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