Spirit of a Fighter – Chapter 605
"हाँ," उसने कहा। "मैं भाग गया।"
"और मैं," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ अब काँपने लगी, "बीस साल तक तेरे पीछे नहीं आई। क्योंकि मैं जानती थी, अगर मैं आई, तो मुझे भी मार दिया जाएगा। और मेरे दो बच्चे थे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने दीनू की तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर दीनू की तरफ़। मेरे अंदर कुछ ऐसा टूट रहा था जिसे मैं नाम नहीं दे सकता था।
"तो मेरे पापा पहलवान थे," मैंने धीरे से कहा। "मेरे पापा की मुट्ठी में ताकत थी।" मेरी आवाज़ में कुछ अजीब था — न गुस्सा, न ग़म। एक अजीब-सी ख़ुशी जो गले में अटक रही थी। "और मुझे कोई बताता नहीं था।"
"मैंने तुझे बताया था," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में रोना था। "एक बार। जब तू पाँच साल का था। तूने पूछा था — "माँ, पापा कैसे थे?" और मैंने कहा था — "तेरे पापा के हाथों में मिट्टी की ताकत थी।" और तू बोला था — "तो मैं भी पहलवान बनूँगा।""
माँ ने अपनी आँखों की तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनकी आवाज़ नरम पड़ गई।
"और उस दिन मैंने अखाड़े के दरवाज़े पर एक कील ठोक दी थी। मन ही मन। कि मेरा बेटा वो नहीं भुगतेगा जो उसके पापा ने भुगता।"
"पर मैं रोज़ वहाँ खड़ा रहा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "पाँच साल से। हर सुबह, अखाड़े की दीवार के बाहर।"
"जानती हूँ," माँ ने कहा। "तू जब सो जाता था, तब मैं तेरी अलमारी में मिट्टी देखती थी। और मैं कुछ नहीं कहती थी। क्योंकि मैं जानती थी — जो मिट्टी खींचती है, उसे कोई रोक नहीं सकता।"
दीनू ने अचानक अपना सिर उठाया।
"अब सुन," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई सख़्ती आ गई थी। "जो मैंने अब तक कहा, वो सिर्फ़ आधा सच है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरा बाप जिस दिन मरा," दीनू ने कहा, "उस रात भैरव ने पहली बार किसी को ज़हर पिलाया था।"
मैं ठिठक गया।
"भैरव?" मैंने कहा। "भैरव तब… भैरव तो…"
"भैरव की उम्र सिर्फ़ सोलह साल थी," दीनू ने कहा।
कमरा ठंडा हो गया।
"माधव सिंह ने भैरव के हाथ से वो गिलास शेर सिंह को पिलाया था," दीनू ने कहा। "भैरव नहीं जानता था कि उस गिलास में क्या है। उसे कहा गया था — "जाकर शेरू काका को पानी पिला आ।" और भैरव ने पिलाया। और उस रात के बाद भैरव को खुद पता चला कि उसने अपने हाथों से क्या किया है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ की आँखें बंद थीं। उनके होंठ हिल रहे थे।
"और उस रात के बाद," दीनू ने कहा, "भैरव वो नहीं रहा जो पहले था।"
"तो भैरव को भी माधव ने इस्तेमाल किया?" मेरी आवाज़ में गुस्सा और कुछ और था। मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैं भैरव से नफ़रत करना चाहता था। पूरी तरह। पर सोलह साल का एक लड़का, जिसके हाथों में गिलास थमा दिया गया…
"हर ज़हर पीने वाला अपना ज़हर खुद नहीं चुनता," दीनू ने कहा। "कुछ को पिलाया जाता है।"
मैं चुप हो गया।
टिंकू ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"और माधव सिंह?"
दीनू ने उसकी तरफ़ देखा।
"माधव सिंह वो आदमी है," उसने कहा, "जो अपने हाथ साफ़ रखता है। हमेशा। उसने गिलास भैरव से पिलवाया। मिट्टी रघुवीर से दबवाई। और मौत का काग़ज़ हरनाम से लिखवाया। उसके हाथ कभी गंदे नहीं हुए।"
दीनू ने मेरी तरफ़ देखा।
"और आज," उसने कहा, "वो उसी पुरानी चाल से तुझे फँसाना चाहता था। सोने की चोरी का झूठा इल्ज़ाम। तेरी माँ को फँसाना। तेरे हाथों को गंदा करना। ताकि कल को कोई कहे — "देखो, वीर भी वही है।""
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरे अंदर सब कुछ घूम रहा था।
"एक बात और," दीनू ने कहा। "तेरे पापा ने मरने से पहले एक बात कही थी। मुझसे। उस रात। मैं कुएँ के पीछे छुपा था, और मैंने सुना — शेर सिंह मिट्टी में पड़े थे, और उन्होंने अपना हाथ उठाकर मिट्टी को छुआ, और धीरे से कहा — "मेरा बेटा… मेरा बेटा इस मिट्टी से बड़ा होगा।""
मेरी आँखें खुल गईं।
"और फिर," दीनू ने कहा, "माधव सिंह ने उनके मुँह पर मिट्टी डाल दी।"
मेरे हाथ अपने आप मिट्टी की तरफ़ बढ़ गए। मैंने फर्श की मिट्टी को छुआ। वो ठंडी थी, पर उसमें कुछ था। एक जानी-पहचानी गर्मी, जैसे किसी ने बहुत पहले यहाँ अपना हाथ रखा हो।
माँ ने अपनी आँखें खोलीं।
"अब तू जान गया," उन्होंने कहा। "अब तू जान गया कि मैंने क्यों कहा था — "तहखाना मत खोल।""
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि तू जानता था," मैंने कहा। "तू जानती थी कि अंदर सच है। और तू जानती थी कि अगर मैंने उसे खोला, तो सब कुछ बदल जाएगा।"
"सब कुछ बदल गया, बेटा," माँ ने कहा। "आज। इस मिट्टी में।"
दीनू ने अपनी लाठी उठाई। उसने चटाई से उठने की कोशिश की, पर उसके घुटने नहीं माने। मैंने अपना हाथ बढ़ाया। वो मेरे कंधे पर टेककर खड़ा हुआ। उसका शरीर हल्का था — हड्डियों का ढाँचा।
"मैं आज रात यहीं रुकूँगा," उसने कहा। "कल सुबह पंचायत के सामने मैं गवाही दूँगा। मैंने बीस साल चुप रहकर अपना हिसाब चुकाया है। अब मैं बोलूँगा।"
"पर एक बात," उसने कहा, और उसकी आँखें टिमटिमाईं। "माधव सिंह वो नहीं है जो आज मैदान में बैठा था। जब वो पुलिस के साथ गया, तो वो टूटा हुआ आदमी नहीं था। वो बस इंतज़ार कर रहा था।"
"किस बात का?"
"अगले कदम का," दीनू ने कहा। "माधव सिंह के पास हमेशा एक अगला कदम होता है। और आज रात, वो अपने आख़िरी कदम की तैयारी में है।"
कमरे में ठंडी हवा आई। दीये की लौ काँपी, और एक पल के लिए मुझे लगा कि वो बुझ जाएगी।
"तू क्या कह रहा है?" मैंने पूछा।
दीनू ने मेरी आँखों में देखा।
"तेरा बाप जिस रात मरा," उसने कहा, "उस रात माधव सिंह ने शेर सिंह के हाथ से एक चीज़ छीनी थी। वो चीज़ उसने अपने गले में डाल ली थी — एक छोटी सी पीतल की डिबिया, जो शेर सिंह अपने बेटे के लिए बनवा रहे थे। उस डिबिया पर लिखा था — "मेरे बेटे के हाथ के लिए।""
मेरी साँस रुक गई।
"और वो डिबिया," दीनू ने धीरे से कहा, "आज भी माधव सिंह के पास है। वो उसे अपनी जेब में रखता है। उसने बीस साल उसे पहना है। और आज रात, जब वो जेल की गाड़ी में बैठा, मैंने उसे उस डिबिया को अपने हाथ में घुमाते देखा।"
मैंने अपना हाथ दीवार पर टिकाया। मेरे पैर नहीं सँभल रहे थे।
"तो वो उसे अब भी पहने हुए है," मैंने कहा।
"हाँ," दीनू ने कहा। "और जब तक वो उसे पहने हुए है, तब तक तेरे बाप की आख़िरी निशानी उसके गले में लटक रही है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
माँ ने अपना हाथ दीवार पर रखा, और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। गुड़िया ने दरवाज़े की ओट से अपना सिर बाहर निकाला। टिंकू ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
"कल सुबह," मैंने कहा। "पंचायत में। मैं वो डिबिया लूँगा।"
"कल सुबह," दीनू ने कहा, "माधव सिंह अपना आख़िरी काग़ज़ खोलेगा। और वो काग़ज़ मेरे पास है।"
वो मुस्कुराया। पहली बार। और उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे ठंडा कर गया।
"बीस साल पहले," उसने कहा, "मैंने उस रात कुछ उठाया था। शेर सिंह की मिट्टी में से। एक काग़ज़ का टुकड़ा। जिस पर माधव सिंह का असली नाम लिखा था।"
"उसका असली नाम?" मैंने कहा। "माधव सिंह के अलावा?"
दीनू ने अपनी आँखें मींच लीं।
"उस काग़ज़ पर लिखा था — "रघुवीर का बाप।""
कमरा घूम गया।
"मतलब," मैंने धीरे से कहा, "माधव सिंह… माधव सिंह रघुवीर के बाप हैं? और भैरव के भी?"
दीनू ने अपनी आँखें खोलीं।
"और तेरे पापा के भी," उसने कहा। "माधव सिंह तीनों का बाप है।"
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