Spirit of a Fighter – Chapter 580
वो लंगड़ाती परछाई अंधेरे में घुल गई, पर उसका बोया हुआ खौफ हमारे साथ चलता रहा। हम शहर के ठाकुर महेंद्र सिंह के अखाड़े के फाटक पर खड़े थे। रात का अंधेरा इतना गाढ़ा था कि अपनी ही उँगलियाँ न दिखें, और फाटक पर मोटा लोहे का ताला लटक रहा था, जैसे किसी ने हमें बाहर ही रोक दिया हो।
मीरा का हाथ मेरी बाँह पर था, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“वो आदमी जो लंगड़ाकर भागा था,” उसने धीरे से कहा, आवाज़ में वो कंपन जो डर से आता है। “उसकी गंध तुमने ठाकुर का इत्र बताया था। मतलब ठाकुर ही हमारे पीछे-पीछे गाँव तक आया था।”
मैंने कंधे उचकाए। “इत्र की गंध शहर में हर दूसरे आदमी पर है, मैडम। यहाँ तो पानी में भी इत्र घोला जाता है।”
“मीरा कहो,” उसने झट से कहा। “कितनी बार कहूँ? मैडम सुनकर ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे दूर खड़ा कर रहे हो।”
मैं मुस्कुराया। अंधेरे में भी मुझे उसका गुस्सा महसूस हो रहा था, वो गुस्सा जो मुझे अच्छा लगता था, वो गुस्सा जिसमें परवाह छुपी होती थी।
“अच्छा, मीरा,” मैंने कहा। “पर एक बात सुन — अगर ठाकुर गाँव तक आया था, तो वो हमें यहाँ आने से रोक भी सकता था। उसने किया क्यों नहीं?”
मीरा चुप हो गई। उसने ताला देखा, फिर मेरी तरफ़।
“क्योंकि वो चाहता है कि तुम यहाँ आओ,” उसने कहा। “वो तुम्हें अपने मैदान में लड़ना चाहता है। जहाँ वो जानता है कि मिट्टी किसकी है।”
फाटक के पीछे से आवाज़ आई — मिट्टी पर पैरों की थाप, किसी के गिरने की आवाज़, और फिर एक गहरी आवाज़ जो गिनती कर रही थी। हमने दरार से झाँका। अंदर लालटेनों की पीली रोशनी में तीन पहलवान कुश्ती का अभ्यास कर रहे थे। उनके शरीर पर मिट्टी लिपी थी, पसीना चमक रहा था, और उनकी साँसें भाप बनकर हवा में उड़ रही थीं।
मैंने नाक से गहरी साँस खींची।
और मेरे भीतर कुछ जम गया।
“मीरा,” मैंने धीरे से कहा। “ये मिट्टी… ये अलग है।”
“कैसे अलग?”
मैंने ताला पकड़कर झुका और फाटक के नीचे से अपनी हथेली बढ़ाई। उँगलियों ने मिट्टी छुई। ठंडी थी, और नम, पर उसमें वो बात नहीं थी जो रणवीर अखाड़े की मिट्टी में थी। वो मिट्टी जब मैं छूता था तो लगता था कि कुछ जवाब दे रही है, जैसे कोई बूढ़ी माँ अपने बेटे का हाथ पकड़कर कहती हो — “आ जा, मैं यहीं हूँ।” लाल मिट्टी, ठस, जिसमें बीस साल का पसीना घुला था।
ये मिट्टी सूखी थी। मरी हुई। जैसे किसी ने उसकी साँस खींच ली हो और बदले में सिर्फ़ धूल छोड़ दी हो।
“ये मिट्टी रो रही है,” मैंने फुसफुसाया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरा चेहरा देखा और उसका हाथ मेरी बाँह से खिसककर मेरे कंधे पर आ गया।
“वीर, तुम्हारा चेहरा…”
“मैं ठीक हूँ,” मैंने कहा, पर आवाज़ मेरी नहीं थी। “बस… ये मिट्टी मुझसे कुछ कह रही है। जैसे कोई बंद कमरे में रो रहा हो और दरवाज़ा खुले ही न।”
मैंने अपनी हथेली मिट्टी पर रख दी। भीतर से एक ठंडक उठी, हड्डियों तक गई, और मेरी आँखें भर आईं। मैं नहीं जानता क्यों। मिट्टी के लिए कोई रोता है क्या? पर मैं रो रहा था। क्योंकि ये मिट्टी मेरी माँ जैसी थी — जिसने सब कुछ सहा और किसी को कुछ नहीं बताया।
“इस अखाड़े में कोई सच्चा पहलवान नहीं है,” मैंने कहा, आवाज़ भारी। “जो भी यहाँ पसीना डाल रहा है, वो इस मिट्टी को ताकत नहीं दे रहा। ये मिट्टी उनसे ताकत माँग रही है और उनके पास देने को कुछ नहीं है।”
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और मिट्टी से उठाया। उसने मेरी हथेली पर पड़ी धूल झाड़ी, फिर उसे अपने दोनों हाथों में लिया।
“तो हम इस मिट्टी को क्या देंगे?” उसने पूछा।
“सच,” मैंने कहा। “बस सच।”
तभी पीछे से लालटेन की रोशनी आई। पीली, काँपती हुई, जैसे वो खुद भी डर रही हो। हम पलटे।
एक आदमी आ रहा था — दुबला, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लालटेन। उसके चेहरे पर वो हँसी थी जो अमीरों के नौकरों के चेहरे पर होती है, और वो हँसी सच्ची नहीं होती।
“दामाद जी,” उसने कहा, आवाज़ में शहद घोला हुआ। “ठाकुर आपको अंदर बुला रहे हैं।”
“दामाद जी?” मैंने कहा। “मैं तुम्हारा दामाद नहीं हूँ, भाई।”
“अभी नहीं,” उसने कहा, और उसकी हँसी थोड़ी और फैल गई। “पर ठाकुर जो कहें, वो कल हो जाता है।”
वो आगे बढ़ा और ताले की चाबी निकाली। ताला खुला, फाटक खुला, और मुझे अंदर से वो गंध आई जो मैंने रात को भागती परछाई में सूँघी थी — चंदन, केसर, और पुराना तेल। मेरी नाक सिकुड़ी। ये गंध किसी की भी हो सकती थी, पर किसी अपने की नहीं।
वो आदमी मुड़ा और जाने लगा, फिर रुक गया, जैसे उसे कुछ याद आया हो।
“और हाँ, दामाद जी,” उसने कंधे के ऊपर से कहा। “वो आदमी जो भागा था — वो ठाकुर का आदमी नहीं था। वो तो आपके घर का है।”
मेरे पैर जम गए।
“घर का?” मैंने कहा। आवाज़ मेरी थी पर दूर से आ रही थी।
“हाँ,” उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में हँसी नहीं थी। “ठाकुर ने खुद देखा। उसने कहा — ‘ये तो उसी के घर की गंध है।’”
वो चला गया, और उसकी लालटेन की रोशनी अंधेरे में पिघल गई।
मैं फाटक पर खड़ा रह गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो मेरे भीतर भी कुलबुला रहा था। मेरे घर का? मेरे घर में कौन है जो लंगड़ाकर चलता है और जिसकी गंध में ठाकुर का इत्र और चंदन घुला है?
अमर। भाई। वो लंगड़ा था। पर उसका पैर तो ठीक हो गया था — ठाकुर ने इलाज करवाया था। तो फिर…
“वीर,” मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया। “अंदर चलो। अगर ठाकुर हमें बुला रहा है, तो हमें जाना चाहिए। पर एक बात याद रखना — जो भी हो, हम साथ हैं।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ गई। मैं उसके पीछे चला।
अखाड़े के अंदर घुसते ही मुझे तीन चीज़ें एक साथ महसूस हुईं — मिट्टी की सूखी गंध, तेल की बदबू, और चंदन का धुआँ जो किसी कोने से उठ रहा था। दीवार पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें टँगी थीं — पहलवानों की, जिनके शरीर पत्थर जैसे कटे थे। मैंने उन्हें देखा और मेरा दिल भारी हो गया। ये चेहरे मुस्कुरा रहे थे, पर इनकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो जीतने वाले की आँखों में होती है। ये लोग हार गए थे, और कोई उन्हें जीतता हुआ दिखाना चाहता था।
मैदान के बीच में एक ऊँची कुर्सी थी, और उस पर ठाकुर महेंद्र सिंह बैठे थे। साठ-पैंसठ साल के आस-पास, बड़ा शरीर, सफ़ेद बाल जो तेल से चिपके थे, और एक सफ़ेद शेरवानी जिस पर सोने के तार की कढ़ाई थी। उनके हाथ में एक मोटी लाठी थी जिसके सिरे पर चाँदी का शेर बना था।
उनके पीछे दो आदमी खड़े थे। एक पतला, चश्मे वाला, जिसके हाथ में फ़ाइलें थीं। मैंने उसकी गंध ली — स्याही, काग़ज़, और घबराहट का पसीना। वो हरनाम जैसा था, पर हरनाम नहीं था। दूसरा मोटा, गोरा, जिसके कंधे पर एक डंडा था।
ठाकुर ने हमें देखा और मुस्कुराए। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे कोई बच्चा मिठाई देखकर मुस्कुराता है।
“आ गए,” उन्होंने कहा। आवाज़ गहरी थी, गरजती हुई, जैसे दूर से बादल बोल रहे हों। “आओ, बैठो। मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”
“मैं खड़ा ठीक हूँ, ठाकुर साहब,” मैंने कहा।
“अच्छा,” उन्होंने कहा, और उनकी आँखें मीरा पर गईं। “और ये मीरा? रणवीर की बेटी? बिलकुल अपने बाप पर गई है। वही ज़िद, वही आँखें।”
मीरा ने सिर ऊँचा किया। “आपने मेरे पिता को उठवाया क्यों?”
ठाकुर हँसे। हँसी छोटी थी, पर उसके पीछे कुछ भारी था।
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