Spirit of a Fighter58 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 58

7 min read November 5, 2026

"कल सुबह तक सबको अपने-अपने घर में होना चाहिए। रात को कोई बाहर नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अगर किसी का घर खाली मिला, तो समझो वो डरकर भाग गया।"

भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी ठंडी थी, पर मेरे भीतर कुछ गरम था।

कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने धीरे से कहा, "वो कल सुबह तक तुझे सोने नहीं देगा।"

"मुझे पता है।"

"तो क्या करेगा?"

मैंने दीवार के उस पार देखा — जहाँ मेरा घर था, जहाँ माँ चूल्हा जला रही होंगी, जहाँ गुड़िया अपनी नई कॉपी पर कुछ लिख रही होगी।

"आज रात," मैंने कहा, "हम वो करेंगे जो उसने सोचा भी नहीं होगा।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हिली।

"तहखाना?" उन्होंने धीरे से पूछा।

मैंने सिर हिलाया।

कालू काका ने एक बार चारों तरफ़ देखा, फिर मेरे कान के पास झुककर कहा, "फिर आज रात, जब गाँव सो जाए, तू नीम के पेड़ के पास आ जाना। मैं तेरा इंतज़ार करूँगा। और वीर—"

"क्या?"

उनकी आँखें भर आईं। "आज रात के बाद अगर हम निकले, तो ये अखाड़ा फिर कभी वैसा नहीं होगा।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हड्डियाँ पतली थीं, पर पकड़ मज़बूत थी।

"काका," मैंने कहा, "ये अखाड़ा वैसा कभी था भी नहीं। जो हम बनाएँगे, वो होगा।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले भी देखी थी — जब वो कहते थे "तेरी आँखें वैसी हैं।"

वो कुछ नहीं बोले। बस मेरा कंधा थपथपाया और मिट्टी सींचने चले गए।

मैं घर की तरफ़ चला।

रास्ते में मैंने अपनी हथेली खोली। राख अब हवा में उड़ चुकी थी, सिर्फ़ लाल निशान बचा था। घाव अब भी वहीं था, पर माँ की फूँक अब भी अंदर कहीं ठंडी लग रही थी।

मैंने मुट्ठी बाँधी।

आज रात। नीम का पेड़। और फिर वो सच जो बीस साल से मिट्टी के नीचे दबा हुआ था।

घर पहुँचते ही गुड़िया दौड़कर आई। उसने मेरी कमीज़ पकड़ी और फुसफुसाकर कहा —

"भैया, सुक्खी बुआ ने आकर माँ को कुछ बताया। माँ ने चूल्हे में रोटी रखी और फिर निकालकर फेंक दी।"

"क्या बताया?"

"पता नहीं।" उसकी आँखें बड़ी थीं। "पर माँ ने मुझसे आज रात उनके साथ सोने को कहा है।"

मेरा दिल धक से रह गया।

"क्यों?"

गुड़िया ने अपना होंठ काटा। "माँ ने कहा — आज रात घर में कोई अकेला नहीं सोएगा।"

॥

आज रात घर में कोई अकेला नहीं सोएगा।

गुड़िया के ये शब्द सुनकर मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, आग की रोशनी उनके चेहरे पर नाच रही थी, पर उनकी आँखें कहीं और थीं। मैं उनके पास बैठ गया। मैंने कुछ नहीं पूछा। जब माँ खुद न बोलें, तो पूछना बेकार होता है।

थोड़ी देर बाद वो बोलीं, आग में लकड़ी डालते हुए, "सुक्खी ने बताया कि भैरव ने आज दिन में गाँव के पाँच आदमियों को बुलाया था। उनसे कहा कि रात को हर गली में नज़र रखें। किसी के घर से कोई निकला, तो उसे बताएँ।"

मैंने रोटी तोड़ी। भूख नहीं थी, पर हाथ चलते रहे।

"माँ, आज रात मुझे जाना है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। चूल्हे की लौ उनकी आँखों में जल रही थी।

"जानती हूँ," वो बोलीं, और फिर रोटी पकड़ाकर गुड़िया को दे दी। "मैंने आज शाम चक्की नहीं चलाई।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि आज सुबह चक्की का पाट अटक गया।" उन्होंने धीरे से कहा। "बीस साल में पहली बार। मैंने हाथ लगाया, तो अंदर से मिट्टी निकली। लाल मिट्टी। जैसे किसी ने जान-बूझकर पाट के नीचे डाली हो।"

गुड़िया ने रोटी नीचे रख दी। "माँ, मैंने किसी को आते नहीं देखा।"

"नहीं देखा तूने," माँ ने उसका सिर सहलाया। "क्योंकि वो सुबह आया, जब तू स्कूल गई थी और मैं पीछे कुएँ की तरफ़ गई थी।"

मेरी मुट्ठी खुद-ब-खुद बंध गई। मैं उठा, दरवाज़े के पास गया, और बाहर झाँका। गली खाली थी, पर मुझे पता था — खाली नहीं थी। अँधेरे में कोई खड़ा था। मुझे उसकी गंध आ रही थी। पसीने में घुली तेल की गंध। भैरव के आदमी।

मैंने दरवाज़ा बंद किया और अंदर से कुंडी लगा दी।

"आज रात मत जा," माँ ने कहा। न वो रोईं, न आवाज़ ऊँची की। बस इतना कहा।

"कालू काका इंतज़ार कर रहे होंगे।"

"कालू काका सत्तर साल के हैं। वो अपने डर के साथ जिए हैं। तुझे उनके डर में मत उलझा।"

मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मेरा सिर उनके घुटने पर रख दिया। उनका हाथ मेरे बालों में फिरा। उनकी हथेली पर चक्की का मोटा निशान था, गरम था।

"माँ, कल सुबह भैरव मुझे अखाड़े में उतारेगा। मैं अभी तैयार नहीं हूँ। मुझे वो मिट्टी चाहिए जो उसने छुपाई है। वरना वो मुझे पहले ही दाँव में गिरा देगा।"

माँ ने मेरा सिर उठाया, दोनों हाथों से मेरा चेहरा पकड़ा।

"तो जा," वो बोलीं। "पर एक बात सुन।"

"क्या?"

"जो मिट्टी तू उठाएगा, वो तेरी है। उससे तू ताकत लेगा, उससे तू किसी को मारेगा नहीं। अगर तेरे दिल में बदला होगा, तो वो मिट्टी तेरे हाथ में राख हो जाएगी।"

मैंने सिर हिलाया।

गुड़िया ने मेरी कलाई पकड़ी। "भैया, मैं भी चलूँगी।"

"नहीं।"

"मैं दरवाज़े पर खड़ी रहूँगी। अगर कोई आया, तो ज़ोर से गाऊँगी। गाँव वाले जाग जाएँगे।"

मैंने उसका सिर सहलाया। मेरी छोटी बहन बारह साल की थी, पर आज उसकी आवाज़ में बीस साल की समझ थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "घर के अंदर से दरवाज़ा बंद रखना। माँ के साथ सोना। और गुड़िया —"

"क्या?"

"जो मैंने कहा, वही करना। बहादुरी दिखाने की कोशिश मत करना।"

उसने होंठ काटे, पर सिर हिला दिया।

रात के ग्यारह बजे थे जब मैंने दरवाज़ा खोला। गली में सन्नाटा था। नीम के पेड़ की पत्तियाँ भी नहीं हिल रही थीं। मैंने चारों तरफ़ सूँघा। हवा में धुएँ की गंध थी, हल्की, दूर से आती हुई। जैसे किसी ने अभी-अभी कोई चीज़ जलाई हो।

मैं दबे पाँव निकला। दस कदम चला था कि पीछे से आवाज़ आई —

"वीर सिंह।"

मैं जम गया।

आवाज़ भैरव की थी। मैंने पलटकर देखा।

वो मेरी गली के मोड़ पर खड़ा था। साथ में चार आदमी, हाथों में लाठियाँ। उसके हाथ में लालटेन थी, और उसके पीछे — मेरे घर का दरवाज़ा। मैं जहाँ खड़ा था, वहाँ से घर दिख रहा था। दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं।

मैंने कदम पीछे किए। भैरव मुस्कुराया।

"मैं तुझसे मिलने आया था," उसने कहा, आवाज़ में वो मिठास जो किसी और दिन दिल को छू लेती, "पर तू तो खुद चल पड़ा। कहाँ जा रहा है इतनी रात?"

"हवा खाने।"

"हवा खाने?" उसने अपने आदमियों की तरफ़ देखा और हँसा। "सुनो, ये हवा खाने गया है। इतनी रात को।"

आदमी हँसे। उनकी हँसी सूखी थी।

"घर लौट जा," भैरव ने कहा। "कल सुबह मैदान में मिल। वहाँ जो होगा, सबके सामने होगा। रात में चोर की तरह घूमने वाले पहलवान मुझे पसंद नहीं।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के चौखट पर खड़ी थीं, साड़ी का पल्लू कंधे पर, हाथ जोड़े हुए।

वो बोलीं, "बेटा बीमार है, सर।"

उनकी आवाज़ में कोई डर नहीं था। बस एक माँ की थकान थी।

भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो शिकार देखकर आती है।

"मैं तो दवा लाया हूँ," उसने कहा, और अपनी धोती से एक गिलास निकाला। "इस गाँव का पानी बहुत बढ़िया है। मैं सोचता हूँ, सबको पीना चाहिए।"

वो मेरी तरफ़ बढ़ा। गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ले। पी ले। तूने कल सबके सामने मेरा पानी ठुकराया। मैंने बुरा नहीं माना। पर आज मैं तेरे घर के बाहर खड़ा हूँ। अब तो पी ले।"

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