Spirit of a Fighter – Chapter 57
भीड़ में हल्की सरसराहट हुई।
"मैंने इसीलिए आज सबको बुलाया है," भैरव ने कहा। "क्योंकि मैं चाहता हूँ कि आज हर आदमी खुद देख ले — इस अखाड़े में कौन है और कौन बाहर वाला है।"
उसने धीरे-धीरे सबकी आँखों में देखना शुरू किया। मेरी तरफ़ आया, तो रुका। एक पल के लिए रुका, बस एक पल, और उस पल में उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो भीड़ को नहीं दिखा। सिर्फ़ मुझे दिखा।
"वीर सिंह," उसने कहा, आवाज़ में वो मिठास जो चाकू पर शहद जैसी होती है। "तेरा हाथ कैसा है?"
भीड़ मेरी तरफ़ देखने लगी।
"ठीक है," मैंने कहा।
"गिर गया था?" उसने मुस्कुराकर पूछा।
"हाँ।"
"अच्छा।" वो मुड़ा और भीड़ की तरफ़ देखा। "बड़ी अजीब बात है ना? रात को अखाड़े में कोई घुसता है, और सुबह वीर सिंह का हाथ कटा हुआ मिलता है।"
भीड़ में से कोई बोला, "तो क्या हुआ? वो गिर भी तो सकता है।"
"गिर भी सकता है," भैरव ने सहमति जताई। "पर मैंने सुना है कि वो रात को घर में नहीं था।"
अब सारी आँखें मुझ पर थीं।
मेरी माँ की बात याद आई — अब सबके सामने होगा। भैरव ने मुझे सबके सामने पकड़ने की कोशिश की थी। और मैं जानता था कि अगर मैं झुका, तो वो मुझे हमेशा के लिए झुका देगा।
"नहीं था," मैंने कहा।
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"मैं रात को घर में नहीं था," मैंने दोहराया। "मैं अखाड़े के पीछे था।"
भैरव की आँखें सिकुड़ीं। उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं सीधे कबूल करूँगा।
"तो तू घुसा था," लुट्टन तुरंत बोला। "सर, यही है वो। इसी ने—"
"मैं घुसा था," मैंने कहा। "पर उस जगह, जहाँ तूने सीढ़ियाँ तुड़वाई थीं, भैरव सिंह।"
भीड़ में कुछ लोग आगे बढ़े। कालू काका पीछे से आए और मेरे पीछे खड़े हो गए।
"क्या बकवास है ये?" भैरव ने कहा, पर उसकी आवाज़ में पहली दरार पड़ी।
"मैं वहाँ इसलिए गया था," मैंने कहा, "क्योंकि मुझे पता था कि तू रात को वहाँ कुछ करता है। और आज सब जानते हैं कि तू क्या करता है।"
"सब जानते हैं?" भैरव हँसा। "कौन जानता है? ये?" उसने भीड़ की तरफ़ इशारा किया। "ये सब तो कल तक तेरे नाम भी नहीं जानते थे। कल तक तू बाहर खड़ा लड़का था।"
"कल तक," मैंने कहा। "आज सबने देखा कि तेरा पानी क्या है।"
भीड़ में से एक पहलवान आगे आया — वो जिसने कल कुश्ती के बाद कबूल किया था कि उसने भी पानी पिया। उसका नाम रामू था, और उसकी आँखें आज पहले जैसी नहीं थीं।
"सर," उसने धीरे से कहा, "मैंने कल कहा था ना कि मैंने पानी पिया। मेरी कमर आज भी टूटी हुई है।"
भैरव का चेहरा एक पल के लिए काला पड़ गया।
फिर उसने वो किया जो वो हमेशा करता था। मुस्कुराया।
"रामू," उसने कोमल आवाज़ में कहा, "तू मेरा बच्चा है। तू कमज़ोर है, इसलिए तेरी कमर दुखती है। मैं तुझे और पानी दूँगा, तू ठीक हो जाएगा।"
"नहीं," रामू ने कहा। और उसकी आवाज़ में वो डर था जो अब भी भैरव से था, पर उससे बड़ी कोई चीज़ थी।
भैरव ने उसे देखा। बहुत देर तक देखा। फिर वो पलटा और मज़दूरों की तरफ़ गया, जो दीवार के पास खड़े थे।
"तुम सब," उसने कहा। "तुम सब रोज़ मेरी मिट्टी में पसीना डालते हो। तुम्हारी रोटी मेरे अखाड़े से चलती है। और ये लड़का, जो कल तक बाहर खड़ा था, तुम्हें बताएगा कि सच क्या है?"
कोई नहीं बोला।
"ठीक है," भैरव ने कहा। उसने पीछे से एक थाली उठाई जिसमें गिलास रखे थे। उसने एक गिलास भरा। पानी साफ़ था, चमक रहा था, और उसमें से कोई गंध नहीं आ रही थी।
मुझे पता था कि गंध क्यों नहीं आ रही थी। ज़हर इतना हल्का घोला गया था कि आम नाक को नहीं पकड़ता। पर मेरी नाक आम नहीं थी। मैंने गहरी साँस ली और मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला जो मुँह में कड़वाहट ले आया।
"आज सब पिएँगे," भैरव ने कहा। उसने गिलास ऊपर उठाया और भीड़ की तरफ़ घुमाया। "जो मेरा पानी पीता है, वो मेरा। जो नहीं पीता, वो दुश्मन।"
भीड़ में सन्नाटा था।
"ये अखाड़े की परंपरा है," भैरव ने कहा। "बीस साल से यही होता आया है। मैंने तुम सबको खड़ा किया। मेरी वजह से तुम्हारे बेटे पहलवान बने। और आज कोई मेरे पानी से मुँह फेरेगा?"
उसने गिलास रामू की तरफ़ बढ़ाया।
रामू का हाथ काँपा। उसने पीछे देखा, मेरी तरफ़। मैंने धीरे से सिर हिलाया — नहीं। पर रामू की आँखों में वो डर था जो मेरे सिर हिलाने से नहीं जाता। उसने गिलास लिया।
"रामू," मैंने कहा।
वो रुका।
"तूने खुद कहा था।"
रामू के हाथ में गिलास काँप रहा था। भैरव मुस्कुरा रहा था — वो मुस्कान जो कहती है, "देखा? मैं जानता था।"
रामू ने गिलास मुँह से लगाया और एक घूँट पी लिया। फिर उसने आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी ने उसे मार दिया हो — अपने ही हाथ से।
भैरव हँसा। "शाबाश।" उसने अगला गिलास उठाया और आगे बढ़ाया। "अब?"
एक-एक करके गिलास भरते गए। कुछ पीते, कुछ मुँह फेरते, पर कोई सीधे मना नहीं करता। क्योंकि मना करने का मतलब था — दुश्मन। और इस गाँव में दुश्मन होने का मतलब कोई नहीं जानता था, पर सब डरते थे।
फिर भैरव मेरे सामने आया। उसने गिलास भरा और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"वीर सिंह," उसने कहा। "तू नया है। नए लोगों को पहले पीना चाहिए।"
भीड़ मेरी तरफ़ देख रही थी। माँ की बात कान में गूँज रही थी — अब सबके सामने होगा।
"नहीं," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस साफ़ थी।
"नहीं?" भैरव ने कहा। "तू मेरा पानी नहीं पिएगा?"
"मैं तेरा पानी नहीं पिऊँगा," मैंने कहा। "क्योंकि ये पानी नहीं है।"
भीड़ में से कोई बोला, "क्या मतलब?"
मैंने भैरव को सीधे देखा। हम दोनों के बीच सिर्फ़ एक हाथ का फ़ासला था और उस हाथ में गिलास था।
"इस पानी में कुछ मिला है," मैंने कहा। "जो पहले ताकत देता है, फिर शरीर के अंदर की उम्र खा जाता है।"
भैरव हँसा। पर उसकी हँसी में वो बात नहीं थी जो अभी थी। अब उसमें जलन थी।
"सबूत?" उसने कहा। "तू बोलेगा और हम मान लेंगे? ये अखाड़ा है, अदालत नहीं।"
"सबूत है," मैंने कहा। "और सबूत अदालत में जाएगा।"
भैरव का चेहरा पल भर के लिए रुका। फिर उसने गिलास वापस थाली में रखा और मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसकी पकड़ भारी थी, जैसे किसी ने लोहा रख दिया हो।
"तू बड़ा होशियार है," उसने धीरे से कहा, सिर्फ़ मेरे कान तक। "पर होशियार लड़के भी रात को सोते हैं। और सोते वक़्त आदमी को पता नहीं होता कि उसके घर में कौन आया।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
"मेरी माँ को छूने की कोशिश की," मैंने उतनी ही धीमी आवाज़ में कहा, "तो तेरी अलमारी का हर काग़ज़ गाँव के चबूतरे पर पढ़ा जाएगा।"
भैरव का हाथ मेरे कंधे पर कसा। फिर ढीला हुआ।
"अच्छा," उसने कहा, और पीछे हट गया। वो भीड़ की तरफ़ मुड़ा और अपनी आवाज़ में वो गरज लौटा जो बीस साल से इन दीवारों में गूँजती आई थी।
"कल सुबह," उसने कहा। "सब यहाँ आएँगे। मैं खुद इस लड़के से लड़ूँगा। हारा तो अखाड़ा बंद, हमेशा के लिए। जीता तो ये लड़का गाँव छोड़कर जाएगा।"
भीड़ में सनसनी फैल गई।
"और अगर कोई इस लड़के की तरफ़ से बोला," भैरव ने गिलास उठाया, "तो वो इस गिलास से पहले मेरे सामने आएगा।"
उसने गिलास ऊँचा किया। पानी चमक रहा था।
"जो मेरा पानी पीता है वो मेरा," उसने कहा, आवाज़ गूँजती हुई। "जो नहीं पीता वो दुश्मन। आज सब पिएँगे।"
और फिर, गिलास हवा में पकड़े हुए, उसने अपनी नज़र घुमाई। भीड़ से ऊपर। दीवारों से ऊपर। दूर, गाँव की तरफ़।
मेरी गली की तरफ़।
मेरे घर की तरफ़।
उसकी आँखें वहाँ टिक गईं। उसने गिलास नीचे किया, पानी की एक बूँद मिट्टी पर गिरी, और मुस्कुराकर कहा —
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